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क्या अब नेपाल में स्थिरता आएगी?
प्रदीप कुमार
Updated Tue, 12 Dec 2017 09:15 AM IST
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नेपाल में मतदान
प्रारंभिक नतीजों और संकेतों के अनुसार नेपाल में केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी-एमाले और पुष्पकमल दहल प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी- माओवादी सेंटर के मोर्चे की सरकार बनना तय है। नेपाली प्रेस का कयास है कि भारत के मुखर विरोधी ओली फिर प्रधानमंत्री बन सकते हैं। नया संविधान लागू होने के बाद संपन्न हुए इस चुनाव में पहली बार सात विधानसभाओं के भी चुनाव हुए। इसमें प्रचंड और उनके सहयोगियों को ओली का कनिष्ठ साथी बनना पड़ा। एमाले की साझेदारी 60 फीसदी और बाकी हिस्सा माओवादी सेंटर का।
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कोइराला की नेपाली कांग्रेस ने अधिनायकवादी राणा शासकों के खिलाफ निर्णायक संघर्ष का नेतृत्व किया था, जबकि राजतंत्र के खात्मे में प्रचंड की पार्टी का सर्वाधिक योगदान था। नेपाल की सियासत में ऐतिहासिक भूमिका अदा करने वाली इन दोनों पार्टियों का ग्राफ नीचे आ गया। जबकि मधेसियों को उनकी संख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं मिला। सातों प्रदेशों का नामकरण और उनकी राजधानियों का चयन अभी शेष है। ये चुनावी नतीजे नेपाल को कितनी आंतरिक स्थिरता और शांति दे पाएंगे? क्या विराट नवनिर्माण का दौर शुरू हो पाएगा? वाम मोर्चे ने अपनी नीतियां नहीं बदलीं, तो भविष्य के गर्भ में अनेक आशंकाएं अभी से देखी जा सकती हैं।
नेपाल की जनसांख्यिकीय और जातीय संरचना के अनुरूप हर स्तर पर न्यायोचित एवं सर्वग्राही व्यवस्था की अनुपस्थिति आंतरिक अशांति को सुनिश्चित करती रहेगी। न्यायपूर्ण व्यवस्था की दिशा में समानुपातिक प्रतिनिधित्व अभी शुरुआत भर है। शासन, प्रशासन, न्यायपालिका, सेना, पुलिस-हर जगह अल्पसंख्यकों का वर्चस्व है। मधेस क्षेत्र की आबादी 50 फीसदी से ज्यादा हो चुकी है। जनजाति अधिकारों के लिए लड़ रहे संगठनों का दावा है कि जनजातियों, मधेसियों और पिछड़े वर्गों की संख्या 70 प्रतिशत है। लोकतांत्रिक विस्तार के साथ पहचान और न्याय की आकांक्षा निरंतर बढ़ेगी। मधेसी राजनीतिक संगठनों के नेता अपने निहित स्वार्थों के लिए यदि आगे भी समझौते करते रहें, तब भी आग सुलगती रहेगी। नेपाल की नई सरकार पुराने दुराग्रहों को छोड़कर दक्षिण एशिया की दो मिसालों से बहुत कुछ सीख सकती है। पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल पर पंजाबी पठान प्रभुत्व को थोपने के दुराग्रह ने बांग्लादेश की नींव डाल दी। भारत ने किसी एक भाषायी, धार्मिक, जातीय या क्षेत्रीय वर्ग के एकाधिकार का निषेध कर राष्ट्रीय एकता का गारंटीशुदा रास्ता तय किया गया।
यह माना जा सकता है कि चीन नेपाल में भारत की कीमत पर अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए कूटनीति और पूंजी की दोधारी तलवार के इस्तेमाल की रफ्तार तेज करेगा। इसकी पृष्ठभूमि 2013 में ही सार्वजनिक हो गई थी, जब शी जिनपिंग के विशेष दूत की हैसियत से काठमांडू आए चीन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ओली और प्रचंड की पार्टी के प्रतिनिधियों से लंबी बात की। उस समय नेपाली प्रेस ने जानकारी दी थी कि माओवादी पार्टियां एकीकरण में मदद जुटाने के लिए चीन से संपर्क में हैं। मई, 2016 में काठमांडू में चीन के राजदूत ने ओली, प्रचंड और अन्य नेताओं के साथ बैठक की और ओली सरकार को बनाए रखने का प्रचंड से अनुरोध किया।
बीजिंग की अनुकूल स्थिति का संकेत यह है कि जिन मधेसी संगठनों को भारत के प्रभाव में माना जाता है, वे भी चीन से हाथ मिलाने में संकोच नहीं करते। पिछले साल संयुक्त लोकतांत्रिक मधेसी मोर्चे का प्रतिनिधिमंडल इस आशय का ज्ञापन लेकर चीनी दूतावास पहुंचा कि मधेसियों की शिकायतें दूर करने के लिए चीन ओली पर दबाव डाले। दक्षिण एशियाई राजनीति के जानकार बर्टिल लिंटर के अनुसार, मधेसी वर्चस्व वाला फेडरल सोशलिस्ट फोरम और मधेसी जनाधिकार फोरम का एक गुट चीनी दूतावास से समर्थन प्राप्त करते रहे हैं। वर्षों से तराई में काम कर रहे चीन के सांस्कृतिक केंद्रों की मंशा का अनुमान लगाया जा सकता है। इससे नेपाल के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर चीन की जकड़बंदी का पता चलता है।
किसी देश की पूंजी जब अंतरराष्ट्रीय इजारेदारी का रूप लेने लगती है, तब वह दूसरे देशों की राजनीति को भी अनिवार्यतः प्रभावित करती है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लैटिन अमेरिका से लेकर भारतीय उपमहाद्वीप तक अमेरिकी पूंजी के खेल की सैकड़ों मिसालें हैं। नेपाल में भारत और पश्चिमी देशों की उपस्थिति के बावजूद चीन की पूंजी के स्वच्छंद, हस्तक्षेपकारी आचरण को देखा जा सकता है। हाल ही में चीनी कंपनी द्वारा नेपाल में बनने वाली 1,200 मेगावाट की बूढ़ी गंडक जलविद्युत परियोजना का करार रद्द कर दिया गया। यह करार प्रचंड सरकार ने किया था। इसके बाद इसमें घपले की चर्चा होने लगी। संसदीय समिति ने इसमें पारदर्शिता की कमी पाई। पारदर्शिता के अभाव का निहितार्थ सर्वविदित है। इस करार को देउबा की कैबिनेट ने रद्द किया। संभव है, अब चीन की कंपनी को यह काम फिर मिल जाए। चीन ने नेपाल में सिर्फ इस साल आठ अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। पिछले पांच वर्षों में नेपाल में सर्वाधिक निवेश की घोषणा चीन ने की है। हाल की एक घटना का उल्लेख प्रासंगिक है। अफ्रीकी देश जिंबाब्वे में राष्ट्रपति राबर्ट मुगाबे के खिलाफ सैनिक विद्रोह में चीन का हाथ पाया गया था। कारण यह था कि मुगाबे कुछ उद्योगों का अधिग्रहण करने वाले थे और इससे चीन की कंपनियों पर असर पड़ता। परियोजनाओं पर समय सीमा में अमल न कर पाने के लिए बदनाम भारतीय कंपनियों को काम का पूरा तौर-तरीका बदलना होगा।
भविष्य में नेपाल में चीन की भू-राजनीतिक, भू-आर्थिक व्यूह रचना कई रूपों में सामने आएगी। भारतीय राज्य सत्ता के विभिन्न अवयवों को उसके अनुसार रणनीति बनानी-बदलनी पड़ेगी। नेपाल में दांव पर भारत के हित लगे हैं, चीन के नहीं। आशा की जानी चाहिए कि वाम मोर्चे की सरकार सिर्फ अपने हित में असंतुलनकारी स्थितियां पैदा नहीं करेंगी।