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पुत्र वियोग में राजा दशरथ ने त्यागे प्राण
Updated Sun, 14 Oct 2018 02:04 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला, ऋषिकेश। श्रीरामलीला कमेटी सुभाष बनखंडी ऋषिकेश में आयोजित रामलीला मंचन में दशरथ मरण, केवट लीला, भरत मिलाप और चित्रकुट की लीलाओं का मंचन किया गया। श्रीरामचंद्र सरयू पार करने के लिए केवट नाविक की मदद लेते हैं। केवट श्रीराम के चरण धोते हुए कहते है कि प्रभु मैं आपको इस समय नदी पार कराऊंगा लेकिन आप से आग्रह है कि मेरी मृत्यु के बाद आप भी मझे भवसागर से पार कराएंगे। इस पहले लीला में राम के वनवास जाने पर मंत्री सुमंत राजा को बताते हैं कि श्रीराम ने अपने पिता के वचन निभाने के लिए वापस आने से मना कर दिया तो दशरथ ने पुत्र वियोग में प्राण त्याग देते हैं।
इसकी सूचना ननिहाल में राजकुमार भरत को दी जाती है। भरत, शत्रुघ्न अयोध्या लौटते हैं तो उन्हें सारी बात का पता चलता है। भरत महाराज दशरथ का अंतिम संस्कार करते हैं और दासी मंथरा को धक्के मार कर महल से बाहर निकाल देते हैं। जिसके बाद भरत पश्चाताप के लिए राम से मिलने के लिए तीनों माताओं के साथ वन में जाते हैं। राम-लक्षमण और सीता महाराज दशरथ के निधन की सूचना पाकर दुखी होते हैं और राज्य में आने से मना कर देते हैं।
राम कहते हैं कि वह रघुकुल की रीत नहीं तोड़ सकते और पिता को दिए वचन के अनुसार 14 वर्षो तक वन में रहेंगे। भरत राम के खड़ाऊं लेकर और वनवासी रहकर 14 साल तक राज्य चलाने का वचन देते हैं। जिसके बाद भरत माताओं को लेकर वापस अयोध्या लौट आते हैं। इस अवसर पर श्री रामलीला कमेटी के अध्यक्ष विनोद पाल, महामंत्री हरीश तिवाड़ी, इंद्र कुमार गोदवानी, सतीश पाल, निर्देशक मनमीत कुमार, रोहताश पाल, हुकुमचन्द्र, सुरेन्द्र कुमार, दीपक जोशी, राजेश दिवाकर, विनोद रतूडी, पप्पू पाल, महेंद्र सिंह, विनायक, मिलन, सतपाल जी, सुनील नेगी, भारतेंदु शंकर पांडे, नीतीश पाल, सागर कालरा, शशांक पाल, सुभाष पाल, राकेश पारचा, बाली पाल, मनोज गर्ग, प्रशांत पाल, ललित कुमार, अशोक मौर्य, संजय शर्मा, अनिल धीमान, राजू कुशवाहा, राजेश धीमान, राजेश साहनी, अमर आदि मौजूद थे।
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इसकी सूचना ननिहाल में राजकुमार भरत को दी जाती है। भरत, शत्रुघ्न अयोध्या लौटते हैं तो उन्हें सारी बात का पता चलता है। भरत महाराज दशरथ का अंतिम संस्कार करते हैं और दासी मंथरा को धक्के मार कर महल से बाहर निकाल देते हैं। जिसके बाद भरत पश्चाताप के लिए राम से मिलने के लिए तीनों माताओं के साथ वन में जाते हैं। राम-लक्षमण और सीता महाराज दशरथ के निधन की सूचना पाकर दुखी होते हैं और राज्य में आने से मना कर देते हैं।
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राम कहते हैं कि वह रघुकुल की रीत नहीं तोड़ सकते और पिता को दिए वचन के अनुसार 14 वर्षो तक वन में रहेंगे। भरत राम के खड़ाऊं लेकर और वनवासी रहकर 14 साल तक राज्य चलाने का वचन देते हैं। जिसके बाद भरत माताओं को लेकर वापस अयोध्या लौट आते हैं। इस अवसर पर श्री रामलीला कमेटी के अध्यक्ष विनोद पाल, महामंत्री हरीश तिवाड़ी, इंद्र कुमार गोदवानी, सतीश पाल, निर्देशक मनमीत कुमार, रोहताश पाल, हुकुमचन्द्र, सुरेन्द्र कुमार, दीपक जोशी, राजेश दिवाकर, विनोद रतूडी, पप्पू पाल, महेंद्र सिंह, विनायक, मिलन, सतपाल जी, सुनील नेगी, भारतेंदु शंकर पांडे, नीतीश पाल, सागर कालरा, शशांक पाल, सुभाष पाल, राकेश पारचा, बाली पाल, मनोज गर्ग, प्रशांत पाल, ललित कुमार, अशोक मौर्य, संजय शर्मा, अनिल धीमान, राजू कुशवाहा, राजेश धीमान, राजेश साहनी, अमर आदि मौजूद थे।
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