मास्टर ब्लास्टर ने दिया टीम इंडिया को सफलता का मंत्र
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वर्ल्ड कप से पहले बल्लेबाजी और गेंदबाजी विभाग में संघर्ष कर रही टीम इंडिया को संकट से निकालने का जिम्मा अब महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने उठा लिया है। 1992 से 2011 तक छह वर्ल्ड कप खेल चुके सचिन ने बल्लेबाजों को ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की पिचों पर अच्छा प्रदर्शन करने के टिप्स दिए हैं।
वर्ल्ड कप के दौरान ऑस्ट्रेलिया में होने वाले मैचों के बारे में सचिन ने कहा कि पर्थ और ब्रिसबेन की तेज व उछाल भरी पिचों पर अनुभवहीनता को उजागर होने में वक्त नहीं लगता। एक बल्लेबाज के तौर पर यदि आप पिच की तेजी और उछाल को समझ लेते हैं तो गेंदबाज पर हावी हो सकते हैं।
वहीं गेंदबाजों को उन्होंने बताया कि इन पिचों पर गुड लेंथ स्पॉट बहुत छोटा होता है और गेंदबाज की थोड़ी सी चूक का फायदा बल्लेबाज आसानी से उठा सकता है। लेकिन अगर इसी स्पॉट से गेंदबाज को उछाल मिले तो वह बल्लेबाजों का जीवन मुश्किल बना सकता है।
न्यूजीलैंड में होने वाले मुकाबलों के बारे में तेंदुलकर ने कहा कि बल्लेबाजों को वहां तेज हवाओं से भी सावधान रहना होगा। वहां कई मैदानों पर बेहद तेज हवा चलती है, जिससे बल्लेबाज की टाइमिंग खराब होने का खतरा रहता है। तेज हवा के विपरीत खेलते हुए बल्लेबाज की बैक लिफ्ट तेज होती है, लेकिन जब बल्ला नीचे की ओर आता है तो उसकी रफ्तार धीमी हो जाती है। बल्लेबाजों को इस बात का ध्यान रखना होगा।
सचिन के टिप्स कितना काम आएंगे यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन भारतीय खिलाड़ी इन पर अमल करने में कामयाब हो पाए तो टीम का प्रदर्शन काफी हद तक सुधर ही जाएगा।
'2011 में पहली बार आए थे खुशी के आंसू'
साल 2011 में वर्ल्ड कप में मिली खिताबी जीत को बेहद अनमोल पल करार देते हुए महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने खुलासा किया कि विश्व चैंपियन बनने के बाद पहली बार उनकी आंखों में खुशी के आंसू आए थे।
खिताब जीतने के बाद के लम्हों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि चैंपियन बनने के बाद जब मैं मैदान पर पहुंचा तो मेरी आंखों में आंसू थे। सिर्फ वही एक ऐसा पल था जब मेरी आंखों में खुशी के आंसू आ गए थे। वह इसलिए क्योंकि वह पल बेहद अनमोल थे। आप इसका सिर्फ सपना ही देख सकते हैं। कोई भी चीज वर्ल्ड चैंपियन बनने के उस पल की बराबरी नहीं कर सकती।
वर्ल्ड कप 2015 में इस्तेमाल होने वाले मैदानों के बारे में सचिन ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में मैदान काफी बड़े हैं। वहीं न्यूजीलैंड के मैदान पारंपरिक मैदानों की तरह गोल आकार के नहीं होते और बाउंड्री भी छोटी होती हैं। किसी मेहमान टीम के लिए ऐसे मैदानों में फील्ड पोजीशन और गेंदबाजी की रणनीति तय करना बिल्कुल भी आसान नहीं होता।