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जिद की कीमत: जीवन ही अर्थहीन लगने लगे, कोई भी गैजेट इतना महत्वपूर्ण नहीं
सार
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में आईफोन को लेकर हुई बहस ने जिस तरह से पूरे परिवार को लील लिया, वह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक परिवेश के सामने खड़े एक गंभीर सवाल की ओर इशारा करती हैै। कोई भी गैजेट इतना महत्वपूर्ण नहीं कि उसके आगे जीवन ही अर्थहीन लगने लगे।
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महाराष्ट्र में आईफोन की जिद, पूरा परिवार तबाह
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट-एजेंसी
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विस्तार
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में आईफोन को लेकर हुई बहस ने जिस तरह से पूरे परिवार को मौत के मुंह में धकेल दिया, वह घटना सिर्फ एक परिवार की निजी त्रासदी नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक परिवेश के सामने खड़े एक गंभीर सवाल की ओर इशारा करती है।
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बताया जा रहा है कि 18 वर्षीय कुणाल चांदगुडे का आईफोन की किस्त को लेकर माता-पिता से विवाद हुआ, जिसके बाद वह नजदीक स्थित 300 फीट ऊंची पहाड़ी पर जा पहुंचा और खुद को खत्म करने की धमकी देने लगा। करीब तीन घंटे तक माता-पिता, ग्रामीण और पुलिस इत्यादि उसे समझाते रहे, लेकिन वह नहीं माना।
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अंतत: उसे बचाने की कोशिश में उसके साथ पिता भी पहाड़ी से गिर गए और यह दृश्य देखकर मां भी पहाड़ी से नीचे कूद गई। यह घटना केवल इतनी भर नहीं है कि एक युवक आईफोन की जिद में इतना आगे बढ़ गया कि उसे अपने जीवन का भी होश नहीं रहा। असल चिंता इससे कहीं बड़ी है।
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सवाल यह है कि आखिर एक वस्तु की इच्छा, चाहे वह कितनी ही महंगी व आकर्षक क्यों न हो, किसी युवा के लिए उसके जीवन, परिवार और भविष्य से बड़ी कैसे हो गई? और जब वह इच्छा पूरी नहीं होती है, तो निराशा इतनी गहरी कैसे हो जाती है कि जीवन ही अर्थहीन लगने लगे?
दरअसल, ऐसी घटनाओं के पीछे उपभोक्तावाद, दिखावे की संस्कृति, साथियों के दबाव, डिजिटल दुनिया में निर्मित कृत्रिम जीवन शैली और तत्काल अपनी इच्छा पूरी कर लेने की बढ़ती प्रवृत्ति जैसे कई पहलू हो सकते हैं। व्यापक संदर्भ में देखें, तो ऐसे मामलों में दोष केवल युवाओं का भी नहीं है।
अभिभावकों और समाज को भी यह समझना होगा कि बच्चों को महंगी वस्तुएं उपलब्ध कराना और उन्हें जीवन के मूल्य समझाना दो अलग-अलग बातें हैं। बच्चों की हर मांग पूरी करके उन्हें खुश रखना आसान है, लेकिन उन्हें ‘नहीं’ सुनने की क्षमता देना कहीं अधिक जरूरी है।
जीवन में हर इच्छा पूरी नहीं होती-इस साधारण सत्य से अगर बचपन और किशोरावस्था में ही परिचित नहीं कराया गया, तो आगे चलकर छोटी-छोटी चीजों के लिए मना किया जाना, उनके लिए असहनीय हो सकता है। किसी युवा द्वारा आत्महत्या की धमकी देना गहरे भावनात्मक संकट का संकेत हो सकता है, जिसमें तत्काल संवेदनशीलता दिखाने की जरूरत होती है।
यह घटना पारिवारिक संवाद की गहरी कमी को भी दर्शाती है। माता-पिता और बच्चों के बीच कम होता खुला संवाद और बच्चों की मानसिक स्थिति को समय पर न समझ पाना कई बार ऐसे हादसों का कारण बन जाता है। परिवारों में भी ऐसा वातावरण होना चाहिए, जिसमें युवा अपनी परेशानी, असफलता, आर्थिक दबाव, ऑनलाइन लत या भावनात्मक संकट के बारे में बिना भय के बात कर सकें। कोई भी गैजेट इतना महत्वपूर्ण नहीं हो सकता कि उसके आगे जीवन ही अपना महत्व खो दे।