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विश्व नगर की सूची से खिसकती मुंबई: ऐतिहासिक गहराई सराहनीय सामाजिक विविधता व आर्थिक शक्ति जरूरी, अब संकीर्णता..

Sun, 13 Jul 2025 06:51 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 13 Jul 2025 06:51 AM IST
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सार
किसी शहर को ‘विश्व नगर’ कहलाने के लिए शहर का विशाल आकार, ऐतिहासिक गहराई, समृद्ध सांस्कृतिक जीवन, सराहनीय सामाजिक विविधता और आर्थिक शक्ति होना आवश्यक है। मुंबई में ये सारे गुण थे, लेकिन अब मुंबई में संकीर्णता बढ़ती जा रही है।
 
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गेटवे ऑफ इंडिया - फोटो : एएनआई

विस्तार

वर्ष 2006 में मैंने ‘टाइम आउट मुंबई’ (अब प्रकाशन बंद) में एक कॉलम लिखा था, जिसमें यह बताया गया था कि किसी शहर को ‘विश्व नगर’ कहलाने के लिए किन मानदंडों को पूरा करना चाहिए। मैंने तर्क दिया कि इसके लिए किसी शहर का विशाल आकार, ऐतिहासिक गहराई, समृद्ध सांस्कृतिक जीवन, सराहनीय सामाजिक (भाषाई और धार्मिक सहित) विविधता और आर्थिक शक्ति होना आवश्यक है। मेरा निष्कर्ष था कि केवल तीन शहर ही इस श्रेणी में आते हैं- लंदन, न्यूयॉर्क और मुंबई।



हाल में यह लेख मुझे तब याद आया, जब मैंने न्यूयॉर्क के मेयर पद के लिए जोहरान ममदानी के अभियान के बारे में पढ़ा। ईसाई बहुल लंदन में पहले ही एक मुस्लिम मेयर है; क्या न्यूयॉर्क, जो अब तक ईसाई और यहूदी (और नास्तिक) के रूप में जाना जाता है, जल्द ही एक मुस्लिम मेयर पा सकता है? इस प्रश्न पर विचार करते हुए, मुझे अहसास हुआ कि हमारा तीसरा विश्व नगर, मुंबई, इस दौड़ में पहले ही आगे निकल चुका है, क्योंकि यहां छह मुस्लिम मेयर रह चुके हैं, पहला 1934 में और अंतिम 1963 में।


यह कॉलम मुंबई के उन मुस्लिम मेयरों में से एक पर केंद्रित है, जिनके लिए यह पद उनका एकमात्र या सबसे महत्वपूर्ण गौरव नहीं था। उनका नाम यूसुफ मेहरअली था और उनके बारे में अब लिखने का एक कारण यह है कि उनकी मृत्यु इस महीने पचहत्तर साल पहले हुई थी। 1903 में बॉम्बे में जन्मे मेहरअली ने भरदा हाई स्कूल और एल्फिंस्टन कॉलेज में पढ़ाई की, जहां उन्होंने एक बहसकर्ता के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की। उन्होंने कानून की डिग्री भी ली, लेकिन अपने राजनीतिक विचारों के कारण उन्हें वकालत का लाइसेंस नहीं मिला। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में खुद को झोंक दिया था। 1928 में उन्होंने गोरे साइमन कमीशन के विरोध में सक्रिय भूमिका निभाई और दो साल बाद नमक सत्याग्रह में जेल गए।

1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य गांधी के नेतृत्व वाली मूल पार्टी को समानतावादी दिशा देना था। मेहरअली उसके सबसे मुखर नेताओं में से एक थे, जिनकी विशेष रुचि श्रमिकों के अधिकारों और एशिया एवं अफ्रीका के अन्य हिस्सों में औपनिवेशिक विरोधी आंदोलनों में थी। 1930 के दशक में उन्होंने भारत भर में जमीनी समाजवाद के सिद्धांत को बढ़ावा देने के लिए अथक यात्रा की। साथ ही यूरोप और अमेरिका का दौरा किया, ताकि वहां के लोकतांत्रिक समाजवादियों के साथ संबंध स्थापित कर सकें। अप्रैल 1942 में यूसुफ मेहरअली बॉम्बे के मेयर चुने गए। उसी वर्ष अगस्त में गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया। मेयर के रूप में, मेहरअली का कर्तव्य था कि जब गांधी एआईसीसी अधिवेशन में भाग लेने के लिए ट्रेन से बॉम्बे आएं तो औपचारिक रूप से उनका स्वागत करें।

कई लोग मानते हैं कि ‘भारत छोड़ो’ का नारा यूसुफ मेहरअली ने दिया था। संभव है कि यह श्रेय गलत हो, लेकिन 1928 में ‘साइमन वापस जाओ’ जैसा गूंजता हुआ नारा सच में मेहरअली ने ही दिया था। उल्लेखनीय है कि मधु दंडवते की 1986 में प्रकाशित जीवनी में यह दावा नहीं किया गया। उसमें केवल यह लिखा गया कि ‘महात्मा गांधी के आशीर्वाद से मेहरअली के पद्मा पब्लिकेशंस ने 1942 के अगस्त क्रांति की पूर्व संध्या पर ‘भारत छोड़ो’ शीर्षक से एक पुस्तिका प्रकाशित की।’

मैंने खुद यूसुफ मेहरअली के बारे में पहली बार 1980 के दशक की शुरुआत में सुना था, जब मेरा एक दोस्त उनके नाम पर बने शहरी अध्ययन केंद्र में काम करता था। कुछ साल बाद, मैंने न्यूयॉर्क से अमेरिकी पत्रकार और इतिहासकार बर्ट्रम डी. वोल्फ के निबंधों का एक संग्रह खरीदा। इस किताब का नाम था ‘स्ट्रेंज कम्युनिस्ट्स आई हैव नोन’ और इसमें मेहरअली पर एक निबंध था, जिसका दिलचस्प शीर्षक था : ‘गांधी बनाम लेनिन।’ वोल्फ और मेहरअली 1930 के दशक के मध्य में पहली बार अमेरिका गए और दोस्त बन गए। मेहरअली से मिलने से पहले, वोल्फ जिन वामपंथियों से सबसे ज्यादा परिचित थे, वे अमेरिकी कम्युनिस्ट थे, जो लेनिन और स्टालिन के प्रति अंधभक्ति की कसम खाते थे और कट्टरता से मानते थे कि अच्छे उद्देश्यों के लिए सबसे अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल करना भी उचित है। वोल्फ मेहरअली के समाजवाद से प्रभावित हुए।

वोल्फ ने एक सुंदर घटना का वर्णन किया है कि कैसे वह यूसुफ मेहरअली को केप कॉड के छोर पर ले गए, जहां अटलांटिक महासागर और मैसाचुसेट्स की खाड़ी का संगम होता है। मेहरअली कार से उतरे, अपनी चप्पलें पीछे छोड़ दीं और पानी में उतर गए। जब मेहरअली सड़क पर लौटे, वोल्फ ने याद किया, “उनके चेहरे पर खुशी की वह चमक थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। उन्होंने मुझसे कहा कि हम भारतीय हर संगम को एक पवित्र जगह मानते हैं।”

मेहरअली की पहली अमेरिका यात्रा के समय वोल्फ ने उन्हें ब्रिटिश उपनिवेशवाद की भयावहता के खिलाफ न्यायोचित आक्रोश से भरा हुआ पाया। हालांकि, 1946 में जब उन्होंने दूसरी यात्रा की और यह स्पष्ट हो गया था कि भारत जल्द ही स्वतंत्र होगा, मेहरअली ने अपने अमेरिकी मित्र से ब्रिटिश शासकों की अच्छी बातों का उल्लेख किया। वोल्फ इस बदलाव से चकित रह गए। उन्होंने मेहरअली से पूछा कि वह ‘ब्रिटिश भावना’ की प्रशंसा कैसे कर सकते हैं, जबकि उसी ने उन्हें वर्षों तक जेल में रखा। मेहरअली ने उत्तर दिया : “जब वे हमें दबाते थे, तब भी उन्हें इसके लिए असहजता होती थी, इसलिए गांधी ने हमें सिखाया कि हमें अंग्रेजों के बुरे कार्यों से घृणा करनी चाहिए, पर अंग्रेजों से नहीं और न ही उनके या अपने लिए सुधार की आशा छोड़नी चाहिए।”

मधु दंडवते की जीवनी की भूमिका में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में मेहरअली के सहयोगी अच्युत पटवर्धन ने उन्हें ‘एक महान मानवतावादी’ कहा। किताब में अन्यत्र, दंडवते ने समाजवादी-नारीवादी कमला देवी चट्टोपाध्याय का उद्धरण दिया, जिन्होंने जुलाई 1950 में यूसुफ मेहरअली की मृत्यु के बाद लिखा : “निर्भय फिर भी कोमल, साहसी फिर भी विचारशील; किसी भी बलिदान के लिए तत्पर, फिर भी प्रेम और स्नेह से परिपूर्ण, मेहरअली पुरुषों में अद्वितीय थे। उन्होंने राजनीति और धर्म की सीमाओं को पार करते हुए समर्पित मित्र और वफादार साथी बनाए।”

यही निःस्वार्थता या दूसरों के कल्याण और खुशी के प्रति यह पूर्ण समर्पण, मेहरअली को अपनी स्वास्थ्य उपेक्षा की ओर ले गया, जिससे उनकी अकाल मृत्यु हुई। अपने अंतिम समय में उन्हें बॉम्बे के एक प्रसिद्ध क्लिनिक में ले जाया गया, लेकिन जब इलाज से कोई राहत नहीं मिली, तो मेहरअली ने जयप्रकाश नारायण से कहा कि उन्हें घर वापस ले जाया जाए ताकि वह वहीं मर सकें, क्योंकि ‘वह उन डॉक्टरों के अच्छे नाम को खराब नहीं करना चाहते थे जिन्होंने उनका इलाज किया। दंडवते लिखते हैं, “अपने जीवन के अंतिम क्षण में भी यूसुफ की चिंता दूसरों के लिए थी।” उनकी मृत्यु ने राजनीतिक परिदृश्य के विभिन्न हिस्सों के लोगों को एक साथ ला दिया, जिसमें रूढ़िवादी कांग्रेसी और कट्टर समाजवादी एक साथ उनके अंतिम यात्रा में चले। मुंबई में एक ऐसा मेयर होना, जिसका जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ हो, कभी सामान्य और शहर की पहचान हुआ करता था। दुख की बात है कि पिछले दशकों में जहां लंदन और न्यूयॉर्क धार्मिक और भाषाई विविधता के लिए अधिक खुले हुए हैं, वहीं मुंबई अधिक संकीर्ण और सांप्रदायिक होती गई है। यह कल्पना करना कठिन है कि कब और कैसे मुंबई फिर से यूसुफ मेहरअली जैसे समाजवादी, विद्वान, देशभक्त और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण रखने वाले मेयर का चुनाव कर पाएगी, जिसने सच में अपने शहर, अपने देश और दुनिया को गौरवान्वित किया।

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