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सिर्फ पैसे से दुनिया नहीं बदलती
पत्रलेखा चटर्जी
Updated Sat, 02 Mar 2013 11:14 PM IST
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यह विडंबना ही है कि भारत में बजट के ऐसे मसले जो इस देश के भविष्य के लिहाज से अहम हैं, कुछ विद्वानों को छोड़ दें तो विश्लेषकों को आकर्षित नहीं करते। यही वजह है कि वित्त मंत्री पालनिअप्पन चिदंबरम के बजट भाषण के दौरान टेलीविजन चैनलों पर जो बहस हो रही थीं, उनमें मानव विकास के मद में किए गए वित्तीय प्रावधानों का कोई जिक्र नहीं किया गया।
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लैम्ब्रोगिनी और लैंड क्रूजर जैसी महंगी कारों की बढ़ती कीमतों और अति संपन्न तबके पर लगाए गए अस्थायी सरचार्ज से तो विश्लेषक काफी उत्तेजित नजर आए, लेकिन उन्होंने सामाजिक क्षेत्र के लिए किए गए बजट प्रावधानों को तवज्जो नहीं दी।
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दरअसल इसकी एक बड़ी वजह यह है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में होने वाले खर्च को बजट विश्लेषक कल्याणकारी कदम के तौर पर ही देखते हैं और उनका मानना है कि इससे सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था में कोई तेजी नहीं आ सकती।
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दूसरा कारण निश्चित ही जनहित से जुड़ा है, जिसके प्रति कुछ लोगों की बेरुखी है, तो कुछ लोगों की प्राथमिकता में यह सबसे ऊपर है। क्योंकि हम खुद निजी क्षेत्र के महंगे विकल्प को वहन करने की स्थिति में होने के कारण किसी सरकारी अस्पताल में नहीं जाते या अपने बच्चों को किसी सरकारी स्कूल में नहीं भेजते, इसलिए सरकारी स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं को अधिक धन दिए जाने की जरूरत भी हम महसूस नहीं करते।
देश के नीतिगत विमर्श में मानव विकास को अपेक्षाकृत कम महत्व दिए जाने के कारण ही हम समझ सकते हैं कि संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक में भारत आखिरी 187 देशों की सूची में क्यों 134 वें क्रम पर है। मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) की गणना जैसा कि हममें से अनेक लोग जानते हैं, तीन बुनियादी क्षमताओं के आधार पर की जाती हैः लंबा एवं स्वस्थ जीवन, शिक्षित होना एवं ज्ञान अर्जित करना और सम्मानजनक जीवन स्तर। हम खुद को सांत्वना दे सकते हैं कि इस सूची में पाकिस्तान और बांग्लादेश हमसे जरा नीचे क्रमशः 145 वें और 146 वें स्थान पर हैं। लेकिन हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि हमारे कुछ सहयोगी हमसे मीलों आगे हैं। मसलन, ब्राजील एचडीआई में जहां 84 वें स्थान पर है, चीन 101 वें स्थान पर।
भारत की विकास की कहानी को निरंतरता देने के लिए जरूरी है कि हमारा फोकस मानव विकास पर हो, क्योंकि भारत की जनसांख्यिकी सच्चाई यह है कि देश की 70 फीसदी आबादी अभी 35 वर्ष से कम उम्र की है। बुनियादी शिक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और आवश्यक दक्षता के बिना हमारी 'मानव पूंजी' आर्थिक उछाल आने के बावजूद अवसरों को नहीं भुना पाएगी, यहां तक कि तब भी जब निवेशक आकर दरवाजों पर दस्तक देंगे और नौकरियों का सृजन करेंगे।
मैंने देखा कि बजट के बाद टीवी पर होने वाली बहसों में इस मुद्दे पर कोई बात नहीं हुई। मगर मानव विकास के लिहाज से 2013 के बजट में क्या है? हम शिक्षा और स्वास्थ्य दो क्षेत्रों पर गौर करते हैं। इन दोनों पर सार्वजनिक खर्च बढ़ा है। सुस्त आर्थिक विकास के बीच स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए 37,330 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसमें से बड़ा हिस्सा ( 21,239 करोड़) प्रस्तावित राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए है। यह मिशन राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन को मिलाकर बनाया जाएगा।
इसके अलावा मेडिकल एजुकेशन और रिसर्च तथा ट्रेनिंग की ओर भी ध्यान दिया गया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसे छह संस्थान 2013-14 में पूरी तरह से काम करना शुरू कर देंगे, इनके लिए 1650 करोड़ का आवंटन किया गया है। पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को भी बढ़ावा दिया गया है। इसके साथ ही असंगठित क्षेत्र के लिए, जहां भारतीय मानव पूंजी का अधिकांश हिस्सा खप जाता है, विशेष पैकेज का प्रावधान किया गया है।
शिक्षा के मद में अब तक का सर्वाधिक प्रावधान किया गया है। मानव संसाधन मंत्रालय को 65,867 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इसमें से प्राथमिक स्तर की शिक्षा के सरकारी कार्यक्रम सर्वशिक्षा अभियान के लिए 27,258 करोड़ रुपये होंगे। अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों के साथ ही लड़कियों के लिए हजारों छात्रवृत्तियों की घोषणा की गई है। इसके लिए विभिन्न मंत्रालयों को 5,284 करोड़ रुपये दिए जाएंगे।
भारत में मानव विकास पर सरकारी खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में बहुत कम है। अधिक धन तो चाहिए, मगर इसे खर्च कैसे किया जाए इस पर ध्यान देने की जरूरत है। आने वाले महीनों में हमारा ध्यान इस पर केंद्रित होना चाहिए। गैर सरकारी संगठन प्रथम की शिक्षा की स्थिति पर तैयार की गई रिपोर्ट एनुअल स्टेट्स ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) के मुताबिक 2010 में पांचवी कक्षा के 46.3 फीसदी बच्चे दूसरी कक्षा की किताबें नहीं पढ़ पाते थे। 2012 में यह आंकड़ा बढ़कर 52.3 फीसदी हो गया। इसी तरह कर्नाटक और केरल को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश बड़े राज्यों में अंकगणित में बच्चों का स्तर और गिरा है। जाहिर है, पैसा अहमियत रखता है, मगर यह जानना ज्यादा जरूरी है कि इसे खर्च कैसे किया जाए।