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नौ दशक का शानदार सफर : समय के साथ सशक्त होती गई भारतीय वायुसेना, आधुनिक युग की जरूरतों की ओर बढ़ रहे कदम
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विदेश मंत्री एस जयशंकर इस्राइल में भारतीय वायुसेना के जवानों के साथ।
- फोटो :
Twitter/MEA
विस्तार
देश में वायुशक्ति के विकास के साथ भारतीय वायुसेना ने 90 वर्ष पूरे कर लिए और विगत आठ अक्तूबर को चंडीगढ़ में आयोजित शानदार उड़ान के जरिये इसने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया। लेकिन इस आयोजन का वास्तव में जो सबसे उल्लेखनीय पहलू था, वह यह कि वायुसेना प्रमुख ने ऑपरेशन में लगे कोर अफसरों की एक नई शाखा बनाने की अपनी योजना का खुलासा किया, जिसे 'हथियार प्रणाली' कहा गया।
जैसा कि बताया गया, इसका उद्देश्य यह है कि हथियार चलाने और ऐसे प्लेटफार्मों के संचालन में लगे सभी अधिकारियों को जमीन पर या हवा में, सिस्टम का प्रबंधन करने वाले एक सामान्य समूह में रखा जाना चाहिए। आइए, देखते हैं कि इस परिवर्तन की प्रकृति क्या होगी और क्या यह वास्तव में कई गतिविधियों को सफलतापूर्वक एकजुट कर पाएगा? अब तक वायुसेना का प्रबंधन उड़ान, प्रशासन, वैमानिकी इंजीनियरिंग, लेखा, मौसम विज्ञान, लॉजिस्टिक और शिक्षा नामक शाखाओं द्वारा किया जाता रहा है।
नई 'हथियार प्रणाली' शाखा में चार उप-धाराएं होंगी-फ्लाइंग, रिमोट, इंटेलिजेंस एवं सरफेस। लेकिन फ्लाइंग (पायलट) और फ्लाइंग (नेविगेटर) वाली मुख्य फ्लाइंग ब्रांच बनी रहेगी। पायलटों में लड़ाकू, परिवहन विमान और हेलिकॉप्टर उड़ाने वाले अधिकारी होंगे। अनिवार्य रूप ये उप-शाखाएं नहीं हैं, बल्कि वायुसेना की जरूरत आधारित वितरण प्रणाली हैं। हालांकि इतिहास देखें, तो पता चलता है कि इन समूहों के पास जो सामान थे, उसी से अंततः वायुसेना के कोर अधिकारियों का व्यक्तिगत विकास हुआ।
जैसा कि नाम से पता चलता है, उनका नामकरण उस विमान के प्रकार पर हुआ, जिसे वे उड़ा रहे थे, न कि उनके काम के आधार पर। इसमें कोई परिवर्तन होता नहीं दिखता। हम जानते हैं कि लड़ाकू विमान युद्ध के लिए ही थे, लेकिन परिवहन विमान और हेलिकॉप्टरों की युद्ध क्षमता उनकी उपयोगिता में शामिल थी। उदाहरण के लिए, 1971 के युद्ध के दौरान परिवहन विमानों का इस्तेमाल पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में सुई गैस संयंत्रों और पाकिस्तान के विवादित उत्तरी क्षेत्रों में स्कार्दू एयर फील्ड पर बम गिराने के लिए किया गया था।
उन्होंने पायलट द्वारा विमान की नाक को ऊपर की ओर झुकाते हुए फ्लाइट गनर कम लोड मास्टर की देखरेख में उन लक्ष्यों पर प्रभावी ढंग से बम गिराए। और यह काम कर गया। यह एक तालमेल वाली गतिविधि थी, जिसमें लोड मास्टर की, जो एक वरिष्ठ गैर-कमीशन अधिकारी थे, भूमिका प्रमुख थी। मत भूलिए कि भारतीय वायुसेना ने 1947 के ऑपरेशन के दौरान जम्मू और कश्मीर में रजाकार के कब्जे वाले क्षेत्रों पर बमबारी के लिए प्रसिद्ध डीसी-3 परिवहन विमानों का इस्तेमाल किया था। तरीके वही थे।
वायुसेना बस सुधार कर रही थी और हथियार पहुंचा रही थी। इसे हमेशा भविष्य के लिए ध्यान रखना चाहिए। अब वायुसेना के बेड़े में कई तरह के लड़ाकू हेलिकॉप्टर हैं, जिनमें से भारतीय वायुसेना के पास अमेरिकी अपाचे, हाल ही में शामिल किया गया हल्का लड़ाकू हेलिकॉप्टर प्रचंड और एमआई 75वी है। पहले दो अनिवार्य रूप से सशस्त्र युद्ध के लिए हैं, लेकिन बाद वाले कई अन्य कार्य भी कर सकते हैं।
लेकिन वर्तमान संदर्भ में इन्हें इस तरह से डिजाइन किया गया है कि केवल दो मुख्य फ्लाइंग ब्रांच पायलटों द्वारा चलाया जा सकता है, जबकि उनमें से एक हथियार पहुंचाएगा। एएन 32 परिवहन विमान आदि के अलावा, फ्लाइंग (नेविगेटर) नवीनतम सी-130 जे और सी 17 ग्लोबमास्टर विमान सहित वायु सेना के परिवहन बेड़े का एक प्रमुख चालक दल है। उन्हें सामरिक युद्ध अभियानों के दौरान नेविगेशन और अन्य सहायता प्रदान करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
लेकिन इस बुनियादी अनुशासन का वैसा ही सदस्य दुर्जेय एसयू 13 एमकेआई पर हथियार प्रणाली संचालक (डब्ल्यूएसओ) के रूप में भी कार्य करता है और नए इलेक्ट्रॉनिक एरे रडार की सहायता से 150 किलोमीटर या इजरायली डर्बी तक के लक्ष्यों को बेअसर करने में सक्षम, दृश्य सीमा से परे स्वदेशी अस्त्र भी चला सकता है। मुख्य मुद्दा यह है कि क्या यह नया उप समूह फ्लाइंग का हिस्सा बनेगा या पहले के फ्लाइंग (नेविगेटर) में ही बना रहेगा। ऐसी गतिविधि वायुसेना के लिए नई नहीं है।
आखिरकार, फ्लाइंग (नेविगेटर) ने पूर्ववर्ती कैनबरा बॉम्बर को संचालित किया और अंधेरी रातों और गरज के दौरान दो मीटर की सटीकता के भीतर हथियारों को सफलतापूर्वक चलाया ही है। यदि हम कल्पना करें कि रिमोट अधिकारी को मानव रहित लड़ाकू हवाई वाहनों को नियंत्रित करने और हथियार चलाने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा, तो रिमोट के डिविजनों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
मेरा मानना है कि यह भी वायुसेना के लिए नई बात नहीं है, हालांकि उन्होंने अब तक युद्धोन्मुख हथियार नहीं चलाए हैं और इसके प्रशिक्षित पेशेवर उपलब्ध हैं। इंटेलिजेंस (खुफिया) और सरफेस (जमीनी) की उप शाखाएं वास्तव में सुसंगत नहीं हैं। इंटेलिजेंस में हथियार नहीं चलाया जाता है, क्योंकि इसकी प्रकृति ही ऐसी है। लेकिन जमीनी अधिकारियों के दायरे में सतह से सतह और सतह से हवा में हथियारों और मिसाइलों को चलाने वाले बल पर विचार कर सकते हैं।
ये रॉकेट बलों के संचालन की तर्ज पर हो सकते हैं, जैसा कि हम पूर्व सोवियत संघ और अब रूस में देख रहे हैं। निस्संदेह इस पर कम ध्यान जाता है, क्योंकि अब हम ब्रह्मोस, अग्नि, पृथ्वी या भारत के एकीकृत मिसाइल रक्षा कार्यक्रम के अन्य उत्पादों के दायरे में प्रवेश कर चुके हैं। हालांकि मीडिया में सिर्फ एस-400 की ही चर्चा होती है, जिसे हाल ही में हासिल किया गया है। ये सभी उच्च प्रौद्योगिकी प्रणालियां हैं और एक प्रशिक्षित संवर्ग पहले से मौजूद है और इसकी जरूरत है।
आखिर भारतीय वायुसेना विविध गुणों वाले विभिन्न अनुशासनों को जल्दबाजी में एकजुट करने की कोशिश क्यों कर रही है? क्या इनसे जुड़े लोगों के प्रबंधन में मुश्किल हो रही है? जब उनके बीच वरिष्ठता को ध्यान में रखा जाएगा, तो सामूहिक व्यवहार महत्वपूर्ण मुद्दा होगा। इससे 3,000 करोड़ रुपये की बचत का दावा किया जा रहा है, लेकिन अनुभवी लोग पहले से ही संबंधित अनुशासनों में काम कर रहे हैं। (-लेखक सामरिक मामलों के टिप्पणीकार हैं।)