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मैने संस्कृत सीखते व्यक्ति को श्रेष्ठ व्यक्ति बनते देखा है: भरत चौधरी
Updated Sun, 04 Feb 2018 10:29 PM IST
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देवप्रयाग। श्री रघुनाथ कीर्ति राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान देवप्रयाग में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार के चौथे दिन संस्कृत व्याकरण परंपरा ‘बौद्ध वैयकरणानो योगदानम’ पर चर्चा की गई। इस मौके पर संस्थान के बौद्ध संस्कृत साहित्य संसाधन केंद्र का भी शुभारंभ किया गया।
रविवार को रुद्रप्रयाग के विधायक भरत सिंह चौधरी ने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान देवप्रयाग में सेमीनार के चौथे दिन कार्यक्रम का शुभारंभ किया। चौधरी ने संस्कृत भाषा के महत्व पर कहा कि ‘अफसोस है कि मैं अपनी बात संस्कृत में नहीं रख पा रहा हूं, जबकि मै एक भारतीय हूं जहां से संस्कृत का उदय हुआ है। आज भारतीय संस्कृत भाषा के महत्व को भुलाकर अंग्रेजी भाषा की ओर अग्रसर हो रहा है। अंग्रेजी सीखने के लिए लोगों में होड़ जैसी लगी है। इस दौड़ में मैने किसी को ओबामा या बिलगेट्स बनते नहीं देखा लेकिन संस्कृत सीखने वालों को श्रेष्ठ व्यक्ति बनते जरूर देखता आया हूं’। विधायक ने कहा कि संस्कृत भाषा के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए हर प्रयास किए जाएंगे।
संस्थान के प्राचार्य प्रो. केबी सुब्बारायदु ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्कृत भाषा के महत्व एवं सामाजिक व धार्मिक महत्व पर विचार रखे। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. केटी सराओ ने कहा कि बौद्ध मिश्रित संस्कृत साहित्य ने संपूर्ण जगत को मानवता, शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाया है। आज विश्वभर में बढ़ रही घरेलू एवं सामाजिक हिंसा को रोकने के लिए बौद्ध संस्कृत साहित्य का अध्ययन जरूरी है। जगन्नाथ विश्वविद्यालय पुरी (उड़ीसा) के कुलपति प्रो. किशोर चंद ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं बौद्धिक विचार परंपरा के संवर्द्धन में बौद्ध साहित्य का अहम योगदान रहा है, जो मानव को उसकी श्रेष्ठता तक पहुंचाता है। संगोष्ठी में प्रो. वनमाली विस्वाल ने बौद्ध व्याकरण के आचार्य चंद्रगोमी, भृतहरि, मैत्रेय आदि के योगदान पर चर्चा की। इस मौके पर प्रो. आर मुरुगेशन, प्रो. प्रफुल्ल गड़पाल, डा. शैलेंद्र उनियाल, डा. सुरेश शर्मा ने अतिथियों का स्वागत कर उनका आभार जताया। संचालन मनीष जुगराण ने किया।
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रविवार को रुद्रप्रयाग के विधायक भरत सिंह चौधरी ने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान देवप्रयाग में सेमीनार के चौथे दिन कार्यक्रम का शुभारंभ किया। चौधरी ने संस्कृत भाषा के महत्व पर कहा कि ‘अफसोस है कि मैं अपनी बात संस्कृत में नहीं रख पा रहा हूं, जबकि मै एक भारतीय हूं जहां से संस्कृत का उदय हुआ है। आज भारतीय संस्कृत भाषा के महत्व को भुलाकर अंग्रेजी भाषा की ओर अग्रसर हो रहा है। अंग्रेजी सीखने के लिए लोगों में होड़ जैसी लगी है। इस दौड़ में मैने किसी को ओबामा या बिलगेट्स बनते नहीं देखा लेकिन संस्कृत सीखने वालों को श्रेष्ठ व्यक्ति बनते जरूर देखता आया हूं’। विधायक ने कहा कि संस्कृत भाषा के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए हर प्रयास किए जाएंगे।
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संस्थान के प्राचार्य प्रो. केबी सुब्बारायदु ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्कृत भाषा के महत्व एवं सामाजिक व धार्मिक महत्व पर विचार रखे। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. केटी सराओ ने कहा कि बौद्ध मिश्रित संस्कृत साहित्य ने संपूर्ण जगत को मानवता, शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाया है। आज विश्वभर में बढ़ रही घरेलू एवं सामाजिक हिंसा को रोकने के लिए बौद्ध संस्कृत साहित्य का अध्ययन जरूरी है। जगन्नाथ विश्वविद्यालय पुरी (उड़ीसा) के कुलपति प्रो. किशोर चंद ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं बौद्धिक विचार परंपरा के संवर्द्धन में बौद्ध साहित्य का अहम योगदान रहा है, जो मानव को उसकी श्रेष्ठता तक पहुंचाता है। संगोष्ठी में प्रो. वनमाली विस्वाल ने बौद्ध व्याकरण के आचार्य चंद्रगोमी, भृतहरि, मैत्रेय आदि के योगदान पर चर्चा की। इस मौके पर प्रो. आर मुरुगेशन, प्रो. प्रफुल्ल गड़पाल, डा. शैलेंद्र उनियाल, डा. सुरेश शर्मा ने अतिथियों का स्वागत कर उनका आभार जताया। संचालन मनीष जुगराण ने किया।
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