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हिंदी के लिए बलतराउद बरुल से बनी शांति गिरि

Sun, 15 Sep 2013 10:54 AM IST
अमर उजाला, ऋषिकेश
अमर उजाला, ऋषिकेश Updated Sun, 15 Sep 2013 10:54 AM IST
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Bltraud Brul made shanti giri for Hindi

मन की शांति को गंगा के सानिध्य में तीर्थनगरी पहुंची तो यहां विविधता में एकता के दर्शन हुए।

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भिन्न-भिन्न प्रांतों के लोग, उनकी बोली-भाषा और पहनावे ने भारतीयों को करीब से जानने की जिज्ञासा मन में पैदा की। लेकिन अकसर भाषा की दीवार संवाद में खलल डालती।

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फिर एक दिन ठान लिया, मैं भी हिंदी सीखूंगी। लगातार अभ्यास किया और कुछ समय बाद में हिंदी बोलने लगी। आपको विश्वास नहीं होगा, लेकिन अब मैं हिंदी बखूबी लिख भी लेती हूं।
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हिंदी लिखना और बोलना बहुत पसंद
...जर्मनी निवासी बलतराउद बरुल उर्फ शांति गिरि के ये उद्गार उनके हिंदी प्रेमी होने के लिए पर्याप्त हैं। तीर्थनगरी में पिछले डेढ़ वर्ष से रह रही जर्मनी निवासी बलतराउद बरुल उर्फ शांति गिरि को हिंदी ने इतना प्रभावित किया कि उसने इसे सीखने की धुन पकड़ ली।


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कुछ ही समय बाद वह अच्छी हिंदी बोलने लगी। उसकी जिज्ञासा यहीं समाप्त नहीं हुई, इसके बाद उसने हिंदी को लिखने का अभ्यास शुरू किया। बलतराउद बरुल ने बताया कि वह हिंदी को अधिक गहराई से जानने और समझने के लिए इस पर रोजाना मेहनत करती है।

अच्छी हिंदी बोलने लगी

बकौल बरूल, मुझे हिंदी लिखना और बोलना बहुत पसंद है। मैं इसको और अधिक जानने की कोशिश कर रही हूं। मैंने हिंदी भाषा में हनुमान चालीसा भी लिखी थी, लेकिन वह मुझसे कहीं खो गई है।

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बलतराउद बताती हैं कि उन्होंने स्वर्गाश्रम के वेद निकेतन के पास रहने वाले बाबा महंत राम गिरि से सबसे पहले हिंदी में बोलचाल सीखी।

जब उसका भाषा के प्रति रुझान बढ़ा तो उसने हिंदी-अंग्रेजी ट्रांसलेट गाइड से लिखने का अभ्यास किया। इस दौरान मुश्किल तो हुई, लेकिन मन में कुछ कर गुजरने की इच्छा हो तो सब हो जाता है।

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