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अमर उजाला अपराजिता: ‘स्टांप’ की तरह इस्तेमाल नहीं होना तो आगे आएं महिलाएं 

Wed, 16 Oct 2019 08:39 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाल, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाल, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Wed, 16 Oct 2019 08:39 AM IST
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Amar ujala Aprajita 100 million smiles Women Presence in Elections in dehradun
अपराजिता कार्यक्रम में भाग लेती महिलाएं - फोटो : अमर उजाला

छोटी सरकारों में ‘प्रधान पति’, ‘बीडीसी मेंबर पति’, ‘जिला पंचायत सदस्य पति’ आदि शब्दों का तिलिस्म टूटने जा रहा है। महिलाएं दिखा रही हैं कि यदि गांव की सत्ता में उनका नाम दर्ज है तो शासन भी वे अब खुद करेंगी।

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फिर चाहे इसके लिए उन्हें कितना ही विरोध क्यों न झेलना पड़े। महिलाओं की इस दृढ़ता की झलक अमर उजाला कार्यालय में अपराजिता कार्यक्रम में दिखाई दी। इसमें महिला जनप्रतिनिधियों (मौजूदा प्रत्याशी) ने बेबाकी से राय रखी कि उन्हें ‘स्टांप’ की तरह इस्तेमाल होने से बचना है तो खुद ही आगे आना होगा। 
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दरअसल, त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में 50 फीसदी आरक्षण के तहत महिलाएं चुनाव तो लड़ती हैं, लेकिन जीतने के बाद सत्ता उनके पति के नाम से चलती है। पति और ससुर के नाम का सिलसिला चुनाव प्रचार से विभागीय बैठकों तक जारी रहता है। इनमें ज्यादातर प्रधान पति मौजूद रहते हैं। मंगलवार को अपराजिता कार्यक्रम में आईं महिला जनप्रतिनिधियों में से अधिकतर ने इस बात को स्वीकार किया। लेकिन, उनमें बदलाव का जज्बा भी दिखा। कुछ महिलाओं ने कहा कि उन्होंने यह ट्रेंड घर और समाज से लड़कर बदला है।
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जबकि, कुछ ने कहा कि मजबूरियां ऐसी हैं कि महिलाएं पुरुष जनप्रतिनिधि की तरह खुलकर काम नहीं कर सकती। क्योंकि उन पर कई अघोषित प्रतिबंध रहते हैं। हालांकि, इन्हीं में से कुछ महिलाएं इस मामले में मुखर नजर आईं और कहा कि महिलाओं को जितने अधिकार मिले हैं वह उन्होंने समाज से लड़कर हासिल किए हैं। लिहाजा इस मामले में भी उन्हें लड़ना होगा। कार्यक्रम में रामपुर कलां की प्रधान प्रत्याशी नाहिदा रहमान, पूर्व प्रधान शाहिदा परवीन, माजरीग्रांट की किरन पाल, रतनपुर की नर्मदा बिष्ट, नगीना रानी, पुरोहितवाला की प्रधान मीना क्षेत्री, गल्जवाड़ी की लीला शर्मा, मोतीपुर की अरुणा सिंह, मिठ्ठी बेरी की राधा देवी शामिल हुईं। 

महिलाओं और सरकार को दिए सुझाव 
कार्यक्रम में पहुंची ज्यादातर महिलाएं लंबे समय से गांवों की राजनीति में सक्रिय हैं। इस बार भी किस्मत आजमा रहीं हैं। वह गांव का विकास किस तरह करें इसके लिए उन्होंने सरकार और महिलाओं को सुझाव दिए। 

- प्रधानों, बीडीसी मेंबर व जिपं सदस्यों के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएं।
- शिक्षा का जो स्तर सरकार ने रखा है उसमें जाति विशेष के लिए वर्गीकरण नहीं होना चाहिए। 
- सभी जातियों के प्रत्याशियों के लिए पढ़ाई का स्तर एक जैसा हो, ताकि कामकाज को समझ सकें। 
- ग्रामीण जनप्रतिनिधियों के लिए और भी अधिकार होने चाहिए जिससे गांवों का तेजी से विकास हो।

ये भी रखी राय
- महिलाओं को अपना मैनेजमेंट खुद बनाना होगा, ताकि वे घर के साथ-साथ गांव की सत्ता को भी संभाल सकें। 
- एक बार जब वे सत्ता संभाल लें तो फिर उनके काम में पति और ससुर के नाम की एंट्री नहीं होनी चाहिए। 
- ग्रामीण क्षेत्रों में चुनाव के तरीके को बदलने के लिए महिलाएं ही आगे आएं और समाज की कुरीतियों से लड़ें। 

कुचलने वालों को कुचलकर आगे बढ़ो
जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद क्या-क्या समस्याएं उनके सामने आती हैं इस पर भी महिलाओं ने खुलकर बात की। किसी ने कहा कि उनका विरोध घर से शुरू हो गया। कुछ ने कहा कि वे बाहरी लोगों से प्रताड़ित होती हैं। बात-बात पर उन्हें परेशान किया जाता है। पुलिस भी कई मामलों में बात नहीं सुनती। ऐसे में महिलाओं का कहना था कि वे इन सबको कुचलकर आगे बढे़ं।

हम तीन हैं और वह ‘300’ लड़ाई जारी है
मैं पिछले 18 सालों से रामपुर कलां गांव की प्रधान थीं। इस बार मैंने अपनी बेटी को मैदान में उतारा है। हम तीन हैं और वह 300 हैं, लेकिन लड़ाई जारी है। हमारी ईमानदारी है। यही ईमानदारी इस बार भी हमें जीताएगी।
-शाहीदा परवीन, पूर्व प्रधान रामपुर कला 

मां से सीखा मजबूत रहना 
मां लंबे समय तक ग्राम प्रधान रहीं हैं। वह रात के दो बजे भी लोगों के साथ थाने-चौकियों में बैठी हैं। इसी तरह से मुझे भी मजबूत रहना है और लोगों के हक की लड़ाई लड़नी है। 

- नाहिदा रहमान, प्रत्याशी ग्राम प्रधान रामपुर कला

मेरी ईमानदारी ही थी कि इस बार निर्विरोध बनीं 
मैं तीन बार ग्राम प्रधान रह चुकी हूं। हर मोर्चे पर मैंने और मेरे परिवार ने गांववालों की समस्याएं उठाई हैं। ईमानदारी के साथ काम किया। इसीलिए ग्रामीणों ने मुझे इस बार इसका ईनाम दिया और निर्विरोध चुना। मेरे गांव में चुनाव के दौरान कभी शराब नहीं बांटी गई।
-मीनू क्षेत्री, ग्राम प्रधान पुरोहितवाला 

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