{"_id":"64f687fecfa132370e0e8fb6","slug":"wildlife-conservation-increasing-population-of-tigers-and-fight-with-other-wild-animals-big-problem-2023-09-05","type":"story","status":"publish","title_hn":"संरक्षण: बाघों को अपनों से खतरा, बढ़ती आबादी और दूसरे वन्यजीवों के साथ संघर्ष बड़ी चुनौती","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
संरक्षण: बाघों को अपनों से खतरा, बढ़ती आबादी और दूसरे वन्यजीवों के साथ संघर्ष बड़ी चुनौती
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
बाघ
- फोटो :
Twitter @isharmaneer
विस्तार
राष्ट्रीय पशु बाघ के संरक्षण पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं। चाहे वह उसके शिकार, शिकारियों पर अंकुश, वन्यजीवों के अंगों की तस्करी करने वाले गिरोहों और अधिकारियों की मिलीभगत, बाघों की संख्या, उनकी मौत के आंकड़े या उनके संरक्षण या प्रबंधन में नाकामी की बात हो, सवाल उठना कोई नई बात नहीं है। अभी हाल ही में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी एनटीसीए ने खुलासा किया कि पिछले दस वर्षों में तकरीबन 1,105 बाघों की मौत हुई है।
एनटीसीए के अनुसार, उसने 2012 से 2022 तक मारे गए 1,105 बाघों की पोस्टमार्टम व फॉरेंसिक रिपोर्ट की विस्तृत जांच की, लेकिन सर्वाधिक चिंता की बात यह है कि उसमें से 27.97 फीसदी बाघों की मौत की पहेली अनसुलझी है। इसका खुलासा कर पाना विशेषज्ञों के लिए भी चुनौती है। वे आज भी किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में नाकाम रहे हैं कि इन बाघों की मौत के पीछे वन्यजीव तस्कर या शिकारी हैं या इसका कोई और कारण है।
एनटीसीए के मुताबिक, इस साल बीते आठ महीनों में कुल 125 बाघों की मौत हो चुकी है, जबकि 2022 में 121 बाघों की मौत हुई थी। एनटीसीए के दावों को मानें, तो इन मौतों के पीछे जंगल में बाघों की बढ़ती तादाद और उनका दूसरे वन्यजीवों के साथ बढ़ता संघर्ष है। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि बाघों को बाहरी लोगों के मुकाबले अपनों से ज्यादा खतरा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जिन बाघों की मौतों की जांच एनटीसीए ने अध्ययन के बाद बंद कर फाइनल रिपोर्ट लगा दी है, उनमें 70 फीसदी से ज्यादातर बाघों की मौत आपसी संघर्ष और दूसरे वन्यजीवों के हमलों के कारण हुई है। यह अलग बात है कि वन विभाग ऐसी मौतों को प्राकृतिक मौत करार देता है। उसके अनुसार, इनमें बीमारी, बढ़ती उम्र यानी बुढ़ापा, आपसी संघर्ष व दूसरे वन्यजीवों के हमले अहम हैं। एनटीसीए के मुताबिक, बाघों के शिकार पर काफी हद तक वन अधिकारियों और पुलिस बल ने अंकुश पा लिया है।
जहां तक अभयारण्यों का सवाल है, उत्तराखंड स्थित कार्बेट टाइगर रिजर्व बाघों के घनत्व के मामले में समूचे देश में शीर्ष पर है। 1288.31 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस टाइगर रिजर्व में तकरीबन 260 बाघ हैं। यहां भी पिछले चार वर्षों में 29 बाघ बढे़ हैं। 2014 में यह तादाद 215 थी। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2018 के बाद यहां बाघों की तादाद 12.5 फीसदी बढ़ी, जबकि 2021 से पाखरो टाइगर सफारी को लेकर कार्बेट टाइगर रिजर्व लगातार चर्चा में रहा। टाइगर सफारी के लिए अनुमति से ज्यादा यहां पर बडे़ पैमाने पर पेड़ों का कटान, बिना अनुमति कालागढ़ व पाखरो वन क्षेत्र में अवैध निर्माण का मामला काफी दिनों तक सुर्खियों में रहा। गौरतलब है कि जांच में इन मामलों की पुष्टि होने के बाद बाघों के वास स्थलों का मामला काफी चर्चित रहा।
टाइगर रिजर्व क्षेत्र में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, वन विभाग की 2,171 बीघा जमीन भूमाफिया और वन विभाग की मिलीभगत से बेच दिए जाने और वन क्षेत्र व रिजर्व में अवैध निर्माण के बावजूद बाघों की तादाद में बढ़ोतरी जहां महत्वपूर्ण उपलब्धि है, वहीं बाघों के संरक्षण की चुनौती भी काफी बढ़ी है, जिससे पार पाना आसान नहीं है। बाघों की बढ़ती मौतों की एक वजह बीमार, बूढे़ और अशक्त हो चुके बाघों पर युवा बाघों के हमले भी हैं, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता।
एनटीसीए भले ही बाघों के शिकार पर अंकुश का दावा करे, लेकिन आए दिन बाघों की खाल, अंगों की बरामदगी सहित वन्यजीव तस्करों की गिरफ्तारी इसके सबूत हैं कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है। हालांकि केंद्र सरकार द्वारा वन्य जीव संरक्षण संशोधन अधिनियम, 2022 लागू किए जाने के सार्थक परिणाम सामने आने लगे हैं। इनमें मानवीय भूमिका के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन इसके लिए वन्यजीवों के साथ संघर्ष, उनके शिकार पर अंकुश तथा जीवों और वानस्पतिक विरासत के प्रति हमारा संवेदनशील रवैया बेहद जरूरी है, तभी कुछ बदलाव की उम्मीद की जा सकती है।