विदेशों में तिरंगा फहरा रही भारतीय क्रिकेट टीम, इस कारण सबसे महंगा बोर्ड बीसीसीआई कर रहा अनदेखी
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एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों'
दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियां जिंदगी में कुछ इस तरह फिट बैठती हैं कि मिसाल बन जाती है। वो कहते हैं न कि दृढ़ निश्चय किसी व्यक्ति का सबसे बड़ा हथियार है। इस शब्द का सबसे ज्यादा महत्व भारतीय दिव्यांग क्रिकेट टीम ने समझा, जिन्होंने अपने शरीर से हार नहीं मानी बल्कि ऐसा दम दिखाया कि दुनिया उनका लोहा मान रही है। इसका सबूत पेश करते हैं ये लाजवाब आंकड़े।
भारतीय दिव्यांग क्रिकेट टीम ने साल 2007 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में डेब्यू किया। इस टीम ने करीब 26 अंतरराष्ट्रीय सीरीज खेली, जिसमें से 23 में उसने मैदान फतह किया। भारतीय टीम ने 11 सालों में करीब 80 मैच खेले, जिसमें से 72 में जीत दर्ज की। वैसे द्विपक्षीय सीरीज में भारत का रिकॉर्ड सौ प्रतिशत है। वह जो मुकाबले हारी, वो सभी तीन देशों के बीच खेली गई सीरीज में हुआ। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि कोई कमजोर नहीं होता।
इन खिलाड़ियों ने अपनी कमजोरी को सबसे बड़ी ताकत बनाया और मैदान पर ऐसा खेले कि कोई कह नहीं सकता कि ये दिव्यांग हैं। खिलाड़ियों का हौसला आपको बताते हैं। मुकेश एक हाथ में बैसाखी लेकर चलते हैं, लेकिन उनका मानना है कि वह दिव्यांग नहीं हैं। यही पूरी भारतीय टीम के खिलाड़ियों का भी मानना हैं कि दुनिया उन्हें भले ही दिव्यांग समझे, लेकिन वह अपने आप को दिव्यांग नहीं मानते।
आखिर बीसीसीआई से पहचान क्यों नहीं मिल रही?
यह जानकर हर कोई भी हैरान रह जाएगा कि भारतीय दिव्यांग क्रिकेट टीम ने ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज गेंदबाजों माइक कास्प्रोविच और ब्रैड हॉग जैसे सितारों से सजी टीम को भी मात दी। भारतीय दिव्यांग टीम में कई स्टार खिलाड़ी मौजूद हैं, जो अपने दम पर मैच का रुख बदल देते हैं। बलराज, मंदीप, कप्तान रविंद्र कंबोज, मुकेश, विकेटकीपर सूरज मनकेले टीम के वो खिलाड़ी हैं, जिन्होंने भारतीय टीम को बुलंदियों पर पहुंचाया है।
हाल ही में भारतीय दिव्यांग टीम श्रीलंका दौरे से लौटी। तीन मैचों की टी-20 सीरीज को कंबोज ब्रिगेड ने 2-1 से जीता। विजयी ट्रॉफी हाथ में लिए भारतीय टीम जब देश लौटी तो उनका टीम इंडिया के क्रिकेटर्स जैसे जोरदार स्वागत नहीं हुआ। इसकी असली वजह का पता चला कि उन्हें सरकार या बीसीसीआई से किसी प्रकार की मदद नहीं मिली।
भारतीय दिव्यांग टीम अपने कोच अपरूप चक्रवर्ती समेत पूरे स्टाफ के साथ अमर उजाला के डिजिटल ऑफिस आई। हमारे साथ खास बातचीत में टीम के संस्थापक हारून रशीद ने बताया कि आखिर बीसीसीआई से उन्हें पहचान क्यों नहीं मिल रही है। राशीद ने कहा, 'वह समय दूर नहीं जब बीसीसीआई हमें पहचान देगी। फिलहाल कुछ परेशानियों के चलते ऐसा मुमकिन नहीं हुआ है। देश में हम ही ऐसी एसोसिएशन हैं, जो खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाती है। मगर बीसीसीआई के सामने चार एसोसिएशन के प्रस्ताव रखे हुए हैं कि वह भारतीय दिव्यांग टीम का भविष्य तय कर रहे हैं।'
सिस्टम की लड़ाई में उलझे दिव्यांग क्रिकेटर्स
यह पूछने पर कि चार एसोसिएशन के बीच विवाद खत्म क्यों नहीं हो रहा है? तो हारून ने बताया, 'एक एसोसिएशन बनने पर सभी लोग पद हासिल करने के लिए अलग-अलग पैंतरे अपनाएंगे। यह विवाद पहले भी गहरा चुका है और भविष्य में भी इसके बढ़ने की संभावना है। हमें उम्मीद है कि जल्द ही बीसीसीआई हमें पहचान देगा और भारतीय दिव्यांग टीम के प्रयास उसे सफलता के शिखर पर पहुंचाएंगे। फिर भारत के युवा टीम इंडिया के क्रिकेटरों के साथ-साथ राष्ट्रीय दिव्यांग टीम के खिलाड़ियों को भी रोल मॉडल मानेगी।'
हारून के बयान से संकेत मिले कि सिस्टम में राजनीति का शिकार एक बार फिर खिलाड़ी बन रहे हैं। एक एसोसिएशन बनाने के पीछे विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। ऐसे में बीसीसीआई की अनदेखी अनुचित नहीं लगती।
भारतीय दिव्यांग टीम के कोच अपरूप चक्रवर्ती ने बीसीसीआई से पहचान नहीं मिलने पर ध्यान दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित लोढ़ा समिति की सिफारिशों के कारण बोर्ड कई कामों में व्यस्त है। उन्होंने कहा, 'हमें श्रीलंका में जीत से देश में पहचान मिली है। कुछ नेताओं से हमारी मुलाकात होना है। साल 2019 तक उम्मीद कर सकते हैं कि बीसीसीआई हमारी बात सुनेगी और हमारी टीम को पहचान भी मिलेगी। भारतीय ब्लाइंड टीम को ही देख लीजिए, दो बार विश्व चैंपियन बनी, लेकिन अब तक बीसीसीआई से पहचान नहीं मिली है। सही समय पर हमें भी पहचान जरूर मिलेगी।'
वैसे, बीसीसीआई के किसी अधिकारी से इस संबंध में बातचीत नहीं हुई है।
उल्लेखनीय है कि भारतीय दिव्यांग क्रिकेट टीम बिना सरकारी या बीसीसीआई मदद के विदेशों में जाकर सीरीज खेलती है। दिव्यांग खिलाड़ियों का जुनून देखने लायक है कि वह अपनी जेब से किराया भरकर देश का नाम रोशन करने जाते हैं। भारतीय दिव्यांग टीम के खिलाड़ियों और स्टाफ को उम्मीद है कि जल्द ही उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री से होगी और टीम सभी संघर्षों से ऊपर आकर मैदान पर बिना किसी आर्थिक परेशानी के अपना कमाल बिखेरेगी व देश का नाम रोशन करेगी।