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बजटः उत्तराखंड के हिस्से मायूसी ज्यादा, राहत कम

Sun, 01 Mar 2015 02:31 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 01 Mar 2015 02:31 PM IST
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budget 2015, not good for uttarakhand.

शनिवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली के बजट के पिटारे से उत्तराखंड के लिए बहुत कुछ नहीं निकल पाया।

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जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस टैक्स) को एक साल में लागू करने की बात से प्रदेश को राहत मिल सकती है। मध्यम उद्योगों को राहत मिलेगी पर प्रदेश की समस्याओं को सुलझाने में केंद्र का यह बजट राज्य की मदद करता नहीं दिखता।

पिछली बजट घोषणाओं को आगे बढ़ाने के बजाय चुप्पी ओढ़ने और ग्रीन बोनस से लेकर ऊर्जा, पर्यटन और अवस्थापना विकास पर स्पष्ट तस्वीर पेश न होने से राज्य को मायूसी होगी है।
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केंद्रीय बजट से इस बार राज्य को ऊर्जा के क्षेत्र में प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद थी। जल विद्युत परियोजनाओं पर कुहासा साफ होता तो राज्य को फायदा होता। जलवायु परिवर्तन से निपटने पर जोर देने के बाद भी प्रदेश के हिस्से में इस क्षेत्र में कुछ नहीं आया।
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बजट में सिर्फ कहा गया है कि लघु जल विद्युत परियोजनाओं से 5000 मेगावाट उत्पादन किया जाएगा। दूसरी ओर पर्यटन प्रदेश को भी राज्य के ही भरोसे ही छोड़ दिया गया। 2013 की जून आपदा के जख्म अभी भरे नहीं है। बावजूद इसके आपदा प्रबंधन और आपदा के कारण अवस्थापना विकास पर भी राज्य के हिस्से कुछ खास नहीं आया।

कुछ दिन पहले ही केंद्र सरकार ने 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों को स्वीकार किया था। इसके राज्यों की केंद्रीय करों में हिस्सेदारी 32 से बढ़ाकर 42 प्रतिशत कर दी गई है, पर आठ केंद्रीय योजनाओं से किनारा कर लिया गया। पिछड़ा क्षेत्र विकास निधि योजना में राज्य के टिहरी, चंपावत और चमोली जिले शामिल हैं।

बजट में उत्तराखंड के हिस्से महिला अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षण संस्थान आया है। पर इसकी तस्वीर भी पूरी तरह से साफ नहीं है। उद्योगों के लिहाज से माइक्रो यूनिट डेवलपमेंट रिफाइनेंस एजेंसी (मुद्रा) की स्थापना का फायदा होगा। प्रदेश में 90 प्रतिशत मझौले उद्योग अपनी पूंजी के दम पर स्थापित हैं।

ऐसे में 20 हजार करोड़ रुपये से स्थापित मुद्रा से इन उद्योगों को रिफाइनेंस मिल पाएगा। नाबार्ड को अवस्थापना विकास निधि के तहत 25 हजार करोड़ देने का फायदा राज्य को होगा। पर्वतीय राज्यों के लिए अलग से 33 हजार करोड़ की व्यवस्था होने से राज्य को फायदा मिलेगा।

इन योजनाओं से काटी कन्नी
राष्ट्रीय ई शासन योजना
पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष
राजीव गांधी पंचायत सशक्तिकरण अभियान
निर्यात अवसंरचनाओं के लिए राज्यों को केंद्रीय सहायता
6000 मॉडल स्कूल
राष्ट्रीय खाद्य प्रसंस्करण स्कीम
पर्यटन अवसंरचना

...तो आसान होगी चारधाम यात्रा

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केंद्र सरकार के नए बजट से राज्य को भी थोड़ा बहुत फायदा मिल सकेगा। खासकर चारधाम राष्ट्रीय राजमार्ग को लाभ मिलेगा, जबकि पुरानी चल रही योजनाएं भी तेजी पकड़ेंगी। केंद्र सरकार ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग क्षेत्र के लिए 42912 करोड़ रुपये 2015-16 के बजट में दिए हैं।

इसमें राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, विशेष एक्सीलरेटेड सड़क विकास कार्यक्रम, नक्सली क्षेत्र में सड़क के लिए राशि भी शामिल है। राष्ट्रीय राजमार्ग खंड के मुख्य अभियंता हरिओम शर्मा का कहना है कि बजट से चारधाम यात्रा मार्ग को फायदा मिल सकता है।

खासकर केदारनाथ और बद्रीनाथ की सड़कों की स्थिति सुधारने के लिए बजट मिल सकता है। इसके अलावा प्रदेश में फ्लाईओवर निर्माण, पुल निर्माण, सड़क निर्माण आदि में तेजी आएगी। पीएमजीएसवाई के अधीक्षण अभियंता सीएम पांडे का कहना है कि 250 से अधिक आबादी वाले गांवों को भी सड़क से जोड़ा जा रहा है।

प्रस्ताव भी बन रहे हैं, बजट उपयुक्त मिलने पर केंद्र सरकार की इस योजना के तहत सड़कों का निर्माण तेजी से होगा।

हरिद्वार-केदारनाथ में घाटों के सुंदरीकरण पर खामोशी

पिछले अंतरिम बजट में उत्तराखंड सहित अन्य हिमालय राज्यों में विकसित परंपरागत खेलों के लिए साल में एक बार वार्षिक खेल के आयोजन की घोषणा की गई थी। इस बार इसके लिए पांच करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है।
यह भी बताया गया कि इस योजना के तहत अक्तूबर माह में असम में खेल का आयोजन हो सकता है। पिछले बजट में केदारनाथ, हरिद्वार में रिवर फ्रंट और घाटों के सौंदर्यीकरण की घोषणा भी की गई थी। इस पर केंद्र में कैबिनेट नोट तैयार किया जा रहा है।

इन योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए कोई खास कोशिश इस बजट में नहीं की गई दिखती है। बजट में केंद्र के टैक्स में राज्यों का अंतरण (हिस्सेदारी) बढ़ जाने से राज्यों को पैसे की कमी न होने की बात की गई है। यह साफ है कि राज्यों को रमसा से लेकर अन्य कई योजनाओं पर अब अपनी तरफ से अधिक पैसा भी खर्च करना पड़ सकता है।

सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज पर कदम आगे नहीं बढ़े
केंद्र ने बजट में पिछले साल जो घोषणा की थी वह भी अब तक पूरी नहीं हुई। अंतरिम बजट में हिमालयन राज्यों के अध्ययन के लिए ‘नेशनल सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज इन उत्तराखंड’ बनाने की घोषणा पर केंद्र सरकार एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकी है। प्रदेश सरकार को भी इसका इंतजार है, लेकिन इस बार बजट में इसका जिक्र तक नहीं आया।

दस जुलाई 2014 को सभी हिमालयन राज्यों के लिए पेश हुए अंतरिम बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि 100 करोड़ रुपये लागत से उत्तराखंड में नेशनल सेंटर फॉर द हिमालयन स्टडीज की स्थापना होगी। इसमें हिमालयन राज्यों पर विस्तृत अध्ययन के साथ पलायन रोकने के लिए नीति निर्माण का काम भी होगा।

प्रदेश की वित्त और उच्च शिक्षा मंत्री इंदिरा हृदयेश का कहना है कि उत्तराखंड के लिए यह घोषणा अच्छी थी, लेकिन तब से अब तक केंद्र ने प्रदेश सरकार से पत्राचार तक नहीं किया है। 100 करोड़ की लागत से यह केंद्र कहां बनना है, इसकी भी जानकारी नहीं दी गई है। न ही केंद्र ने अब तक जमीन की मांग की है।

इन राज्यों के लिए बनना था केंद्र

उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा

हिमालयी राज्यों के खेलों के लिए पांच करोड़

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पिछले अंतरिम बजट में उत्तराखंड सहित अन्य हिमालय राज्यों में विकसित पंरपरागत खेलों के लिए साल में एक बार वार्षिक खेल के आयोजन की घोषणा की गई थी। इस बार इसके लिए पांच करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है।

यह भी बताया गया कि इस योजना के तहत अक्टूबर माह में असम में खेल का आयोजन हो सकता है। पिछले बजट में केदारनाथ, हरिद्वार में रिवर फ्रंट और घाटों के सौंदर्यीकरण की घोषणा भी की गई थी। इस पर केंद्र में कैबिनेट नोट तैयार किया जा रहा है। इन योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए कोई खास कोशिश इस बजट में नहीं की गई दिखती है।

बजट में केंद्र के टैक्स में राज्यों का अंतरण (हिस्सेदारी) बढ़ जाने से राज्यों को पैसे की कमी न होने की बात की गई है। यह साफ है कि राज्यों को रमसा से लेकर अन्य कई योजनाओं पर अब अपनी तरफ से अधिक पैसा भी खर्च करना पड़ सकता है।

प्रदेश के पूर्व सैनिक भी हुए निराश
आम बजट सेना और सैनिकों के लिए उम्मीद पर खरा नहीं उतरा। बजट में महज 9.46 फीसद बढ़ोतरी से सेना के आधुनिकीकरण में तेजी नहीं आ पाएगी जबकि वन रैंक वन पेंशन के लिए बजट में प्रावधान अस्पष्ट है। वहीं वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार के बचाव में कहा कि पेंशन की गणना का मामला सेना और रक्षा मंत्रालय में लटका हुआ है।

रक्षा बजट में पूर्व सैनिकों की सबसे बड़ी मांग वन रैंक वन पेंशन पर एक बार फिर आश्वासन ही हाथ लगा। एनडीए सरकार ने अपनी वाद तो दोहराई, लेकिन बजट प्रावधान नहीं किया। वर्ष 2014 में यूपीए सरकार ने अंतरिम बजट में वन पैंक वन पेंशन के लिए पांच सौ करोड़ का बजट प्रावधान किया था।

जब एनडीए की सरकार बनी तो जुलाई 2014 में पेश अंतरिम बजट में 15 सौ करोड़ के बजट प्रावधान की बात कही गई। बावजूद वन रैंक वन पेंशन पर केंद्र सरकार कोई फैसला नहीं ले पाई। कर्नल एमएस बिष्ट (रि) ने बताया कि वन रैंक वन पेंशन लागू करने की उम्मीद सर्वाधिक थी, लेकिन बजट में उसको लेकर सरकार की अस्पष्ट दिखी रही है।

अगर सरकार उसे लागू नहीं करती है तो यह पूर्व सैनिकों से धोखा है। वन रैंक वन पेंशन एक्स सर्विस लीग के ब्रिगेडियर केजी बहल ने बताया कि संगठन उम्मीद लगा रहा था कि इसके लिए केंद्र नौ हजार करोड़ रुपये का प्रावधान करेगा, लेकिन वित्त मंत्री ने कोई राहत नहीं दी।

आधुनिकीकरण मुश्किल
रक्षा मामलों के विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल एमसी भंडारी (रि) ने रक्षा बजट को सेना के आधुनिकीकरण के लिहाज से नाकाफी बताया है। उन्होंने कहा कि चीन सीमा के लिए माउंटेन स्ट्राइक कोर के अलावा थलसेना के लिए आर्टिलरी गन सहित नए हथियारों की खरीद के प्रस्ताव एक बार फिर बजट अभाव में लटकेगा।

नौसेना और वायुसेना के आधुनिकीकरण के लिए कोई खास प्रावधान नहीं है, जिससे नए लड़ाकू विमानों, युद्धपोतों, हेलीकाप्टरों आदि की खरीद में देरी होगी।

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