{"_id":"5ba9384d867a557ebb22e627","slug":"171537816653-dehradun-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"श्राद्ध शुरू, घरों में किए गए पितरों के तर्पण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
श्राद्ध शुरू, घरों में किए गए पितरों के तर्पण
Updated Tue, 25 Sep 2018 12:47 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ब्यूरो/अमर उजाला, लक्सर
पूर्णिमा के दिन सोमवार को श्राद्ध पक्ष शुरू हो गया। पहले दिन कई घरों में लोगों ने पितरों का तर्पण किया और ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। पितरों के तर्पण का सिलसिला अब आठ अक्तूबर तक चलेगा।
देवताओं को प्रसन्न करने से पहले अपने पितरों को प्रसन्न करना जरूरी है। यही कारण है कि हिंदू धर्म में श्राद्ध पक्ष का बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि अगर किसी मनुष्य का श्राद्ध और तर्पण विधि विधान से न किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती है। ज्योतिषी भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक मानते हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित संदीप भारद्वाज बताते हैं कि ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध के दिनों में हमारे पितृ धरती पर आ जाते हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार, जो भी वस्तु उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम उचित विधि से ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दी जाए वह श्राद्ध कहलाता है।
श्राद्ध के माध्यम से पितरों को तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है। पिंड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है। पितरों की शांति के लिए श्राद्ध जरूरी है। श्राद्ध में तिल, चावल, जौ, कुश को अधिक महत्व दिया जाता है। पुराणों में इस बात का भी जिक्र है कि श्राद्ध का अधिकार केवल योग्य ब्राह्मणों को है। श्राद्ध का प्रथम अंश कौआ को दिया जाता है। श्राद्ध मृत्यु की तिथि के अनुसार किया जाता है। जिन्हें पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इस दिन को सर्वपितृ श्राद्ध कहा जाता है। सोमवार को कई घरों में पित्रों का श्राद्ध किया गया। तर्पण भी दिए गए। पंडित अरविंद शर्मा कहते हैं कि श्राद्ध विधि विधान से करना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन
पूर्णिमा के दिन सोमवार को श्राद्ध पक्ष शुरू हो गया। पहले दिन कई घरों में लोगों ने पितरों का तर्पण किया और ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। पितरों के तर्पण का सिलसिला अब आठ अक्तूबर तक चलेगा।
देवताओं को प्रसन्न करने से पहले अपने पितरों को प्रसन्न करना जरूरी है। यही कारण है कि हिंदू धर्म में श्राद्ध पक्ष का बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि अगर किसी मनुष्य का श्राद्ध और तर्पण विधि विधान से न किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती है। ज्योतिषी भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक मानते हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित संदीप भारद्वाज बताते हैं कि ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध के दिनों में हमारे पितृ धरती पर आ जाते हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार, जो भी वस्तु उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम उचित विधि से ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दी जाए वह श्राद्ध कहलाता है।
विज्ञापन
श्राद्ध के माध्यम से पितरों को तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है। पिंड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है। पितरों की शांति के लिए श्राद्ध जरूरी है। श्राद्ध में तिल, चावल, जौ, कुश को अधिक महत्व दिया जाता है। पुराणों में इस बात का भी जिक्र है कि श्राद्ध का अधिकार केवल योग्य ब्राह्मणों को है। श्राद्ध का प्रथम अंश कौआ को दिया जाता है। श्राद्ध मृत्यु की तिथि के अनुसार किया जाता है। जिन्हें पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इस दिन को सर्वपितृ श्राद्ध कहा जाता है। सोमवार को कई घरों में पित्रों का श्राद्ध किया गया। तर्पण भी दिए गए। पंडित अरविंद शर्मा कहते हैं कि श्राद्ध विधि विधान से करना चाहिए।
विज्ञापन