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पाकिस्तान के आंसू

Tue, 17 May 2016 10:51 AM IST
सैयद बदरुल अहसन
सैयद बदरुल अहसन Updated Tue, 17 May 2016 10:51 AM IST
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Tears of Pakistan
सैयद बदरुल अहसन

बांग्लादेश में 1971 के नरसंहार के दोषी मोतिउर रहमान निजामी को फांसी देने पर पाकिस्तान के इस्लामी गणतंत्र ने जिस तरह विरोध जताया है, वह आश्चर्यजनक है। करीब साढ़े चार दशक पहले पाकिस्तान ने जब अपने ही पू्र्वी इलाके को 'सबक' सिखाने की ठानी थी, तब मोतिउर रहमान निजामी और जमात-ए-इस्लामी के उनके गुंडे बंगालियों का उनकी अपनी ही जमीन पर अपहरण, हत्या और बलात्कार करते हुए पाक सेना की मदद कर रहे थे। पाकिस्तान कह रहा है कि निजामी का गुनाह यह था कि 1971 में वह पाक संविधान और उसके कानूनों का पालन कर रहा था!

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सच यह है कि तब पाकिस्तान में कोई संविधान नहीं था। और कानून के नाम पर मार्शल लॉ था, जिसे जंगल का कानून के अलावा कुछ नहीं कह सकते। और निजामी तथा उन जैसे दूसरे लोगों ने अपने निरंकुश तरीकों से यही साबित किया था कि पाकिस्तान में कानून मायने नहीं रखता। वह एएके नियाजी थे, जिन्होंने बड़ी बेशर्मी से कहा था कि बंगाली औरतों का बलात्कार कर उनके सैनिक बांग्लादेश में पाकिस्तान की मानसिकता वाली भावी पीढ़ी तैयार करने का काम कर रहे हैं। बांग्लादेश की वह नई पीढ़ी आज पश्चिम में बस गई है। जबकि बलात्कार का शिकार हुई औरतें इसी बांग्लादेश में हैं, और नियाजी के सैनिकों की बर्बरता को भूल नहीं पाई हैं।

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तब पाक सैनिकों और उनके बेवर्दी समर्थकों ने बंगालियों को मिटाने का अभियान ही चला रखा था-अध्यापक, प्रशासनिक अधिकारी, लेखक, संगीतकार, कवि, छात्र, राजनीतिक कार्यकर्ता-सबको सुनियोजित तरीके से 'उठाकर' कत्ल कर दिया गया। कोमिल्ला में तैनात एक युवा पंजाबी सेनाधिकारी ने तब चर्चित पाक पत्रकार और 1971 के कत्लेआम की कलई खोलने वाले एंथोनी मैस्करहंस से कहा था कि बंगालियों को अगले तीस वर्षों तक गुलाम बनाए रखना है। एक दूसरे पंजाबी सेनाधिकारी राव फरमान अली ने बाकायदा अपनी डायरी में लिखा कि पाकिस्तान के लिए बंगाल का पूरा इलाका महत्व रखता है, यहां के लोग नहीं। जब ढाका जल रहा था, पाक सैनिक बंगालियों के संहार की मुहिम में लगे थे, तब ढाका में ही अपने होटल के कमरे से बाहर के दृश्य देख भुट्टो ने कहा था, खुदा का शुक्र है कि पाकिस्तान बच गया। भुट्टो को इसका इलहाम नहीं था कि खुदा ने तब पाकिस्तान से अपनी नजरें फेर ली थीं।
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लाखों लोगों की सुनियोजित हत्या पर जिस पाकिस्तान का दिल नहीं पसीजा, वह आज मानवता के हत्यारे निजामी की फांसी पर आंसू बहा रहा है। अपना घर आज तक नहीं संभाल पाया पाकिस्तान दूसरों के मामले में हस्तक्षेप करने से बाज नहीं आता। उसके सत्ताधारी वर्ग को अफगानिस्तान और भारत के मामलों में दखल देने में कभी गुरेज नहीं हुआ। पाक सेना पिछले कुछ दशकों में बलूचिस्तान में हजारों लोगों का अपहरण और हत्या कर चुकी है। वर्षों से पाकिस्तान के सैन्य अभियानों को उसके राजनीतिक नेता हरी झंडी देते रहे हैं। आजादी के तुरंत बाद जिन्ना की देखरेख में पाक सेना ने कबाइलियों के वेश में कश्मीर पर चढ़ाई कर दी थी, तो 1965 में अयूब खान के नेतृत्व में कच्छ के रण में पाक सेना ने भारत से लड़ाई छेड़ी; फिर याह्या खान ने पहले अपने पूर्वी इलाके के खिलाफ, फिर भारत के विरुद्ध जंग छेड़ी। हर बार पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। पाकिस्तान भविष्य की बात करता है, लेकिन अतीत की अपनी अमानवीय गलतियों का जिक्र तक नहीं करता। पाकिस्तान के बच्चे नहीं जानते कि उनके वतन के अस्तित्व में आने के चौबीस साल बाद ही पूर्वी पाकिस्तान उसके नक्शे से कैसे गायब हो गया। उन्हें कभी नहीं बताया गया कि उनके 93,000 सैनिकों ने बांग्लादेश की जमीन पर आत्मसमर्पण किया था, और उन्होंने भारत में बतौर युद्धबंदी तीन साल कैद में बिताए थे।

1971 के युद्ध के बाद जन्मी पाकिस्तान की दो पीढ़ियों को नहीं बताया गया कि 1970 के आम चुनाव में अवामी लीग को जीत मिली थी, और लाजिमी था कि शेख मुजीबुर रहमान को पाकिस्तान की सत्ता मिलती। पर पाक सेना और भुट्टो ने मिलकर उस चुनावी नतीजे की ऐसी-तैसी कर डाली थी। पाकिस्तान की नई पीढ़ी नहीं जानती कि जर्मनी के नाजियों की तरह पाक सेना तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में कैसे हत्यारों की तरह टूट पड़ी थी। निजामी जैसे लोगों ने तब पूर्वी पाकिस्तान को बंगालियों की कब्रगाह बना डाला था। उस निजामी को फांसी देकर बांग्लादेश ने न्याय किया है।

आधुनिक युग में पाकिस्तान अकेला मुल्क है, जिसकी बहुसंख्यक आबादी ने अपने ही लोगों के खिलाफ जंग छेड़ी, और उसे बर्बाद कर दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी इलाके के अमेरिकियों ने 1860 में आजादी की लड़ाई लड़ी थी, पर वे हार गए। बायाफ्रा 1970 में नाइजीरिया से आजाद हुआ था, लेकिन तीन साल बाद उसे फिर नाइजीरिया में मिल जाना पड़ा। इन सबके बीच बांग्लादेश अलग खड़ा है, जिसने पाकिस्तान के खिलाफ आजादी की लड़ाई शान से जीती। बांग्लादेश के उस मुक्तियुद्ध में भारत ने जो मदद की थी, वह अतुलनीय थी। दूसरी ओर अपनी सेना के बूते अहंकारी पाकिस्तान है, जिसने मुस्लिम राष्ट्रवाद के नाम पर अलग देश बनाया, फिर भी वह बांग्लादेशी मुसलमानों को अलग होने से नहीं रोक पाया। और अब वह अपने भाड़े के हत्यारों के लिए रोता है।


पाकिस्तान के इस रवैये पर हमें बहुत आश्चर्य नहीं है। लेकिन इस पर जरूर अचरज होता है कि पाक नेताओं ने इतिहास से कभी सबक नहीं सीखा। जर्मनी ने नाजियों के पाप की माफी मांगी है। जापान के राजनेताओं ने हिदेकी तोजो की करतूतों के लिए कई देशों से क्षमा याचना की है। पर 1971 के अपने गुनाह पर पाकिस्तान अब भी शर्मिंदा महसूस नहीं करता, न ही उसने उस दौरान अपनी सेना के आपराधिक तौर-तरीकों पर माफी मांगने की जरूरत महसूस की है।

बांग्लादेश के वरिष्ठ पत्रकार और शेख मुजीबुर रहमान के जीवनी लेखक

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