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इतिहास से पीछा छुड़ाते मोदी

Sun, 31 Aug 2014 07:38 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
नीलांजन मुखोपाध्याय Updated Sun, 31 Aug 2014 07:38 PM IST
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 Working style of Modi

अब जब नरेंद्र मोदी सरकार अपने सौ दिन पूरे कर रही है, तब उसके आकलन का यह सटीक मौका है। मगर इससे पहले परिवर्तन की उस प्रक्रिया को समझना होगा, जो केंद्र में सरकार के बदलने के साथ शुरू हुई है। देश की शासन शैली में बदलाव दिखने में आ रहा है, भारतीय समाज और अंतरसामुदायिक संबंधों की स्वीकृत धारणा बदल रही है, भाजपा के नेतृत्व में भी बदलाव आ रहा है। इनमें से कुछ बदलाव धीमे हैं, तो कुछ तेज। मगर तय है कि आने वाले वर्षों में राजनीति और समाज पर इनका गहरा असर पड़ेगा। विचारधारा के नजरिये से देखें, तो धर्मनिरपेक्षता के मामले में नेहरू के मॉडल में बदलाव दिख रहा है और उस नजरिये में, जिससे अब तक देश में सांप्रदायिकता की समस्या को परिभाषित किया जाता रहा है।

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नेहरू के समय में भारतीय राष्ट्रवाद एक क्षेत्र आधारित अवधारणा समझी जाती थी, वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के तौर पर देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। मोहन भागवत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे बड़े नेताओं का मानना है कि भारत की संस्कृति ही उसे राष्ट्र बनाती है, जो मुख्यतः हिंदू संस्कृति ही है। उनका यह भी मानना है कि हिंदू संस्कृति केवल हिंदुओं तक सीमित नहीं है, सभी तरह की आस्थाएं इसमें समाहित हैं। सुनने में यह भले अटपटा लगे, मगर संघ परिवार के अनेक नेता कहते आए हैं कि हिंदू संस्कृति और हिंदुत्व देश और उसके लोगों को पारिभाषित करता है।
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कुछ इसी सोच का उल्लेख नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में करते आए हैं। मगर भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में राष्ट्रीयता को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के तौर पर देखने की कुछ सीमाएं भी हैं। यहां किसी खास संस्कृति के प्रभुत्व को धार्मिक अल्पसंख्यक अपनी पहचान और अस्तित्व के लिए खतरे के तौर पर देखते हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने अल्पसंख्यक समूहों को साफ संदेश दिया है कि चुनावी प्रक्रिया में उनके वोटों का अब उतना महत्व नहीं रह गया है, और उनके समर्थन के बगैर भी भाजपा पूर्ण बहुमत पा सकती है। इससे मुसलमानों और हिंदुओं में यह संकेत गया कि तमाम राजनीतिक दल द्वारा पहले की गई समुदाय आधारित गणनाओं की जरूरत नहीं थी।
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आज जरूरत इसकी है कि सरकार अल्पसंख्यकों को यह भरोसा दिलाए कि इस देश पर उनका भी बराबर हक है। बीते तीन महीनों में ऐसे कई मौके आए, जब प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी यह कर सकते थे। पुणे में मुस्लिम सॉफ्टवेयर इंजीनियर की हत्या और महाराष्ट्र सदन में शिवसेना के सांसद का रोजादार वेटर के मुंह में रोटी ठूंसने जैसी घटना का उपयोग भाजपा नेतृत्व मुसलमानों में पैठ बनाने में कर सकता था। यह समझना होगा कि आबादी के एक बड़े तबके को दरकिनार करने की कोशिश देश के लिए अच्छी नहीं।

इसके अलावा एक बड़ा बदलाव गवर्नेंस की कैबिनेट पद्धति में हो रहा है, जो अध्यक्षीय प्रणाली में तब्दील होती दिख रही है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी की यही शैली रही है। इसके अलावा प्रधानमंत्री कार्यालय का बढ़ता प्रभुत्व, कैबिनेट सचिवालय का कम होता महत्व, नतीजतन नौकरशाही का बढ़ता प्रभाव व मंत्रियों के राजनीतिक प्रभाव में कटौती, ये कुछ ऐसी प्रवृत्तियां हैं, जो पहले भी इंदिरा गांधी के समय में देखी जा चुकी हैं। मगर जिस तरह कैबिनेट की बैठकें स्वतंत्र विचार के बजाय महज निर्देश ग्रहण करने का मंच बन गई हैं, उससे कैबिनेट की भूमिका का, और अंततः पूरी राजनीतिक प्रक्रिया का क्षय होता दिख रहा है। नरेंद्र मोदी मानते हैं कि सहमति आधारित दृष्टिकोण से सरकार के कामकाज में कुशलता को बढ़ावा नहीं मिल सकता। उनके मुताबिक, निरंकुश व्यवस्था के जरिये ही सरकारी तंत्र से भ्रष्टाचार को दूर रखा जा सकता है।

भाजपा पहले ही एक पीढ़ीगत बदलाव कर चुकी है। हालांकि इसके पक्ष-विपक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं, पर इससे इन्कार नहीं कि उदारता मोदी की पहचान नहीं है। पर भाजपा की पुरानी पीढ़ी को भी, चाहे वह लालकृष्ण आडवाणी हों या मुरली मनोहर जोशी, समझना चाहिए कि उनका समय खत्म हो चुका है। अलबत्ता पचहत्तर से अधिक उम्र के लोगों को सक्रिय राजनीति से बाहर करने पर जोर एक नजीर की तरह लगता है। क्या भारत भी चीन की तरह हर पांच-दस साल में पीढ़ीगत राजनीतिक बदलाव की राह पर चल पड़ा है?

इस परिवर्तन को सिर्फ कुछ बुजुर्ग नेताओं को पद न देने के फैसले तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से मोदी के भाषण के संदर्भ में भी इसे देखना चाहिए, जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन और उस दौर के नेताओं का बहुत कम उल्लेख किया। इसके बजाय उनके भाषण में राष्ट्र निर्माण, पिछली सरकार और नेताओं के योगदान और सरकारी कामकाज को सुधारने पर जोर था। अतीत से इस तरह कटना इतिहास को पीछे छोड़ आगे बढ़ने की तरह है-मोदी ने गुजरात में यही किया है। मोदी और उसके समर्थक यह तर्क देते आए हैं कि 2002 के दंगे के बाद गुजरात अपने रास्ते पर आगे बढ़ता गया है।


प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान कई महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दिए हैं। पर सबसे हताशाजनक संदेश कॉरपोरेट वर्ग के लिए है, जो अब महसूस कर रहा है कि उनका आचरण पिछली सरकार की तरह ही है, जो लोकप्रियतावादी योजनाएं शुरू करती है और इसी पर जोर देती है कि वह कतार के आखिरी व्यक्ति के हित में कदम उठाएगी। मोदी के कॉरपोरेट समर्थकों ने बेशक अब तक के सबसे खर्चीले चुनाव अभियान में अपना योगदान दिया है, पर वे भूलते हैं कि मोदी को वोट तो लोगों ने ही दिए हैं। इसमें भी निराश-हताश लोगों की संख्या ज्यादा थी। स्वाभाविक रूप से समाज के इस तबके की अनदेखी नहीं की जा सकती। यह अच्छा है कि सरकार ने इस तबके के बारे में सोचते हुए कुछ अच्छे कदम तो उठाए हैं। हालांकि इसका असर कितना स्थायी होगा, यह स्वतंत्र विश्लेषण का विषय है।

(वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक)

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