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'परिवेश के अनुरूप हों पहाड़ पर निर्माण'

Sat, 17 Aug 2013 09:25 PM IST
देहरादून/ब्यूरो
देहरादून/ब्यूरो Updated Sat, 17 Aug 2013 09:25 PM IST
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amarujala and hesko foundation

आपदाओं के खतरे को देखते हुए उत्तराखंड में भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप ही पहाड़ पर निर्माण किया जाना चाहिए। यह बात अमर उजाला फाउंडेशन और हेस्को की ओर से ‘निर्माण प्रबंधन के तौर तरीके’ पर आयोजित कार्यशाला में उभरी।

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विशेषज्ञों ने पहाड़ पर निर्माण में स्थानीय सामग्री के इस्तेमाल पर जोर दिया। मकान इस तरह बनाने पर भी विमर्श हुआ, जिससे आपदा के दौरान होने वाली क्षति को न्यूनतम किया जा सके।
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शनिवार को हेस्को गांव शुक्लापुर में आयोजित कार्यशाला में अहमदाबाद से आये इंजीनियर राजेंद्र देसाई ने स्विट्जरलैंड के पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर उत्तराखंड में बनने वाले मकानों के माडलों का प्रजेंटेशन दिया। कहा कि उत्तराखंड में यमुना घाटी, भागीरथी घाटी और चमोली में अलग-अलग तरह के मकान बनाए जाते हैं, लेकिन अब हर क्षेत्र के अनुकूल माडल की जरूरत है।
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देव कुटी का प्रजेंटेशन
आईआईटी एल्यूम्नाई एसोसिएट्स के गोपाल हेवेलिया ने देव कुटी का प्रजेंटेशन दिया गया। इस दौरान मकान में स्वच्छ पेयजल आपूर्ति, सफाई व्यवस्था, सोलर लाइट सहित अन्य बिंदुओं पर भी चर्चा की गई।

अमर उजाला फाउंडेशन के प्रोजेक्ट हेड संजय देव ने कहा कि जल्द ही एक विशेषज्ञों का एक दल मकान बनाने के लिए आपदाग्रस्त क्षेत्रों का स्थलीय निरीक्षण भी करेगा। हेस्को के अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि आपदाग्रस्त क्षेत्रों में स्थानीय निर्माण सामग्री का प्रयोग होना चाहिए। कोशिश होनी चाहिए कि मजदूर से लेकर सभी समान स्थानीय स्तर पर ही मुहैया हो जाए।

इस मौके पर वन अनुसंधान संस्थान के डा. सुभाष नौटियाल, डा. किशोर कुमार, राजेश भंडारी, इंस्टीट्यूट आफ इंजीनियर्स इंडिया के चेयरमैन जेपी तोमर और आरपी जमलोकी ने भी अपने विचार रखे।

जल प्रलय के दौरान रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, चमोली सहित अन्य जिलों के आपदाग्रस्त क्षेत्रों में किस तरह के भवन बचे हैं। उन भवनों की निर्माण तकनीक क्या है, इसका अध्ययन किया जाना चाहिए।
-प्रोफेसर अजय गैरोला, हेड, आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन विभाग आईआईटी रुड़की

आपदा से निपटने के लिए पुरानी तकनीक से जुड़ने की जरूरत है। लोगों को प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि सरकारी मदद मिलने तक वे अपने स्तर पर ही राहत एवं बचाव कार्य कर सकें।

-एसटीएस लेप्चा, अपर प्रमुख वन संरक्षक वित्त एवं नियोजन


कहां सड़कें बननी चाहिए, कहां गांव। इसका अध्ययन करने के लिए वाडिया संस्थान तैयार है। जहां भी जरूरत पड़ेगी, हमारा संस्थान तकनीकी तौर पर पूरी मददद करेगा।
-डा. विक्रम गुप्ता, वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलाजी

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