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आपदा को प्रलय बनाने वाले कारण अब भी मौजूद
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 09 Jun 2015 01:56 PM IST
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जून 2013 की आपदा प्रबंधन की निष्पादन लेखा परीक्षा में महालेखाकार ने माना है कि आपदा की भयावहता को बढ़ाने वाले कई कारण मौजूद रहे।
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चिंता वाली बात यह है कि कैग ने जो कारण गिनाएं हैं वो किसी न किसी रूप में आज भी मौजूद हैं। कई कारण ऐसे हैं जो कैग ने 2009 में जल विद्युत परियोजनाओं की निष्पादन रिपोर्ट में सामने रख दिए थे। लेखा परीक्षा में कहा गया है कि प्राकृतिक आपदाओं पर बस नहीं है पर आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता था।
इसके लिए कुछ कदम उठाए जाने की जरूरत भी थी। सतर्कता न बरतने के कारण आपदा से नुकसान कई गुना बढ़ गया। जून 2013 की आपदा से पहले उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग में भी आपदा आई थी। पर इन आपदाओं से कोई सबक नहीं सीखा गया। प्रदेश अति संवेदनशील है और इस लिहाज से प्राकृतिक आपदाओं का कहर यहां ज्यादा है।
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2013 की आपदा असमय और बहुत ज्यादा बरसात और चोराबाड़ी ताल के फटने के कारण आई। पर सड़क और बांधों के निर्माण से उत्पन्न मलबे ने इस नुकसान को कहीं अधिक बढ़ा दिया। जलवायु परिवर्तन का ग्लेश्यिर पर अध्ययन के लिए 2006 में कमेटी का गठन किया गया था।
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इस कमेटी ने अक्टूबर 2007 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप भी दी थी। हद तो यह थी कि मार्च 2015 में भी विभाग का कहना था कि इस रिपोर्ट का अध्ययन किया जा रहा है।
लेखा परीक्षा में कहा गया है कि सितंबर 2012 की ऊखीमठ आपदा के बाद आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र ने सरकार को पर्वतीय जिलों में निर्माण कार्य में बारूद का उपयोग बंद करने का सुझाव दिया था। सरकार को इस मामले में नीति बनानी चाहिए थी। पर यह नहीं किया गया।
इसी तरह सड़क और बांध निर्माण से उत्पन्न मलबे के निस्तारण के लिए नीति बनाने की जरूरत है। रुद्रप्रयाग में जेली गांव के भौतिक सत्यापन में पाया गया कि नई सड़क के निर्माण में निकला मलबा नीचे घाटी में ही जाने दिया गया।2013 में इस मलबे के कारण खासा नुकसान हुआ।
जून 2013 से पहले 31 जल विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन थीं। सिंगोली भटवाड़ी और फाटा भ्यूंग परियोजना में मलबा निस्तारण पर कैग ने 2009 की निष्पादन लेखा परीक्षा में भी सरकार का ध्यान खींचा था। पर इस पर शायद ही कोई सुरक्षात्मक कदम उठाया गया।
नदी किनारे निर्माण पर 2014 में सरकार ने कानून बनाया था। 2013 में इस तरह का कोई कानून नहीं था। वाडिया संस्थान ने भी इससे पहले की एक अध्ययन रिपोर्ट में सरकार का ध्यान इस ओर खींचा था। नदियों और नालों के किनारे अगर अनियोजित निर्माण न होता तो 2013 की आपदा में जानमाल का नुकसान कम होता।
कैग ने गिनाए आपदा के कारण
- ढाल स्थिरीकरण और भूस्खलन क्षेत्रों का उपचार न किया जाना
- मलबा निस्तारण की उचित व्यवस्था न होना
- ग्लेश्यिर पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन और निगरानी की व्यवस्था न करना
- नदियों के किनारे निर्माण कार्य, अनियोजित निर्माण
- नगर नियोजन का सही अनुपालन न होना
एसडीआरएफ के फंड का गलत इस्तेमाल
कैग ने आपदा के बाद कई ऐसे निर्माण कार्यों को राज्य आपदा मोचक निधि (एसडीआरएफ) से खर्च कर दिया जो उस प्रकृति को नहीं थे। निधि से स्वास्थ्य केंद्रों को जाने वाले मार्गों पर खड़ंजे से लेकर आपदा से पूर्व के स्वीकृत निर्माण और शहर के भीतर की सड़कों तक की मरम्मत करवा दी गई।
परफार्मेंस आडिट में 117 सुरक्षा निर्माण कार्यों का उल्लेख किया गया है जिसमें एसडीआरएफ की निधि के मानकों का उल्लंघन किया है। कैग ने कहा कि बहे पुलों से स्थानीय लोगों के लिए नदियों पर ट्रालियां लगाने में भी देरी बरती गई। चमोली, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग, टिहरी और उत्तरकाशी जनपद में 12.06 करोड़ रुपए से 117 निर्माण कार्य किए गए, जिसमें 43 बाढ़ नियंत्रण, 36 पुलों को सुरक्षित करने की दीवार और 38 सीमेंट के ढांचे थे।
निर्माण कार्यों का मौका पर निरीक्षण के बाद आडिट दल ने पाया कि इन सभी निर्माण कार्यों को आपदा के बाद आवश्यक निर्माण की श्रेणी में नहीं डाला गया है। कैग का मानना है कि यह सभी कार्य इसके लिए बाढ़ नियंत्रण का कार्य देखने वाली एजेंसी के बजट प्रावधान से किया जाना चाहिए था।
आडिट में कैग ने टिप्पणी दी है कि 117 निर्माण कार्यों पर एसडीआरएफ के मद से 12.06 करोड़ खर्च करने से जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों पर प्रश्नचिन्ह लगता है।
इन जनपदों में निर्माण
चमोली में 1.13 करोड़ से 13 निर्माण
पिथौरागढ़ में 3.31 करोड़ से 38 निर्माण
रुद्रप्रयाग में 2.08 करोड़ से 14 निर्माण
टिहरी में 1.36 करोड़ से 14 निर्माण
उत्तरकाशी में 4.18 करोड़ से 38 निर्माण
कुछ मामले
- टिहरी में 1.15 करोड़ की लागत से 16 निर्माण किए गए जो जून 2013 की आपदा के बाद के दिखाए गए लेकिन उसकी स्वीकृति 2012 में हो गई थी।
- टिहरी शहर के अंदर 31.56 लाख के सड़क मरम्मत कार्य एसडीआरएफ की मद से किए गए जबकि यह स्थानीय निकायों के तहत आते हैं।
- रुद्रप्रयाग में जीआईसी जयंती कोठियारा और कुंजा स्कूलों में मरम्मत के लिए 14.13 लाख रुपए जारी हुए, लेकिन जनवरी 2015 तक निर्माण नहीं किया।
- गोविंदघाट में 110 मीटर के वैली ब्रिज और तवाघाट में कनचोटी से नारायण आश्रम के बीच पुल निर्माण।
- पांच जनपदों में 1.19 करोड़ से नदियों पर 11 ट्रालियां की स्थापना में 11 माह तक की देरी।