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दृष्टिहीन मंतोष ने 73 प्रतिशत अंकों से परिक्षा पास कर पेश की मिसाल
नवीन सक्सेना/ अमर उजाला, हल्द्वानी
Updated Tue, 18 Apr 2017 02:07 PM IST
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परीक्षा
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दुनिया में कुछ कर दिखाने और कामयाबी की मंजिल छूने की अगर तमन्ना दिल में है तो आंखों की रोशनी भी मंजिल का रास्ता नहीं रोक सकती। इसी बात को साबित कर दिखाया है दृष्टिहीन मंतोष कुमार ने।
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उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी पढ़ाई नहीं छोड़ी और आगे बढ़ने के जज्बे को खत्म नहीं होने दिया। मंतोष ने उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में 73 प्रतिशत अंकों से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण कर समाज में अनूठी मिसाल कायम की है। वह प्रोफेसर बनकर दिव्यांगों के लिए काम करना चाहते हैं।
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सोमवार को यहां उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में आयोजित दीक्षांत समारोह में मंतोष को जब स्नातकोत्तर प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण करने पर उपाधि मिली तो खुशी का ठिकाना नहीं था। बचपन से दृष्टिहीन होने के बावजूद मंतोष के मन में पढ़ाई करने की धुन जैसी थी और तमाम परेशानियों की परवाह किए बगैर पहले हाईस्कूल की परीक्षा 57 प्रतिशत से उत्तीर्ण की, उसके बाद इंटरमीडिएट 49 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण किया।
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मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बलिया के रहने वाले मंतोष बताते हैं कि पिता बद्रीनाथ सिंह झारखंड में सरकारी नौकरी में थे लिहाजा उनका परिवार वहीं जाकर बस गया। उनकी इंटर तक की शिक्षा झारखंड में ही हुई तथा बीए दिल्ली जाकर किया। मंतोष की पढ़ाई का सफर यहीं नहीं रुका तथा राष्ट्रीय दृष्टि बाधितार्थ संस्थान से पहले बीएड फिर एमएड किया। मंतोष ने बताया कि एमए हिंदी से करने की इच्छा थी इसलिए वर्ष 2014 - 16 सत्र में उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के स्टडी सेंटर एसजीपीजीआर कालेज देहरादून में प्रवेश लिया।
वह देहरादून में पीजी में रह कर पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि लखनऊ के विश्वविद्यालय से वह पीएचडी कर रहे है इसका विषय भी उन्होंने दृष्टि बाधित बच्चों के संबंध में चयन किया। वह शोध करके दृष्टि बाधित बच्चों का जीवन सुधारने के लिए काम करना चाहते हैं। मंतोष का कहना है कि उनका मकसद प्रोफेसर बनना है। वह बताते हैं कि उन्हें कोई भी किताब पढ़ने में कोई परेशानी नहीं होती। इसके लिए उन्होंने कंप्यूटर में स्क्रीनिंग रीडिंग साफ्टवेयर डलवा रखा है।