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मुसीबत और हेल्पलाइन
क्षमा शर्मा
Updated Wed, 20 Apr 2016 07:18 PM IST
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क्षमा शर्मा
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कोलकाता में किसी बात से परेशान होकर एक पति ने धमकी दी कि वह आत्महत्या कर लेगा। पत्नी और दस साल की बेटी कुछ समझ पाती, तब तक उसने खुद को जलाने की कोशिश की। यह देख घबराकर पत्नी और बच्ची रोने लगी। उन्होंने सहायता की गुहार लगाई। फिर बेटी ने सौ नंबर पर फोन करके पुलिस से कहा, अंकल जल्दी आइए। मेरे पिता स्युसाइड कर रहे हैं। बच्ची जानती थी कि सौ नम्बर पर फोन करें, तो शायद पुलिस की मदद मिल सकती है।
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पुलिस ने पहले इसे तंग करने वाला या प्रेंक काल समझा। पुलिस का ऐसा समझना गलत भी नहीं था, क्योंकि अक्सर कुछ परेशान करने वाले और सेडिस्ट मानसिकता के लोग किसी विमान, दफ्तर, होटल, अथवा किन्हीं महत्वपूर्ण जगहों पर बम होने की झूठी सूचना देते हैं। सुरक्षा एजेंसियों को भारी मशक्कत के बाद भी अक्सर कुछ नहीं मिलता। इन्हीं का फायदा आतंकी और समाज विरोधी तत्व उठाते हैं। लेकिन यदि कोई ऐसी खबर दे, तो उस पर कार्रवाई जरूरी है, और यहां तो एक बच्ची मदद की गुहार लगा रही थी। पुलिस वाले फौरन पता-ठिकाना जानकर वहां के लिए चल पड़े। पुलिस जब वहां पहुंची, तो उन्होंने बच्ची के पिता को झुलसता पाया। तुरंत उस व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाकर इलाज की व्यवस्था की गई। बाद में पुलिस ने उस बच्ची की बहुत तारीफ की और शाबासी दी। उसकी समझदारी से ही उसके पिता की जान बच सकी। मात्र बीस फीसदी झुलसे उसके पिता इलाज से बच गए।
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देश में ऐसी हजारों-लाखों घटनाएं होती होंगी। लेकिन अकसर बच्चों को न तो घर पर, न बाहर, न स्कूल में यह बताया जाता है कि किसी मुसीबत के वक्त वे क्या करें। मदद मांगने के लिए किसके पास जाएं। कायदे से यदि बच्चों की पाठ्यपुस्तकों और स्कूलों में मुसीबत के वक्त सहायता देने वाले इन नंबरों को प्रकाशित किया जाए, अध्यापक बच्चों को इसके बारे में बताएं, तो बच्चे जरूरत के वक्त मदद ले सकते हैं और खुद को ही नहीं, परिवार, दोस्त, पड़ोसी आदि सबको बचा सकते हैं। पुलिस भी समय-समय पर इन्हें भी शिक्षित कर सकती है। लेकिन अक्सर हमारे यहां बच्चों की अक्ल पर भरोसा नहीं किया जाता। जरूरी जानकारियां भी उन्हें नहीं दी जातीं। माना जाता है कि जब बड़े हो जाएंगे, तो सब कुछ खुद जान जाएंगे। अगर वे कुछ जानना भी चाहते हैं, तो जवाब मिलता है, जब बड़े हो जाओगे, तो खुद जान जाओगे।
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जबकि पश्चिम के देशों में बच्चों को दो- ढाई साल की उम्र से ही उनकी सुरक्षा के संबंध में जानकारियां दी जाती हैं। उन्हें हेल्पलाइन्स के बारे में भी बताया जाता है। बच्चियों को गुड टच और बैड टच के बारे में बताया जाता है, ताकि वे किसी तरह के यौन शोषण का शिकार न हों। सिर्फ बच्चों ही नहीं, कई जगहों पर वहां अकेले रहने वाले बुजुर्गों के पालतू जानवरों, खास तौर से कुत्तों को भी प्रशिक्षित किया जाता है कि किसी इमर्जेंसी में वे हेल्पलाइन का बटन दबा सकें। मगर अभी अपने देश में हेल्पलाइन्स का कान्सेप्ट महानगरों और शहरों तक ही सीमित है, जबकि आपदा कहीं भी हो सकती है। इसलिए हेल्पलाइन्स हर जगह होनी चाहिए और बच्चों को भी इनके बारे में जागरूक करना चाहिए। इनकी पहुंच बच्चों तक होनी ही चाहिए, क्योंकि बड़ी संख्या में बच्चे विभिन्न अपराधों के शिकार होते हैं।