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कभी पेट भरने के लिए गेंदबाजी करने वाले पप्पू देवधर ट्रॉफी में दिखाएंगे कमाल

Sat, 20 Oct 2018 03:19 AM IST
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला Updated Sat, 20 Oct 2018 03:19 AM IST
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pappu roy gets chance in deodhar trophy his life is very inspirational
पप्पू राय

मुफलिसी और उसपर माता-पिता का साया भी सिर पर नहीं। खाना कभी मिलता था तो कभी नहीं। बावजूद इसके कोलकाता के पप्पू राय ने जिंदगी से हार नहीं मानी। अपनी शानदार फिरकी के दम पर उसने अपनी किस्मत बदल डाली। 

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कभी पेट भरने के लिए गेंदबाजी करने वाले 23 वर्षीय पप्पू अब देवधर ट्रॉफी में अजिंक्य रहाणे की भारत सी टीम में अपनी छाप छोड़ने को बेताब हैं। पप्पू ने जब 'मम्मी-पापा' कहना भी शुरू नहीं किया था तभी उनके माता-पिता का साया सिर से उठ गया था। पप्पू को अपने राज्य ओडिशा की तरफ से विजय हजारे ट्रॉफी में अच्छा प्रदर्शन करने का फल मिला है। 
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पप्पू ने अपने पुराने दिनों को याद किया जब प्रत्येक विकेट का मतलब होता था कि उन्हें दोपहर और रात का पर्याप्त खाना मिलेगा। वह कहते हैं, 'भैया लोग बुलाते थे और बोलते थे कि गेंद डालेगा तो खाना खिलाऊंगा। वह हर विकेट का दस  रुपये देते थे।'
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बचपन में ही माता-पिता का निधन : पप्पू के माता-पिता बिहार के सारण जिले में छपरा से 41 किमी दूर स्थित खजूरी गांव के रहने वाले थे। वे रोजी-रोटी के लिए कोलकाता आए थे। पप्पू ने अपने पिता जमादार रॉय और पार्वती देवी को तभी गंवा दिया था जबकि वह नवजात थे। उनके पिता ट्रक ड्राइवर थे और दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ। मां लंबी बीमारी के बाद चल बसी थी। उन्हें अपने माता-पिता के बारे में सिर्फ इतना ही मालूम है। 

टीम में चयन के बाद रोते रहे : कोलकाता के पिकनिक गॉर्डन में किराए पर रहने वाले पप्पू ने कहा, 'उनको कभी देखा नहीं। कभी गांव नहीं गया। मैंने उनके बारे में सिर्फ सुना है। काश कि वे आज मुझे भारत की तरफ से खेलते हुए देखने के लिए जीवित होते। मैं टीम में चयन होने पर पूरी रात सो नहीं पाया और रोता रहा। मुझे लगता है कि पिछले कई वर्षों की मेरी कड़ी मेहनत का अब मुझे फल मिल रहा है।'

क्रिकेट ने दिया नया जीवन : माता-पिता की मौत के बाद पप्पू के चाचा और चाची उनकी देखभाल करने लगे, लेकिन जल्द ही उनके मजदूर चाचा भी चल बसे। इसके बाद इस 15 वर्षीय किशोर के लिए एक समय का भोजन जुटाना भी मुश्किल हो गया, लेकिन क्रिकेट से उन्हें नया जीवन मिला। उन्होंने पहले तेज गेंदबाज के रूप में शुरुआत की लेकिन हावड़ा क्रिकेट अकादमी के कोच सुजीत साहा ने उन्हें बाएं हाथ से स्पिन गेंदबाजी करने की सलाह दी। 

वह 2011 में बंगाल क्रिकेट संघ की सेकंड डिवीजन लीग में सर्वाधिक विकेट लेने वाले गेंदबाज थे। उन्होंने तब डलहौजी की तरफ से 50 विकेट लिए थे, लेकिन तब इरेश सक्सेना बंगाल की तरफ से खेला करते थे और बाद में प्रज्ञान ओझा के आने से उन्हें बंगाल टीम में जगह नहीं मिली। भोजन और आवास की तलाश में पप्पू भुवनेश्वर से 100 किमी उत्तर पूर्व में स्थित जाजपुर आ गए।

दोस्तों ने बदली जिंदगी : पप्पू ने कहा, 'मेरे दोस्त (मुजाकिर अली खान और आसिफ इकबाल खान) जिनसे मैं यहां मिला, उन्होंने मुझसे कहा कि वे मुझे भोजन और छत मुहैया कराएंगे। इस तरह से ओडिशा मेरा घर बन गया।' उन्हें 2015 में ओडिशा अंडर-15 टीम में जगह मिली। 


तीन साल बाद पप्पू सीनियर टीम में पहुंच गए और उन्होंने ओडिशा की तरफ से लिस्ट-ए के आठ मैचों में 14 विकेट लिए। अब वह देवधर ट्रॉफी में खेलने के लिए उत्साहित हैं। उन्होंने कहा कि उम्मीद है कि मुझे मौका मिलेगा और मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करूंगा। इससे मुझे काफी कुछ सीखने को मिलेगा।

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