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पन्ने में दब कर अमर हो गए कीड़े

Sun, 03 Feb 2013 12:09 AM IST
यशवंत व्यास
यशवंत व्यास Updated Sun, 03 Feb 2013 12:09 AM IST
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worms were immortal in pages

' क्या आप भी किताब लिखते हैं?' उस कीड़े ने वरिष्ठ कीड़े से पूछा।

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' नहीं कीड़े किताब नहीं लिखते। किताबों में रहते जरूर हैं।
' क्या तुम किताब लिखना चाहते हो?' उसने जूनियर कीड़े पर संदेह भरी निगाह डाली।
' हां, मैं सोच रहा था। हमारी तीन-चार पीढ़ियां किताबों में दबकर कुर्बान हो गईं। कहते हैं हमारी एक प्रजाति को मारकर खास किस्म की स्याही भी बनाई जाती थी, जिसमें खास किस्म की कलम डुबोकर खास किस्म के लेखक खास किस्म की कृति का सृजन करते थे। क्या मुझे किताब नहीं लिखनी चाहिए?'
' तुम किताब लिखकर क्या करोगे?'
' उसका विमोचन कराऊंगा।'
' विमोचन कराके क्या करोगे?'
' समीक्षाओं के लिए व्यवस्था करवाऊंगा।'
' समीक्षाएं करवा के क्या करोगे?'
' बिक्री और रॉयल्टी का हिसाब मांगूंगा।'  
' हिसाब का क्या करोगे?'
' नई किताब लिखने के लिए स्याही-कागज खरीदने की व्यवस्था करूंगा।'
' व्यवस्था के बाद क्या करोगे?'
' फिर किताब लिखूंगा, फिर विमोचन कराऊंगा, फिर समीक्षा, फिर बिक्री-रॉयल्टी, फिर स्याही-कागज....'
' अजीब कीड़े हो। किताब से शुरू करके फिर किताब पर खत्म हो रहे हो। क्या यह बेहतर नहीं है कि किताब 'पर' खत्म करने के बजाय किताब 'में' खत्म हुआ जाए? या किताब को खाते-खाते किताब के साथ अमर हुआ जाए?'  
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वरिष्ठ कीड़े का प्रश्न बहुत गंभीर था। वह उस किताब की प्रति पर बैठा-बैठा ये प्रश्न फेंक रहा था जिसका विमोचन विश्व पुस्तक मेले में होने वाला था। उसका सोचना था कि हर साल प्रकाशक और उसका गोदाम बदल-बदलकर देखना चाहिए। कोई सिर्फ देश की लाइब्रेरी के लिए ही किताब बनाता है, कोई सिर्फ सर्वशिक्षा अभियान के लिए। अमर होने वाली कृति की तलाश प्रकाशक के गोदाम की बजाय किसी धाकड़ लेखक की लाइब्रेरी में खत्म होती है। किताब खुलती है, भीतर एक कीड़े की लाश निकलती है। कीड़ा अमर हो गया है, यह जानकर समस्त कीड़ा-प्रजाति गर्व से भर उठती है।
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'तुमने पाठकों की बात नहीं की? ' इस बार वह किताब के टाइटल का निरीक्षण कर रहा था।
' पाठकों तक पहुंचने का विचार मैंने कभी नहीं किया। कुछ विदेशी प्रकाशकों के हमले और अंग्रेजी की धमक से दबे हुए एक प्रकाशक के दरियागंज वाले गोदाम में घूमते हुए मैंने पाया था कि पाठक तो अपना काम करेंगे,  हमें अपना काम करना चाहिए। '

' तो क्या पाठक और किताब दो अलग-अलग चीजें हैं? '
' पाठक मारा-मारा फिरता है, लेकिन मरा-मरा नजर आता है। प्रकाशक दोनों को देखकर इतना दुखी होता है कि सरकारी खरीद के कमीशन का इंतजाम करने निकल पड़ता है। इस दुनिया में दुख ही दुख है। '
' वरिष्ठ कीड़े ने मुस्कुराकर किताब के लेखक के नाम पर अपनी टांगें फिराईं और जूनियर की ओर सहानुभूतिपूर्वक देखकर कहा, जब जानते हो कि इस दुनिया में दुख ही दुख है, तब तुम किताब क्यों लिखना चाहते हो?'
जूनियर की दृढ़ता उस नौजवान की तरह थी, जो फेसबुक पर एक टिप्पणी ठोंककर साहित्य जगत में हलचल का इंतजाम करने की कूवत रखता है।
 
उसके चेहरे के भाव इस तरह थे कि वह हिंदी में सलमान रूश्दी होता हुआ, अंग्रेजी में जयशंकर प्रसाद हो रहा था। उसके पैर फ्रेंच में भविष्य के चेतन भगत की तरह हिल रहे थे और विजुअल की भाषा में अनुराग कश्यप की नई फिल्म स्क्रिप्ट की कल्पना से चौंधियाए हुए थे। वह फिल्म से गुजर कर किताब में, किताब से गुजरकर फेसबुक में, फेसबुक से गुजरकर लोकार्पण में, लोकार्पण से गुजरकर फिर फेसबुक में जाने को तैयार था, बशर्ते अमरता और बिक्री के बीच पाठकों का टंटा खत्म हो जाए।
उसने पूछा, ' ये पाठक इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं कि ये किताब तक नहीं पहुंचते फिर भी किताब वाले इन्हीं के नाम पर प्रार्थना-गीत रचते हैं?'

'इसलिए कि प्रार्थना-गीतों से आत्मा अमर होती है, पाठकों के भौतिक रूप से नहीं। '
' मेरे पिता टॉलस्टॉय की रचनावली में, मां शेक्सपियर और टी एस ईलियट की दो किताबों के बीच, भाई प्रेमचंद के रॉयल्टी फ्री संग्रह में दबकर शहीद हुए। मेरे मामा हाल में पाउलो कोएलो की अल्केमिस्ट में गए। चाचा अथर्वेद में गए थे, ताऊ गीता में, दादा की इच्छा थी कि चार्वाक दर्शन के किन्हीं पन्नों में दबकर अमर होते, मगर वे मेडिकल की एक टेक्स्ट बुक में दबकर मारे गए। मैं बचपन से उनकी आत्मा की शांति के लिए अपनी ही लिखी किसी किताब में अमर होना चाहता था। '


यह कहकर जूनियर चुप हो गया। वरिष्ठ कीड़ा शीघ्र विमोचनीय नई किताब की जिल्द पर खामोश बैठा है। जूनियर किताब लिखे तो उसके पन्नों में दबकर अमर होने का इंतजाम हो!

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