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सूखे जलस्रोतों को पुर्नजीवित करने के लिए सर्वे शुरू
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ब्यूरो/अमर उजाला/देहरादून।
राज्य के पर्वतीय इलाकों में साल दर साल तेजी से सूख रहे झरनों को नए सिरे से पुनर्जीवित करने के लिए तकनीकी सर्वे शुरू कर दिया गया है। योजना के पहले चरण में सभी वन प्रभागों के 10-10 झरनाें को पुनर्जीवित करने की योजना है। प्रमुख वन संरक्षक ने इस बाबत 15 मई तक रिपोर्ट तलब की है। 15 मई के बाद निर्माण शुरू कर दिया जाएगा। पहले चरण में उन महत्वपूर्ण झरनों को रिचार्ज किया जाएगा जिन पर बड़ी आबादी आश्रित है।
प्रमुख वन संरक्षक जयराज ने बताया कि योजना के पहले चरण में 221 झरनों को रिचार्ज किया जाएगा। इस पर वन विभाग 20 करोड़ रुपये खर्च करेगा। योजना को धरातल पर उतारने के लिए राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान रुड़की, आईआईटी रुड़की समेत देश के कई तकनीकी संस्थानों के विशेषज्ञों के अलावा वन विभाग, सिंचाई, पीडब्ल्यूडी समेत कई सरकारी विभागों की मदद ली जा रही है। तकनीकी विशेषज्ञ जीपीएस की मदद से इन सभी झरनों को चिह्नित कर रहे हैं।
बता दें, उत्तराखंड समय देश के सभी हिमालयी राज्यों में प्राकृतिक झरने तेजी से सूख रहे हैं। इसकी वजह से सभी पर्वतीय राज्यों में पानी की किल्लत साल दर साल तेजी से बढ़ रही है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले उत्तराखंड के अल्मोड़ा में ही पिछले 150 साल में 300 बड़े झरने पूरी तरह सूख चुके हैं। इतना ही नहीं वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के विशेषज्ञों की ओर से किए गए शोध में भी पर्वतीय इलाकों में झरनों के तेजी से सूखने की बात सामने आई है।
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पानी की कमी से हो रहा पलायन
पर्वतीय इलाकों में प्राकृतिक जलस्रोतों की सूखने की वजह से पलायन भी तेजी से बढ़ा है। ऐसे में यदि झरनों को नए सिरे से रिचार्ज किया जाता है तो ना सिर्फ पलायन को रोका जाएगा वरन सामरिक दृष्टिकोण से भी कई फायदे होंगे। पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के पर्वतीय इलाकाें से हो रहे पलायन की कई वजहे हैं। इसमें पानी की कमी भी एक है।
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राज्य के पर्वतीय इलाकों में साल दर साल तेजी से सूख रहे झरनों को नए सिरे से पुनर्जीवित करने के लिए तकनीकी सर्वे शुरू कर दिया गया है। योजना के पहले चरण में सभी वन प्रभागों के 10-10 झरनाें को पुनर्जीवित करने की योजना है। प्रमुख वन संरक्षक ने इस बाबत 15 मई तक रिपोर्ट तलब की है। 15 मई के बाद निर्माण शुरू कर दिया जाएगा। पहले चरण में उन महत्वपूर्ण झरनों को रिचार्ज किया जाएगा जिन पर बड़ी आबादी आश्रित है।
प्रमुख वन संरक्षक जयराज ने बताया कि योजना के पहले चरण में 221 झरनों को रिचार्ज किया जाएगा। इस पर वन विभाग 20 करोड़ रुपये खर्च करेगा। योजना को धरातल पर उतारने के लिए राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान रुड़की, आईआईटी रुड़की समेत देश के कई तकनीकी संस्थानों के विशेषज्ञों के अलावा वन विभाग, सिंचाई, पीडब्ल्यूडी समेत कई सरकारी विभागों की मदद ली जा रही है। तकनीकी विशेषज्ञ जीपीएस की मदद से इन सभी झरनों को चिह्नित कर रहे हैं।
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बता दें, उत्तराखंड समय देश के सभी हिमालयी राज्यों में प्राकृतिक झरने तेजी से सूख रहे हैं। इसकी वजह से सभी पर्वतीय राज्यों में पानी की किल्लत साल दर साल तेजी से बढ़ रही है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले उत्तराखंड के अल्मोड़ा में ही पिछले 150 साल में 300 बड़े झरने पूरी तरह सूख चुके हैं। इतना ही नहीं वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के विशेषज्ञों की ओर से किए गए शोध में भी पर्वतीय इलाकों में झरनों के तेजी से सूखने की बात सामने आई है।
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पानी की कमी से हो रहा पलायन
पर्वतीय इलाकों में प्राकृतिक जलस्रोतों की सूखने की वजह से पलायन भी तेजी से बढ़ा है। ऐसे में यदि झरनों को नए सिरे से रिचार्ज किया जाता है तो ना सिर्फ पलायन को रोका जाएगा वरन सामरिक दृष्टिकोण से भी कई फायदे होंगे। पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के पर्वतीय इलाकाें से हो रहे पलायन की कई वजहे हैं। इसमें पानी की कमी भी एक है।