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किस खिड़की से कितनी बार...

Sat, 22 Feb 2014 07:59 PM IST
यशवंत व्यास/अमर उजाला, नई दिल्ली
यशवंत व्यास/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 22 Feb 2014 07:59 PM IST
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yashwant vyas article

जहां तक मुझे पता है, लोग खिड़कियों के नाम से काफी भावुक रहते हैं। खिड़कियां खोल देने और एक से दूसरी तरफ हवा चले जाने की प्रतीक्षा में कई शुद्ध वायुप्रेमी लंबी कविताएं लिखते रहे हैं। विनोद कुमार शुक्ल ने एक सुंदर किताब ही लिख दी थी, जो बताती थी कि उस दीवार में एक खिड़की रहती थी। जो हिंदी किताबों के मेले में विमोचन-लोकार्पण तथा स्वस्तिवाचन के लिए जाते हैं, उनका शायद अंदाज यह होता है, जैसे कोई फिल्मी गीत 'ये खिड़की जो बंद रहती है' न होता, तो वे राष्ट्र पर अपनी खिड़कियों के जरिए छा ही चुके होते।

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इसी भावना से इस बार कवि जनपथ से निकलकर प्रगति मैदान में उतर गया। अमूमन होता यह था कि वह आम आदमी पार्टी के अंतर्विरोधों, मोदी की प्रासंगिकता तथा कांग्रेस की अमरता पर टिप्पणी देता हुआ राजपथ-जनपथ एक किए रहता था। इस बार उसने प्रगति मैदान की राह पकड़ी।
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प्रगति मैदान में उत्सुक पाठक थे, दुखी प्रकाशक थे, कुछ सुखी लेखक थे - कुछ सदादुखी लेखक थे। कबूतर थे, चिड़ियाएं थीं। अमेजॉन था, कुरान और गीता भी थी। कुछ बहसें थीं, कुछ विमोचन थे। कुछ विमोचन का रिकॉर्ड बनाए घूमते महान थे, कुछ दुर्दशा पर रोते महानतम थे।
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कवि ने हॉल के भीतर घुसते ही एक सुकन्या से पूछा, 'खिड़की कहां है?'

उस निरीह पाठिका ने कहा, 'पूरे हॉल में सिर्फ दो दरवाजे हैं। खिड़कियां नहीं हैं। आप जब चाहें, हॉल से निकलकर मैदान में खुली, सैकड़ों अदृश्य आसमानी खिड़कियों से झांक सकते हैं।'

यह पाठिका थी या कवयित्री? कवि ने भाषा के सौंदर्य पर गौर किया। लेकिन वाक्य उसे कांग्रेस कार्यालय की तरह जान पड़ा। हॉल में हो, तो खिड़की नहीं है। बाहर हो तो गोया सड़क पर हो, आसमान है - आसमानी खिड़कियां हैं। क्या यह सुकन्या कांग्रेस दफ्तर की बात कर रही है, या वहीं से लौटी है?

'आप क्या चुनाव के सिलसिले में दिल्ली आई हुई हैं?' कवि ने पूछा।

'मैं कविताओं की किताबें देखने और उपन्यास खरीदने आई हूं। आप कांग्रेस दफ्तर से आ रहे हैं?'

कवि का मन चोर हो उठा। वह कांग्रेस दफ्तर और यूपीए के भविष्य से उपन्यास और कविताएं जोड़कर पाठिका को युवा वोटर में बदलने की चाह से मचल उठा।

'मान लीजिए, मैं वहीं से आ रहा हूं, तो क्या आप प्रगति मैदान में अपना आज का एजेंडा बदल देंगी?'

'मुझे एजेंडे पर दृढ़ रहने की जरूरत है, क्योंकि मैं जब किताब खरीदने उतरती हूं, तो सिर्फ किताब पर टिकी रहती हूं। आप अगर कांग्रेस के लिए कविता लिख रहे हैं या उपन्यास का विमोचन किसी कांग्रेसी मिनिस्टर से करा रहे हैं, तो मैं उसमें अपना एजेंडा खत्म होते नहीं देखती। मैं जब पाठक होती हूं, तो पाठक होती हूं।'

'लेकिन पाठक तो तब पाठक होता है, जब खरीदार अच्छा हो!'
'क्या आप यूपीए की बात कर रहे हैं?'
'नहीं मैं जनता की बात कर रहा हूं। जनता के बीच उपलब्ध पाठक की बात कर रहा हूं। वह खरीदता है, तो देश चलता है।'
'तो फिर मोदी पर किताब काफी बिकी है।'
'आपने खरीदी?'
'नहीं। न वह उपन्यास था, न कविता! मैंने पहले ही बताया था ना कि मैं कविताओं की किताब देखने और उपन्यास खरीदने आई हूं।'
'आप तो ऐसा कह रही हैं, जैसे तीसरे मोर्चे की अगुवाई में अगली सरकार को समर्थन देंगी।'

कवि का दिल हुआ, पाठिका का हाथ, हाथ में ले और देखे कि जीवन रेखा और हृदय रेखा में कितने जोड़ हैं। पर वह प्रकटत: हिंदी का साहित्यकार और हिंदुस्तान का रणनीतिकार ही रहना चाहता था। उसने कहा, 'इस मेले में आए कितने लोग तेलंगाना बिल के समय लोकसभा में ब्लैक आउट और केजरीवाल की राष्ट्रीय चुनौती पर विचार कर रहे होंगे?'


सुकन्या ने जवाब दिया, 'जब देखने का मौसम हो, तो विचार की बात कहां से आती है?'
कवि ने फिर प्रश्न उठाया, 'धरने, प्रदर्शन, मुद्राएं, भाषण, सब कुछ क्या विचार के लिए नहीं होता?'
सुकन्या ने कुछ नहीं कहा।
वह जोर से चिल्लाई, 'लिस्ट पूरी हो गई।'
एक मरियल सा असिस्टेंट भागता हुआ प्रकट हुआ।
सुकन्या सरकारी खरीद के लिए लिस्ट बना रही थी। भीड़ ने उसे घेर लिया था।
कवि हॉल में पगलाया-सा खिड़की खोज रहा है और हॉल है कि ले-देकर भीतर आने और बाहर जाने के गेट के अलावा कहीं नहीं खुलता।
कबूतर ने बीट कर दी है।

कवि को उम्मीद है कि मोदी की किताब के बेस्टसेलर होने से देश के भविष्य का कुछ लेना-देना नहीं है। बस एक खिड़की मिले और वह हिंदी साहित्य का भविष्य सुरक्षित कर डाले।
सुरक्षा के लिए जनपथ जरूरी है।
जनपथ पर भी खिड़की कहां होती है?

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