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तो गोविंद बल्लभ पंत की इस किताब से डर गए थे अंग्रेज

Thu, 10 Sep 2015 01:13 PM IST
कमलेश मेहता / अमर उजाला, हल्द्वानी
कमलेश मेहता / अमर उजाला, हल्द्वानी Updated Thu, 10 Sep 2015 01:13 PM IST
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British were afraid of GB Pant book.

भारत रत्न डॉ. गोविंद बल्लभ पंत ने न केवल राजनैतिक तरीकों से, बल्कि लेखन के जरिए भी आजादी की मुहिम में शामिल होने के लिए लोगों को प्रेरित किया।

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जाने-माने इतिहासकार डॉ. अजय रावत बताते हैं कि उनकी किताब ‘फॉरेस्ट प्रॉब्लम इन कुमाऊं’ से अंग्रेज इतने भयभीत हो गए थे कि उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। बाद में इस किताब को 1980 में पुन: प्रकाशित किया गया।
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कुमाऊं में अंग्रेजों के शासन से पहले गोरखाओं का शासन था, उनका प्रशासन और न्याय करने का तरीका बेहद क्रूर था। जब 1815 को अंग्रेजों का शासन कुमाऊं में शुरू हुआ, तो उन्होंने कई सामाजिक हित से जुड़े कार्य और व्यवस्थित तंत्र विकसित किए। डॉ. अजय रावत बताते हैं कि इसके चलते देश के अन्य हिस्सों की तुलना में यहां पर अंग्रेजों के प्रति नाराजगी कम थी।
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ऐसे में लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ तैयार करने के लिए गोविंद बल्लभ पंत ने कमान संभाली। 1916 में कुमाऊं परिषद का गठन किया गया। इसके सांगठनिक सचिव पंत जी ही थे। अंग्रेजों ने फारेस्ट एक्ट बनाने के साथ ही आरक्षित, संरक्षित वन घोषित कर दिया।

पहाड़ के लोग वनों पर ही आश्रित थे, ऐसे में उनके हक-हकूक प्रभावित हो रहे थे। 1920 में जनता ने असहयोग आंदोलन के समय जंगलों में आग भी लगा दी थी। वनाधिकार कानून आदि से लोगों को किस तरह की परेशानी हो रही थी, इस पर गोविंद बल्लभ पंत ने 1922 में ‘फॉरेस्ट प्रॉब्लम इन कुमाऊं’ किताब लिखी।

यह किताब नैनीताल के ज्ञानोदय प्रकाशन से छापी गई। यह पुस्तक वन और पानी के अधिकार पर फोकस थी। डॉ. रावत का दावा है कि इस किताब से जनता में असंतोष बढ़ने का डर था, इसलिए अंग्रेजों ने उस किताब को बैन करने का फैसला किया। बाद में डा. रावत ने 1980 में ‘फारेस्ट प्रॉब्लम इन कुमाऊं’ का पुन: प्रकाशित कराया।

नाना के घर पर मिली राजनीति की दीक्षा

British were afraid of GB Pant book.

दीप जोशी / अमर उजाला, अल्मोड़ा

पर्वत पुत्र एवं भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत का जन्म अल्मोड़ा जिले के खूंट गांव में पंडित मनोरथ पंत के घर में हुआ। पंडित पंत के नाना बद्री दत्त जोशी अंग्रेज कमिश्नर हेनरी रैमजे के सलाहकार थे।

पंडित पंत अपने नाना के घर ही अधिक रहते थे और बचपन में ही उन्हें राजनीतिक परिवेश मिला। बचपन से ही वह धीर-गंभीर थे, इसलिए उन्हें घर पर सभी लोग धपुवा (निक नेम) कहा करते थे।

बता दें कि गोरखा शासन के बाद 1815 में अल्मोड़ा में अंग्रेजों का अधिकार हो गया था। 1856 में हेनरी रैमजे कुमाऊं कमिश्नर बने। पंडित गोविंद बल्लभ पंत के नाना बद्री दत्त जोशी हेनरी रैमजे के सलाहकार थे। पंडित पंत भी अधिकांश नाना के यहां रहते थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा रैमजे इंटर कॉलेज अल्मोड़ा में हुई।

उन्होंने 1903 में हाईस्कूल, 1905 में इंटर किया और इसके बाद इलाहाबाद के म्योर कालेज में प्रवेश लिया। वहां कानून की डिग्री लेने के बाद पंत जी अल्मोड़ा लौट आए। इस बीच इलाहाबाद में रहते हुए पंडित पंत जी पंडित मदनमोहन मालवीय, पंडित मोतीलाल नेहरू आदि के संपर्क में आए। लखनऊ में एक बैरिस्टर विष्णु नारायण धर 1911 में कांग्रेस अध्यक्ष बने थे।

वह टीबी रोग से पीड़ित होने के कारण इलाज के लिए अल्मोड़ा आए। पंडित पंत अल्मोड़ा में उनसे राजनीतिक चर्चा करते थे। उनके संपर्क में रहने के बाद पंडित पंत का ध्यान राष्ट्रीय समस्याओं की तरफ गया और वह आजादी के आंदोलन में सक्रिय हो गए। इस बीच वकालत के सिलसिले में वह काशीपुर चले गए। 1916 में वह काशीपुर नोटिफाइड एरिया के अध्यक्ष बने।

उनके प्रयासों से 1916 में कुमाऊं परिषद की स्थापना हुई। 1916 में वह महात्मा गांधी, सरोजनी नायडू, पंडित जवाहर लाल नेहरू आदि के संपर्क में आए। आजादी के बाद वह उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। तब स्व. लालबहादुर शास्त्री उनके संसदीय सचिव भी रहे। 1957 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

पंडित पंत का सही जन्मदिन है 30 अगस्त
पंडित पंत का जन्म दरअसल 30 अगस्त 1887 को हुआ था। पर्वतीय परंपरा के अनुसार जन्मदिन तिथि के अनुसार ही मनाया जाता था। 1946 में लखनऊ में जब पहली बार पंडित पंत का जन्मदिन मनाया गया तब अनंत चतुर्दशी 10 सितंबर के दिन पड़ी थी। उसके बाद से 10 सितंबर को ही उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा चल पड़ी।

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