उत्तराखंड में ड्रैगन की हरकत से सुरक्षा एजेंसियां हुई चौकस
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लद्दाख और नार्थ ईस्ट में चीनी सेना पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की घुसपैठ के बाद अब उत्तराखंड के बाड़ाहोती सेक्टर में इसकी मौजूदगी से सुरक्षा एजेंसियां चौकस हो गई हैं। अक्सर अगस्त माह में बाड़ाहोती में देखी जाने वाली चीनी सेना की गतिविधियां अब जुलाई में होने लगी हैं।
इस संबंध में आईटीबीपी ने गृह मंत्रालय और राज्य सरकार को अवगत करवा दिया है। हालांकि, इसे घुसपैठ न मानते हुए चीन सेना की गश्त के दौरान विवादित क्षेत्र में होने वाली हर वर्ष की गतिविधि माना जा रहा है।
गौरतलब है कि चमोली जिले से लगी भारत-तिब्बत (चीन) सीमा में पीएलए ने वर्ष 2013 में दो बार हेलीकॉप्टर से भारतीय एयर स्पेस का उल्लंघन किया था। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक भारत चीन सीमा पर चीन की सेना ने उत्तराखंड में बीते पांच साल में कोई घुसपैठ नहीं की है।
बाड़ाहोती क्षेत्र पर चीन भी जताता है अपना दावा
बाड़ाहोती एक विवादस्पद क्षेत्र है, जिसे चीन भी अपना क्षेत्र बताता है। 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पर आईटीबीपी जब इस क्षेत्र में ध्वजारोहण समारोह आयोजित करती है तो उससे पहले चीन सेना यहां अक्सर घुसपैठ करती है।
हालांकि राज्य सरकार बीते 2014 तक 37 बार बाड़ाहोती में घुसपैठ का मामला उठा चुकी है, जिसमें पैदल जवानों से लेकर पीएलए के घोड़ों पर गश्त के दौरान घुसपैठ की वारदात है। राज्य की साढ़े तीन सौ किलोमीटर लंबी चीन सीमा पर केवल बाड़ाहोती क्षेत्र में ही पीएलए मानसून सीजन में तेजी से बर्फ पिघलने के दौरान अपने गश्ती दल रवाना करता है।
पीएलए के जवान बर्फ पिघलने के साथ सीमा पर गश्त करते हैं। इस दौरान सीमा रेखा को पार करने की वारदातें रिपोर्ट होती हैं। आईटीबीपी बाड़ाहोती की घटना को नो मेंस लैंड पर मौजूदगी मान रहा है जहां भारतीय ट्रूप भी जाते हैं।
मोबाइल कनेक्टिविटी और बॉर्डर आउट पोस्ट बढ़ेंगे
सीमांत इलाकों में मोबाइल कनेक्टिविटी की दिक्कतों को देखते हुए गृह मंत्रालय ने चीन सीमावर्ती क्षेत्रों में आईटीबीपी को 123 मोबाइल टावर लगाने की अनुमति दी है। उत्तराखंड में 47 टावर और पांच बॉर्डर आउट पोस्टों का विस्तार किया जा रहा है। यह टावर आईटीबीपी की ओर से चिह्नित स्थानों पर लगेंगे। टावर लगने से सीमावर्ती इलाकों में बसी जनता को मोबाइल से संपर्क साधने में मदद मिलेगी।
चरवाहे भी हैं वजह
जिस विवादस्पद हिस्से में अक्सर घुसपैठ होती है वहां पहाड़ पर एक बड़ा घास का मैदान है। इस चारागाह में लंबे समय से दोनों ओर से पशुपालक अपने जानवरों को चराने के लिए आते हैं। चीन की ओर से अक्सर हरी घास की तलाश में भेड़ व बकरियों का आना अधिक होता है। चारागाह में मानसून सीजन के दौरान दोनों ओर से पशुपालक डेरा डालते हैं।