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नियमों में उलझी सीएम की महत्वाकांक्षी ड्रग डिस्कवरी योजना

Fri, 17 Jun 2016 02:56 AM IST
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, देहरादून
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 17 Jun 2016 02:56 AM IST
सार

  • क्रॉनिक पैनक्रियाटाइटिस की दवा विकसित करने की है परियोजना
  • विभागीय खींचतान में परियोजना की पहली किश्त पर खड़ा हो गया है विवाद 
  • विभागीय मंत्री, शासन और यूकॉस्ट से वार्ता के बाद भी नहीं निकला समाधान

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cm rawat drug discovery scheme.
सीएम हरीश रावत - फोटो : pti

विस्तार

लाइलाज रोग क्रॉनिक पैनक्रियाटाइटिस की दवा विकसित करने के लिए सीएम हरीश रावत की पहल सरकारी नियम कायदों में उलझ गई है। सीएम ने वैद्य बालेन्दु वीसीसी कैंसर रिसर्च फाउंडेशन को ड्रग डिस्कवरी परियोजना का जिम्मा सौंपा था, लेकिन इसके लिए उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (यूकॉस्ट) के माध्यम से मिलनी वाली पहली किश्त ही शोध संस्था को नहीं मिल पा रही है।

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योजना शुरू होने के एक वर्ष बाद थोपी जा रही सरकारी शर्तों ने दिक्कतें और बढ़ा दी हैं। विभागीय मंत्री से लेकर शासन तक पत्राचार के बाद भी फाउंडेशन को बजट नहीं मिल रहा है।
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सीएम ने वैद्य बालेन्दु वीसीसी कैंसर रिसर्च फाउंडेशन के तहत यूकॉस्ट में ड्रग डिस्कवरी परियोजना को स्वीकृति प्रदान की थी। इसके तहत क्रॉनिक पैनक्रियाटाइटिस रोग की दवा विकसित की जानी थी, जिसमें वैद्य बालेन्दु को महारत हासिल है। उनकी आयुर्वेदिक जानकारी को विज्ञान से जोड़ कर विकसित की जाने वाली दवा के लिए सात वर्ष की अवधि रखी गई।

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पहली किश्त के दौरान ही शासन ने लगा दीं विभिन्न शर्तें

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हरीश रावत - फोटो : अमरउजाला

इस प्रोजेक्ट की लागत 5.07 करोड़ रुपये तय की गई थी। 8 जनवरी 2015 को फाउंडेशन ने दवा निर्माण के लिए कार्य शुरू किया। दवा को पेटेंट करवाने की प्रक्रिया भी पूरी की गई। लगभग 60 लाख रुपये पहली किश्त के तौर पर शासन ने जारी किए, जिसमें से 47 लाख रुपये फाउंडेशन को मिले। इस बीच दिसंबर 2015 में शासन ने परियोजना के लिए विभिन्न शर्तें लगा दीं।

कार्ययोजना के कार्यों के संपादन का दायित्व यूकॉस्ट को दिया गया है। फाउंडेशन और परिषद के बीच एमओयू, पेटेंट करवाने, कार्य व व्यय विवरण और परियोजना का बीमा करवाने के निर्देश भी दिए गए। फाउंडेशन का दावा है कि तमाम पत्रावलियां यूकॉस्ट को प्रेषित कर दी गई हैं।

फाउंडेशन मई माह में 19.75 लाख रुपये की मांग यूकॉस्ट को भेजी, जिसके बाद एक बार रिमाइंडर भी दिया गया। मामला विभागीय मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी तक पहुंचा, लेकिन समाधान नहीं निकल रहा है, जबकि दवा विकास का पचास फीसदी कार्य पूरा हो चुका है।

क्या कहते हैं वैद्य बालेंदु

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वैद्य बालेंदु प्रकाश - फोटो : अमरउजाला

बतौर प्रिंसिपल इवेस्टिगेटर मैं इस बात से अनभिज्ञ हूं कि 60 लाख की पहली किश्त से 13 लाख रुपये हमें किन कारणों से नहीं मिले। मैंने यूकॉस्ट से पत्राचार किया, लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिल रहा। आडिट रिपोर्ट, एमओयू का प्रारूप तक फाउंडेशन यूकॉस्ट को सौंप चुका है। शासन की ओर से जारी धनराशि जिन मदों में दी थी उसके अनुरूप पैसा नहीं मिला।
-वैद्य बालेन्दु, वीसीसी कैंसर रिसर्च फाउंडेशन

परियोजना को लेकर शासन ने कई तरह की शर्तें लगा दी हैं। रिसर्च एंड डेवलपमेंट में परियोजना के बीमा की शर्त  तर्कहीन है। एमओयू दस्तावेज पूरा नहीं है। हमने परियोजना के लिए जो अगली किश्त शासन से मांगी वह तक नहीं मिली। पहली किश्त से 13 लाख रुपये सैंपल एनालिसिस के लिए रखे गए हैं, जो यूकॉस्ट खुद करवाएगा। चूंकि  सरकारी संस्थान को लैब एनालिसिस के लिए पचास प्रतिशत कम दर से भुगतान करना होगा, ऐसे में फाउंडेशन के निजी संस्था होने से अतिरिक्त व्यय भार क्यों झेला जाए। मैंने दो दिन पहले शासन को यह तक लिख के भेज दिया है कि प्रोजेक्ट के लिए यूकॉस्ट को हटाकर किसी और सरकारी शोध संस्था के साथ एमओयू कर चला लिया जाए।
-डा. राजेंद्र डोभाल, डीजी यूकॉस्ट

यह बेहद महत्वपूर्ण परियोजना है। शासन स्तर से बजट नहीं रोका गया है। परियोजना को लेकर सभी शर्तें वित्त विभाग की मंजूरी से तय होती हैं। हमारे स्तर से पहली किश्त जारी की गई, लेकिन अभी तक हमें व्यय से संबंधित दस्तावेज नहीं मिले हैं। यूकॉस्ट से इस संबंध में जानकारी मांगने के बाद भी नहीं मिली है न ही एमओयू से संबंधित पत्रावली प्राप्त हुई है। मामले में कहीं कोई कोताही बरती गई है तो उसकी जांच होगी।
-दीपक कुमार, सचिव विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

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