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तो अब बहुगुणा और रावत होंगे आमने-सामने

Sun, 25 May 2014 04:26 PM IST
अनूप वाजपेयी/ अमर उजाला, देहरादून
अनूप वाजपेयी/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 25 May 2014 04:26 PM IST
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assembly election in uttarakhand

उत्तराखंड की राजनीति पंचायत चुनाव और विधानसभा के उपचुनाव के साथ ही खाली हो रही राज्यसभा की एक मात्र सीट को लेकर भी गरम है।

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इस सीट को लेकर कांग्रेस का दावा मजबूत
भाजपा नेता भगत सिंह कोश्यारी के लोकसभा चुनाव जीतने पर राज्यसभा की सीट खाली हो रही है।

हालांकि जून में राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त भी हो रहा था। विधायकों के अंक गणित में इस सीट को लेकर कांग्रेस का दावा अधिक मजबूत है।

राज्यसभा सीट को लेकर न चाहते हुए भी एक बार फिर विजय बहुुगुणा और हरीश रावत आमने-सामने होंगे। विजय बहुगुणा की निगाह इस सीट पर है।

बहुगुणा को चाहिए यह सीट
बहुगुणा चाहते हैं कि दो साल के लिए मिलने वाली राज्यसभा की सदस्यता लेकर फिलहाल सीधे तौर पर प्रदेश की राजनीति से खुद को अलग कर लें। जबकि हरीश रावत विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल को राज्यसभा भेजना चाहते हैं।

रावत कतई नहीं चाहते हैं कि विजय बहुगुणा फिलहाल सितारगंज सीट से इस्तीफा दें। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर वहां उपचुनाव हुए तो कांग्रेस को सीट गंवानी पड़ सकती है।
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लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सितारगंज में करीब 20 हजार मतों से हारी है। मुख्यमंत्री के लिए इस समय एक-एक सीट महत्वपूर्ण है।

हरीश रावत कुंजवाल को राज्यसभा भेजकर एक तीर से दो निशाने भी लगाते दिख रहे हैं। पहला सतपाल महाराज के समर्थक और विधानसभा उपाध्यक्ष अनुसूया प्रसाद मैखुरी को अध्यक्ष बनाकर पूरी तरह संतुष्ट कर दिया जाए।
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दूसरे कुंजवाल की खाली हो रही जागेश्वर सीट से चुनाव लड़ने का एक और विकल्प मिल जाएगा। कुमाऊं में सिर्फ दो ही विधानसभाएं धारचूला और जागेश्वर में कांग्रेस जीती है।


दिल्ली में लॉबिंग भी शुरू
जागेश्वर में कुंजवाल की छवि और अपने पुराने अल्मोड़ा कनेक्शन का लाभ मुख्यमंत्री सुरक्षित सीट केतौर पर कर सकते हैं।
विजय बहुगुणा ने राज्य सभा सीट के लिए दिल्ली में लॉबिंग भी शुरू कर दी है।

ऐसे में मुख्यमंत्री भी अंकों का गणित और कुंजवाल को साथ ले जाकर दिल्ली दरबार से अपने प्लान पर मुहर लगवाना चाहते हैं। लोकसभा चुनाव में हार के बाद अभी तक हरीश रावत दिल्ली नहीं गए हैं।

वर्तमान परिस्थितियों में जिस तरह अमृता रावत को हटाने का फैसला हुआ है उससे मुख्यमंत्री की राजनीतिक ताकत बढ़ी है।

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