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विश्व पर्यावरण दिवस 2020: कोरोना के बाद पर्वतीय क्षेत्र में प्रकृति पर आधारित पर्यटन ही अधिक फलीभूत होगा
Fri, 05 Jun 2020 04:25 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
दीप जोशी, अमर उजाला, अल्मोड़ा
दीप जोशी, अमर उजाला, अल्मोड़ा
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Fri, 05 Jun 2020 04:25 PM IST
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वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना के बाद प्रकृति पर आधारित पर्यटन का महत्व काफी बढ़ गया है और आने वाले दिनों में इसी तरह का पर्यटन अधिक फलीभूत होगा। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ईसीमोड) के माध्यम से कंचनजंघा भू-क्षेत्र संरक्षण एवं विकास पहल परियोजना के तहत कंचनजंघा इलाके में भारत, नेपाल और भूटान द्वारा चलाए जा रहे होम स्टे और अन्य तरह की गतिविधियों को इसका अच्छा मॉडल मान रहे हैं जिसे पूरे पर्वतीय क्षेत्र में अपनाया जाना चाहिए।
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कोरोना संक्रमण के बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बदली हुई परिस्थितियों में पर्वतीय क्षेत्र में पर्यटन के साथ ही अन्य गतिविधियों को पहले की तरह संचालित नहीं किया जा सकता और अब सभी कार्य सतर्कता तथा सावधानी से करने होंगे। वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना के बाद पहाड़ी इलाकों में प्रकृति पर आधारित पर्यटन अधिक सुरक्षित और व्यावहारिक हो सकता है।
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जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के निदेशक डॉ.आरएस रावल ईसीमोड के तहत पिछले दो साल से भारत के कंचनजंघा हिमालयी क्षेत्र में चल रही परियोजना को इसका एक बेहतर मॉडल मानते हैं। इस इलाके में रहने वाले लेप्चा जनजाति सहित अन्य समुदायों के लोग प्रकृति को भगवान की तरह पूजते हैं। पर्यटन, कुटीर उद्योग सहित किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि को संचालित करने पर वह प्रकृति को सर्वोपरि रखते हैं और इसे किसी
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तरह का नुकसान नहीं होने देते। किसी भी परिस्थिति में प्रकृति से सामंजस्य बनाकर ही काम करते हैं।
आज के दौर में जहां लोग अब होम स्टे को भी धीरे-धीरे होटल का रूप देते जा रहे हैं लेकिन कंचनजंघा के इस इलाके में चल रहे होम स्टे में बिल्कुल घर का जैसा वातावरण मिलता है। वहां होम स्टे में रहने वाले पर्यटक स्थानीय लोगों के बीच बहुत अच्छी तरह घुलमिल जाते हैं। उनकी संस्कृति और परंपरा को समझने का भी अवसर मिलता है। वहां लोगों ने कंचनजंघा कंजरवेशन कमेटी भी बनाई है और किसी भी तरह के विकास कार्य इसी कमेटी की सहमति से होते हैं।
स्थानीय लोग बिच्छू घास के रेशों से कई तरह की आकर्षक चीजें तैयार कर रहे हैं। इसके अलावा बांस से भी कंडिया आदि कई प्रकार की चीजें बनाते हैं जिन्हे पर्यटक बहुत पसंद करते हैं। जिससे स्थानीय लोगों को अच्छी आय होती है।
क्या है कंचनजंघा भू-क्षेत्र संरक्षण एवं विकास पहल परियोजना
पिछले दो साल से चल रही कंचनजंघा भू क्षेत्र संरक्षण एवं विकास पहल के तहत भारत, नेपाल और भूटान मिलकर काम कर रहे हैं। यह परियोजना सिक्किम के कंचनजंघा इलाके में 25 हजार 80 वर्ग किमी क्षेत्र में चल रही है। इसमें 56 प्रतिशत क्षेत्र भारत में, 21 प्रतिशत नेपाल और 23 प्रतिशत क्षेत्र भूटान के अंतर्गत आता है लेकिन अलग-अलग देशों में होते हुए भी इस चिन्हित क्षेत्र की प्राकृतिक स्थिति, परंपराएं, संस्कृति, रहन-सहन आदि एक जैसा है। परियोजना के तहत तीनों देश अपने क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। इस परियोजना के लिए ईसीमोड के अलावा भारत सरकार के अंतर्गत राष्ट्रीय हिमालयन अध्ययन मिशन द्वारा भी बजट दिया जा रहा है। भारत की ओर से इस परियोजना में जीबी पंत हिमालय पर्यावरण संस्थान प्रतिनिधित्व करता है।
कोरोना के बाद हाल में हुए की वेबीनार्स में वैज्ञानिक यह मत व्यक्त कर चुके हैं कि आगे प्रकृति पर आधारित सोल्यूशन (समाधान) की तरफ ही अधिक ध्यान देना जरूरी होगा। प्रकृति के विरुध्द कार्य करने से दुष्परिणाम ही सामने आएंगे। अब प्रकृति पर आधारित पर्यटन को बढ़ावा देने की जरूरत है।
- डॉ.आरएस रावल निदेशक जीबी पंत हिमालय पर्यावरण विकास संस्थान कोसी कटारमल अल्मोड़ा