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उत्तराखंड में कुटीर उद्योग: पारंपरिक हस्तशिल्प से बनाई दूरी, पलायन बन गई युवाओं की मजबूरी

Mon, 25 Nov 2019 08:54 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Mon, 25 Nov 2019 08:54 AM IST
सार

  • दूरदराज पर्वतीय क्षेत्रों में सिमट गया पारंपरिक कालीन उद्योग
  • आजीविका के अन्य विकल्प तलाशने को पलायन के लिए मजबूर

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Antique Handicraft Carpet Industry bad Condition in uttarakhand
कालीन उद्योग - फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर

विस्तार

उत्तराखंड का प्राचीन हस्तशिल्प कालीन उद्योग तकनीकी युग में धीरे-धीरे सिमट रहा है। जबकि  किसी जमाने में पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली जैसे दूरदराज के पर्वतीय जिले कभी इसी उद्योग से फल फूल रहे थे। लेकिन अब युवा पीढ़ी की इस पारंपरिक हस्तशिल्प से दूरी बना कर पलायन मजबूर बन गई है।

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आजीविका के तौर पर युवा पीढ़ी इस पुस्तैनी कारोबार को अपनाना नहीं चाहती है। रोजगार के अन्य विकल्प तलाशने के लिए पलायन कर रहे हैं। पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भी पिथौरागढ़ से युवाओं ने रोजगार के लिए पलायन किया है। यदि सरकार इस परंपरागत उद्योग को आधुनिक स्वरूप दे तो युवाओं के लिए रोजगार का बड़ा साधन बन सकता है। 
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कभी पूरे देश में अलग पहचान रखने वाले धारचूला-मुनस्यारी के दन कालीन का कारोबार अब सिमटने लगा है। चीन और कोरिया सहित मशीनों में निर्मित आकर्षक डिजाइन के कपड़ों के बाजार में आने से परंपरागत हस्तशिल्प को नुकसान उठाना पड़ा है। बाजार में मांग घटने से युवा पीढ़ी हस्तशिल्प से किनारा करने लगी है। धारचूला और मुनस्यारी में कभी पांच हजार से अधिक परिवार ऊनी हस्तशिल्प पर निर्भर थे।
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तिब्बत से ऊन आयात करने के साथ ही स्थानीय स्तर पर भी भेड़ों से ऊन निकाला जाता था। यहां के ऊन से निर्मित दन, कालीन, स्वेटर, मफलर, मोजे, दस्ताने, पंखी, चुटका और थुलमा की बाजार में बड़ी मांग थी।

इनका है कहना

लेकिन तकनीकी युग में मशीनों ने हस्तशिल्प कारीगरों के हाथों से तैयार उत्पादों की मांग कम दी है। अब अधिकतर परिवारों ने परंपरागत कारोबार को छोड़कर नौकरी या अन्य व्यवसाय शुरू कर दिया है।

दशकों पूर्व तक ऊन से बने कालीन व कपड़ों की अच्छी मांग थी। लेकिन अब बाजार में हाथ से बुने इन उत्पादों की मांग कम हो गई है। नई पीढ़ी इस कारोबार में नहीं आना चाहती है। सरकार को परंपरागत हस्तशिल्प को बचाने के लिए ठोस प्रयास करने चाहिए। इस प्राचीन व्यवसाय को बढ़ावा मिलने से दूरदराज गांव से पलायन रूक सकता है।
-रमेश पांगती, गांव दरकोट, मुनस्यारी 

हस्तशिल्प पुश्तैनी व्यवसाय था। शादी विवाह में दन, कालीन को गिफ्ट करने का रिवाज था। दन बनाने से फुरसत नहीं मिलती थी। सोफा सेट में बिछाने के लिए भी ऊन के दनों की अब डिमांड नहीं आती है।
- राजेश्वरी पांगती

ऊनी हस्तशिल्प की आज भी अलग पहचान है। मशीनों में निर्मित विदेशी सस्ते सामान के बाजार में आने से हस्तशिल्प को भारी नुकसान पहुंचा है। मांग नहीं होने से हजारों परिवारों ने दूसरा व्यवसाय शुरू कर दिया है। हस्तशिल्पियों को दन, कालीन और बाजार की मांग के अनुरूप सामान तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
-लीला बनग्याल, संचालिका, शिवालय महिला ऊनी हथकरघा हस्तशिल्प 

उत्तराखंड में हथकरघा व हस्तशिल्प उद्योग में रोजगार की काफी संभावनाएं है। मेरा मानना है कि इन परंपरागत उद्योगों को भी मार्डन कर नया स्वरूप  देने की जरूरत है। इसमें उत्पाद की डिजाइन व तकनीकी पर ध्यान देना होगा। हस्तशिल्पी क्या उत्पाद बना रहे हैं और बाजार की डिमांड क्या है। इस गेप को दूर करने के लिए सरकार को प्रयास करना चाहिए।
-पंकज गुप्ता, अध्यक्ष, इंडस्ट्री एसोसिएशन आफ उत्तराखंड

बागेश्वर में सिमट रहा कालीन उद्योग

जनपद में प्राचीन समय से ही कालीन उद्योग स्वरोजगार का साधन था, लेकिन अब इनका प्रचलन कम हो गया है। बागेश्वर के मोहल्ला भोटिया पड़ाव, जीतनगर मंडलसेरा, बनखोला, नई बस्ती चौरासी समेत कांडा के ग्राम थाला, कपकोट के ग्राम फरसाली, शामा के कई लोग काली, मोजे, टोपी, स्वेटर, दन, मफलर, थुमला, कोट, जैकेट हथकरघा से बनाते थे। हस्तशिल्पियों को एक कालीन तैयार करने में महीना भी लग जाता है।

जिससे कालीन कीमत भी ज्यादा होती है। लेकिन अब हस्तशिल्पी महंगी कालीन खरीदने से बच रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह भी है कि बाजार में तीन, चार सौ रुपये तक की प्लास्टिक की दरियां, चटाई मिल रही है। इसकी वजह से कालीन व्यवसाय सिमटा रहा है। हस्तशिल्पी इस पुस्तैनी कारोबार को छोड़ कर दूसरा व्यवसाय अपनाने के लिए पलायन करने को मजबूर हैं। 

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