सभी धर्म के लोगों को एक करते हैं ये सूफी बाबा
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राजधानी देहरादून में मौजूद सूफी बाब कालेशाह सभी धर्म के लोगों के एक डोर में बांधते हैं।
देहरादून-सहारनपुर रोड पर सुभाषनगर मोहब्बेवाला मुख्य मार्ग पर एक छोटा सा बाग है। इस राष्ट्रीय राजमार्ग पर कोलाहल, शोर शराबा, हल्ला गुल्ला ही रहता है। बड़े वाहनों की आवाजाही से कान ही नहीं बल्कि मन भी परेशान रहता है, लेकिन इस बाग में कदम रखते ही सब कुछ बदल जाता है।
मन सुकून और आनंद से जी उठता है। यहां महान सूफी बाबा काले शाह की दरगाह है। बाबा कालेशाह ऐसे सूफी (मुस्लिम संत) थे जो सिर्फ प्यार, मुहब्बत, खुदा की इबादत में ही डूबे रहते थे। मूल रूप से बाबा कालेशाह नैनीताल के पास कालाढूंगी के रहने वाले थे। हमेशा अल्लाह का नाम लेना ही उनका मकसद था।
वह वतनपरस्त और इंसानियत के लिए लड़ने वाले सूफी थे। ये वह दौर था जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत पर प्रभुत्व जमा चुकी थी। अंग्रेजी पलटन लोगों को सताने और तंग करने का काम करती थी।
बाबा का सिर केवल अल्लाह के आगे ही सिर झुकाता था। किसी भी धनी या सत्तानशीं के आगे सिर झुकाना इन्हें मंजूर नहीं था। ये अपना आदर्श बाबा मुईनुद्दीन चिश्ती व निजामुद्दीन औलिया व सूफी सरमद को मानते थे।
आज भी करते हैं लोगों के दिलों पर राज
वर्ष 1836 ई. में यहां से गुजर रहा था। फिरंगियों से हुई जंग में वो यहां दून में शहीद हो गये। शहर की पश्चिम दिशा में दिल्ली हाइवे स्थित गांव मोहब्बेवाला की सरजमीं पर उनको सुपुर्द-ए-खाक किया गया। तब लोगों ने यही उनकी दरगाह बनाई। 175 साल होने को आए लेकिन ये आज भी लोगों के दिलों पर राज करते हैं।
दरगाह में हिंदु, मुसलमान, सिख ईसाई सभी आते हैं। यहां धर्म-जाति का कोई भेद नहीं होता। यहां आकर लोग खुदा से मन्नतें मांगते हैं। बाब कालेशाह दरगाह के खिदमतगार मौ. सलीम बाबा ने बताया कि यहां दरगाह में दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल समेत दूर-दराज से लोग जियारत करने और चादर चढ़ाने आते है। यहां आकर खुदा से मांगी गई मन्नत (बीमारी, परेशानी, कारोबार में दिक्कत आदि) पूरी हो जाती है।
चार पीढ़ी से कर रहे दरगाह में खिदमत
दरगाह में पिछले पच्चीस सालों से खिदमत करने वाले मौ. सलीम बाबा बताते है कि उनके बुजुर्ग चार पीढ़ियों से यहां दरगाह में खिदमत करते आ रहे है। उनसे पहले उनकेवालिद कल्लन शाह, दादा ख्वाज बख्श, परदादा दीन अली यहां खिदमत किया करते थे।
गरीबों में तक्सीम करते है चादरें
दरगाह में चढ़ने वाली चादरों को खिदमतगार गरीबों में बांट देते है। उन्होंने बताया कि कई बार उनसे चादर खरीदने की पेशकश की गई, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया।
24 घंटे खुला रहता है दरगाह का दरवाजा
दरगाह का दरवाजा 24 घंटे खुला रहता है। खिदमतगार ने बताया कि दरगाह में कभी भी ताला नही लगाया जाता, जायरीनों के लिये हमेशा दरगाह केदरवाजे खुले रहते है।
आम आदमी से सांसद तक आते है चादर चढ़ाने
दरगाह में बाबा की मजार पर चादर चढ़ाने केलिये आम आदमी से लेकर सांसद, विधायक, आईएएस और पीसीएस अधिकारी तक आते है। उनका मानना है कि दरगाह में आकर मांगी गई मन्नतें पूरी हो जाती है।