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प्रिंसिपल, न टीचर, उच्च शिक्षा का गिरता स्तर

Thu, 04 May 2017 04:01 PM IST
आफताब अजमत / अमर उजाला, देहरादून
आफताब अजमत / अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 04 May 2017 04:01 PM IST
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bad higher education level
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Source

उत्तराखंड में उच्च शिक्षा की स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां साल दर साल नए विश्वविद्यालय और कॉलेज तो खुले, लेकिन इनमें न तो प्रिंसिपल हैं और न ही टीचर।

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गुणवत्ता के लिहाज से केवल 18 प्रतिशत संस्थान ऐसे हैं, जिन्हें नैक का एक्रिडिएशन मिला हुआ है। श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. यूएस रावत की शोध रिपोर्ट में प्रदेश की उच्च शिक्षा के दावों की यह कड़वी हकीकत सामने आई है।
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उनकी यह रिपोर्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटीज ने प्रकाशित की है। अपनी रिपोर्ट में डॉ. रावत ने प्रदेश में शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए अलग चयन बोर्ड बनाने की वकालत की है।
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रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
1. विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में प्रिंसिपल की 51 प्रतिशत, टीचरों की 44 प्रतिशत और नॉन टीचिंग के 29 प्रतिशत पद खाली हैं।
2. गुणवत्ता के पैमाने के तौर पर केवल 18 प्रतिशत संस्थानों के पास नैक का सर्टिफिकेट है।
3. शिक्षकों की क्लासरूम परफॉर्मेंस को आंकने का कोई फीडबैक सिस्टम नहीं बना है।
4. वर्ष 2000 से 2016 तक प्रदेश में सरकारी कॉलेजों की संख्या 34 से बढ़कर 99 पर पहुंच गई। इनमें से 78 कॉलेज पर्वतीय क्षेत्रों में हैं, लेकिन सुविधाएं नहीं होने से छात्र परेशान हैं।

5. 179 सेल्फ फाइनेंस कॉलेज प्रदेश में मौजूद हैं। लेकिन सभी केवल मैदानी जिलों में प्रोफेशनल एजुकेशन दे रहे हैं। चुनिंदा सरकारी कॉलेजों में प्रोफेशनल एजुकेशन की व्यवस्था है।
6. वर्ष 2010 से छह साल के भीतर प्रदेश में विश्वविद्यालयों की संख्या 18 से बढ़कर 28 हो गई।
7. राष्ट्रीय औसत के मुकाबले उत्तराखंड में जनरल, एससी, एसटी वर्ग के युवाओं का उच्च शिक्षा में दाखिला लेने का प्रतिशत कहीं ज्यादा है।
8. चिंताजनक बात यह भी है कि हर साल लाखों की संख्या में यूजी करने के बाद छात्रों का पीजी तक पहुंचने का प्रतिशत महज 11.55 प्रतिशत है। इन पीजी वालों में से पीएचडी में पहुंचने वालों का प्रतिशत 0.78, एमफिल में जाने का प्रतिशत 0.01 है।

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