फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   बेनजीर है कश्मीर, चले आइए वहां......

बेनजीर है कश्मीर, चले आइए वहां......

Thu, 06 Dec 2012 05:30 AM IST
Dehradun
Dehradun Updated Thu, 06 Dec 2012 05:30 AM IST
विज्ञापन
देहरादून। अगर आपने पुरानी हिंदी फिल्में देखी हैं, तो समझ जाएंगे कि कश्मीर वाकई बेनजीर है। बीच के कुछ सालों में अलगावादियों की वजह से घाटी में घुसने से सैलानी कतराने लगे, लेकिन 2006 के बाद फिजां में बदलाव है। पिछले साल तो रिकार्ड तोड़ टूरिस्ट दर्ज किए गए। दरअसल, सच तो यह है कि कश्मीरी अवाम अमन का ख्वाहिशमंद है, लेकिन नेता ऐसा नहीं होने देते। कश्मीर की खूबसूरती का बखान करते और हालात के जहर होने के लिए नेताओं को कोसते यह शब्द हैं, उन दस्तकारों के, जो पश्मीना शाल, सूट, स्टोल जैसे सामान लेकर परेड ग्राउंड में लगी प्रदर्शनी में पहुंचे हैं। इनके मुताबिक कश्मीर भी दूसरी जगहों की तरह कई समस्या झेल रहा है। युवाओं के लिए नौकरी नहीं, सड़कों की हालत अच्छी नहीं, कई-कई किलोमीटर के सफर में शौचालय के दर्शन नहीं होते। इसके बावजूद कश्मीर अभी भी धरती की जन्नत है। उमर अब्दुल्ला के मुख्यमंत्री बनने के बाद से हालात कुछ बदले हैं। वह जवान हैं, नई योजनाओं पर काम कर रहे हैं। इन दस्तकारों की लोगाें से गुजारिश है-वहां जरूर जाइए। बहुत प्यारे लोग हैं। उनसे मिलकर खुश होंगे।
विज्ञापन


टूरिस्ट तो आ रहे पर यह हालात चिंताजनक-------
नाम बताता हूं तो ट्रेन में सीट तक नहीं मिलती
कश्मीर के बदले हालातों के बीच वहां से बाहर निकलने पर इनकी मुश्किल भी कम नहीं। महज 12वीं तक पढ़े अनंतनाग के यासिर को इस बात का मलाल नहीं कि वह सरकारी नौकरी में नहीं। दस्तकारी के पुश्तैनी पेशे से उसे रोजी भर का मिल जाता है। उसकी दिक्कत दूसरी है। बकौल यासिर सब कुछ सही होने पर भी कुछ खलता है। लोगों के दिलों में बहुत भेद आ गया है। अपना नाम यासिर बताता हूं तो ट्रेन में सीट तक नहीं मिलती। यह सब चंद सिरफिरे लोगों का किया-धरा है, जिसे बड़े पैमाने पर कश्मीर के लोग झेल रहे हैं।
विज्ञापन


नौकरी मिले तो हैंडीक्राफ्ट छोड़ मन का काम करूं
22 साल के मोहम्मद इरफान के पास साफ्टवेयर इंजीनियरिंग में डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं। बकौल इरफान जम्मू-कश्मीर स्टेट में जम्मू के लोगों को प्राथमिकता दी जाती है। न जाने क्याें। सरकार नौकरी का इंतजाम नहीं कर पा रही। इसलिए हैंडीक्राफ्ट के खानदानी बिजनेस से जुड़ गया हूं। अगर नौकरी मिले तो हैंडीक्राफ्ट का काम छोड़कर अपने मन का काम करूं, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। कई बार अवाम के युवाओं ने इस मामले में सीएम से बात की है, लेकिन उसका कोई नतीजा सामने आता नहीं दिख रहा।
विज्ञापन
विज्ञापन


अमृतसर ने बर्बाद कर दिया कश्मीरी हैंडीक्राफ्ट को
कश्मीरी हैंडक्राफ्ट को अमृतसर ने बर्बाद कर छोड़ा है। मशीन पर तैयार आइटम वह कश्मीरी कहकर बाहर बेचते हैं। बकौल फिरदौस दस्तकारी का सामान महंगा होता है। ऐसे में खरीदार सस्ते सामान खरीदने को प्राथमिकता देते हैं। पश्मीना शाल की ही मिसाल लें। अमृतसर से तैयार जिस शाल को 1600 रुपये में कश्मीरी दस्तकारी का कमाल कहकर बेचा जा रहा है, दरअसल उसकी कीमत साढ़े सात हजार से ज्यादा पड़ती है। साफ है कि आइटम की पहचान न होने की वजह से ग्राहक को सस्ता सामान भाता है, लेकिन इससे दस्तकार मुश्किल में है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed