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स्वास्थ्य के मोर्चे पर पिछड़ती महिलाएं
ऋतु सारस्वत
Updated Tue, 10 Mar 2015 08:11 PM IST
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भारत में पैदा होने वाले अधिकतर बच्चे और उन्हें जन्म देने वाली मां कुपोषित होती हैं। उनकी स्थिति गरीब अफ्रीकी देशों के बच्चों व उनकी जननी से भी बदतर है। भारत में स्वच्छता का अभाव बच्चों के विकास को बुरी तरह प्रभावित करता है। वे मां के गर्भ से ही कुपोषण की चपेट में आ जाते हैं। ‘द प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडेमी ऑफ साइंस’ में प्रकाशित शोध भारत की इसी स्याह तस्वीर की पुष्टि करती है।
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आखिर ऐसे कौन-से कारण है कि स्वतंत्रता के साढ़े छह दशक बीत जाने के बाद भी स्थिति बदलती हुई नहीं दिखती? जननी और उसके शिशु की सुरक्षा चिकित्सकों की उपलब्धता, उचित पोषण, संक्रामक रोगों से बचाव और सही समय पर टीकाकरण जैसे कारकों पर निर्भर होती है। इनमें से किसी एक की भी अवहेलना जच्चा-बच्चा के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। देश के चुनिंदा अस्पतालों को छोड़ दें, तो अधिसंख्य अस्पतालों में स्त्री रोग विशेषज्ञों के पद खाली हैं। ज्यादातर नर्सिंग स्टाफ ही प्रसव करवाते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 74,000 मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (एक्रिडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) और 21,000 ऑग्जिलरी नर्स मिडवाइफ्स की कमी है। आलम यह है कि सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन थियेटर को संक्रमण मुक्त रखने जैसी बुनियादी जरूरतों के नियमों का भी पालन नहीं होता।
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हालांकि जननी के असुरक्षित स्वास्थ्य का बड़ा कारण स्वास्थ्य के प्रति उनकी लापरवाही भी है। भारतीय महिलाओं में साक्षरता की कमी है, जिसके कारण वे बच्चे की तथा स्वयं की स्वास्थ्य समस्याओं को समझने में असमर्थ होती हैं। उनकी राह में वे लैंगिक भेदभाव भी बाधक हैं, जो आज भी भारतीय समाज में कायम हैं। नतीजतन भारत में हर तीन महिलाओं में से एक का वजन मानक वजन से कम है। आंकड़े बताते हैं कि 56.1 प्रतिशत महिलाओं में किसी न किसी वजह से खून की कमी है, जिसका परिणाम गर्भकाल में 20 प्रतिशत से ज्यादा मृत्यु, समय पूर्व शिशुओं के जन्म में तीन गुना वृद्धि तथा प्रसवपूर्व मृत्यु के मामलों में नौ गुना अधिक वृद्धि के रूप में सामने आया है। इसके अलावा शारीरिक और मानसिक रूप से अविकसित तथा लाइलाज जन्मजात बीमारियों से पीड़ित बच्चों का जन्म भी इसी समस्या की देन है।
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पिछड़ी जाति की महिलाओं की स्थिति और भी बदतर है। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि भारत में पिछड़ी जातियों के बच्चों में से तीन चौथाई बच्चे रक्तहीनता से ग्रस्त हैं। पिछड़ी जातियों में प्रसव के लिए आज भी देसी प्रक्रिया का सहारा लिया जाता है। विगत वर्षों में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को एक मजबूत स्तंभ के तौर पर देखा जा रहा था, पर तमाम अन्य योजनाओं की तरह यह भी भ्रष्टाचार का शिकार हो गई है। लिहाजा नौनिहालों के जीवन की रक्षा के लिए ईमानदार प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। जरूरत स्वास्थ्य मद में बजट बढ़ाने की भी है, ताकि मरीजों की तुलना में डॉक्टरों, नर्सों और दूसरे चिकित्साकर्मियों की संख्या में वृद्धि की जा सके तथा प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों व जिला अस्पतालों में दवाओं सहित चिकित्सा के तमाम साधन मुहैया कराए जा सकें। अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में धवल तस्वीर की कल्पना बेमानी है।