परिवार को 'पार' लगा रही 15 साल की गंगा
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पहले माता-पिता ने अपने पांच अबोध बच्चों का साथ छोड़ा, फिर बड़े भाई ने चार अन्य भाई-बहनों की परवरिश में आ रही दिक्कतों से हार मानते हुए मौत को गले लगा लिया।
इसके बाद बड़ी बहन गंगा के ऊपर तीन अन्य मासूम जिंदगियों की गुजर बसर की जिम्मेदारी आन पड़ी। लेकिन, 13 साल की गंगा ने हार नहीं मानी। वह न सिर्फ अबोध भाई-बहनों का संबल बनी, बल्कि अपनी और उनकी पढ़ाई भी जारी रखे हुए है।
आइए, आपको मिलाते हैं इस बहादुर बिटिया से। गंगा अपने छोटे भाई शिवम, भगीरथ और बहन जमुना के साथ त्रिवेणीघाट पर झुग्गी बनाकर गुजर बसर कर रही है।
फूल बेंचकर करती है गुजर-बसर
फूल बेचकर भाई-बहनों का पालन पोषण करने वाली गंगा मूल रूप से भवान, टिहरी गढ़वाल की रहने वाली है। अब गंगा 15 साल की हो गई है, मगर समय के साथ उसकी दुश्वारियां कम होने की बजाए बढ़ती ही जा रही हैं।
बकौल गंगा, पिता गोविंद सिंह श्रीगंगा सेवा समिति में काम करते थे। पिता और मां हेमा देवी के बीच कलह रहती थी। वर्ष 2007 में एक रोज मां घर छोड़कर चली गई। कुछ दिन बाद पिता ने भी हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया।
बड़ा भाई सोनू माता-पिता के जाने के बाद हमारा एकमात्र सहारा था। उसने भी 2012 में हालात से तंग आकर खुद को जिंदा जला दिया। तब से वह भाई-बहनों के साथ त्रिवेणीघाट स्थित झुग्गी में रहकर किसी तरह जीवन गुजर-बसर कर रही है।
दुखों के बावजूद नहीं छोड़ा पढ़ाई का साथ
गंगा जीजीआईसी में दसवीं में पढ़ती है। इन दिनों बोर्ड परीक्षा के कारण उसके लिए इसकी तैयारी के साथ परिवार के गुजर बसर की जुगत करना भी एक बड़ी मुश्किल है।
वह परीक्षा देने के बाद फूल की दुकान लगाकर शाम को चूल्हा जलाने का इंतजाम करती है।
गंगा ने बताया कि भाई शिवम और भगीरथ नाभा हाउस प्राथमिक विद्यालय में क्रमश: आठवीं और छठी कक्षा में पढ़ते हैं। नए सत्र में उनके लिए काफी-किताबों का भी बंदोबस्त अभी नहीं हो पाया है।
आश्रम बना संबल
बेबस बच्चों के लिए मुनिकीरेती स्थित शिवानंद आश्रम कुछ हद तक संबल बना है। आश्रम प्रबंधन द्वारा इन निराश्रित बच्चों का सहयोग किया जा रहा है। बच्चों के लिए थोड़ा बहुत कच्चा राशन और पठन पाठन के लिए मदद दी जाती है।
शौचालय में काटी थीं वे तीन रातें
बीते वर्ष दैवी आपदा के दौरान मासूमों के इस कुनबे पर कहर बरपा। गंगा के उफान में उनकी झुग्गी बह गई। जान बचाने के लिए उन्होंने गंगा सेवा समिति के शौचालय में शरण ली और तीन-दिन तीन रात वहां फर्श पर काटी। इसके बाद गंगा ने फिर से अपनी झुग्गी तैयार की।
'अब डर लगने लगा है'
बकौल गंगा, जब हम छोटे थे, तो पारिवारिक जिम्मेदारी के बोझ को उठाने के लिए वह मेहनत से विचलित नहीं हुई, मगर अब डर लगने लगा है। गंगा ने बताया कि घाट पर एकत्रित होने वाले लोग उनकी सहायता करने की बजाय उन्हें हीन भावना और गलत दृष्टि से देखते हैं।