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पटेलों को आरक्षण क्यों चाहिए?

Mon, 31 Aug 2015 07:43 PM IST
दीपंकर गुप्त
दीपंकर गुप्त Updated Mon, 31 Aug 2015 07:43 PM IST
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Why patel's want reservation?

इन दिनों गुजरात आरक्षण के मुद्दे को लेकर अशांत है। वहां के पाटीदार समाज ने ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) आरक्षण में अपने लिए हिस्से की मांग की है। यह पहली बार नहीं है कि ओबीसी के निर्धारित कोटे में से किसी जाति या वर्ग समूह ने अपने लिए आरक्षण की मांग की हो। जिस गुजरात मॉडल का उदाहरण दिया जाता है और जिसे प्रधानमंत्री पूरे देश में लागू करना चाहते हैं, वहां जब इस तरह का असंतोष फूटा है, तो निश्चित रूप से इस पर सवाल तो उठेंगे ही और यह केंद्रीय नेतृत्व के लिए एक बड़ी चिंता का विषय भी बन गया है। लेकिन इस आंदोलन के पीछे गुजरात के कुछ मोदी विरोधी गुट की भूमिका से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।

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बहरहाल, हमारे देश में आरक्षण को लेकर जब-तब मांग उठती रहती है और उसके लिए आंदोलन होते रहते हैं, जो कभी-कभी हिंसक रूप भी ले लेते हैं। इसकी मुख्य रूप से दो वजहें हैं। एक तो यह कि हमारे यहां कुछेक नीतियां ऐसी हैं, जो या तो ठीक से बनी नहीं हैं या जिन्हें ठीक से लागू नहीं किया गया है। उदाहरण के लिए, आप ओबीसी आरक्षण को ले लीजिए। यह पूरी तरह से गलत है। हमारे संविधान में जब अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई थी, तो उसके पीछे तर्क था कि समाज का जो तबका सदियों से ऊंची जातियों के उत्पीड़न एवं दमन का शिकार रहा है, जिसके पास अपनी जमीन नहीं है, जिसे लिखने-पढ़ने यानी ज्ञान हासिल करने से रोका गया, यहां तक कि जिसे मंदिरों में पूजा करने की अनुमति नहीं थी, कुएं से पानी भरने से रोका जाता था, उसे समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण का लाभ दिया जाए। पर आज जिन लोगों को ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है, वे क्या इन आधारों पर उसके योग्य हैं? क्या यादव, कुर्मी, मंडल आदि जातियों को कभी इस तरह के दमन-उत्पीड़न से गुजरना पड़ा? जाहिर है, इनका जवाब न में होगा, तो फिर इनके लिए आरक्षण की व्यवस्था क्यों?
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दूसरी बात यह है कि राजनीतिक दलों ने आरक्षण-नीति का हमेशा राजनीतिक इस्तेमाल किया है। किसी खास जाति या वर्ग का वोट हासिल करने के लिए उसे आरक्षण में कुछ फीसदी की हिस्सेदारी दे दी जाती है। आज ऐसी स्थिति हो गई है कि आरक्षण पाने के लिए आपको पिछड़ा होने की जरूरत नहीं है। यदि आप एक बड़ा वोट बैंक हैं और राजनीतिक वर्ग पर दबाव बना सकते हैं, तो आपको आरक्षण का लाभ मिल सकता है। यही नहीं, कुछ पार्टियां तो अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने के लिए नए-नए समूहों को आरक्षण के दायरे में लाने की बात करती हैं। इससे कभी-कभी पहले से आरक्षण का लाभ पा रहे लोग नए समूहों को अपना हिस्सा बांटने वाला मानकर संघर्ष पर उतारू हो जाते हैं। जातिगत सामाजिक-आर्थिक जनगणना का आखिर क्या मकसद है? मेरी समझ से तो इसका उद्देश्य यही दिखाना है कि देखो, हमारी इस जाति की आबादी इतनी फीसदी है, जो सामाजिक-आर्थिक रूप से काफी पिछड़ी हुई है और इसलिए यह आरक्षण की हकदार है। तो इस तरह राजनीतिक दलों ने न केवल सियासी लाभ के लिए इसका इस्तेमाल किया, बल्कि समाज को बांटा भी। आरक्षण का लाभ लेकर संपन्न हो चुके लोगों को उसके दायरे से बाहर करने की बात कोई नहीं करता। बेशक सभी जातियों में गरीब लोग हैं, लेकिन आरक्षण गरीबी उन्मूलन का औजार नहीं है। गरीबी हटाने के लिए अन्य कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं। आरक्षण की व्यवस्था तो दलित-उत्पीड़ित वर्ग को सम्मान देकर मुख्यधारा में लाने के लिए शुरू की गई थी।
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इसके अलावा, कुछ लोग अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए भी अपनी जायज-नाजायज मांग के लिए जाति या धार्मिक समूहों को भड़काते हैं। जैसा कि अभी गुजरात में हार्दिक पटेल कर रहे हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ अक्सर कानूनी कार्रवाई नहीं होती। इस बीच हो सकता है कि लोगों के इसी समर्थन के बल पर वह राजनीतिक सत्ता हासिल कर लें। इसलिए ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई जरूर होनी चाहिए, जो राजनीतिक महात्वाकांक्षा के तहत लोगों की भावनाओं को भड़काते हैं।

पाटीदार समाज संपन्न माना जाता है, इसलिए उसकी यह मांग अनुचित है और किसी भी सरकार के लिए इसे मानना असंभव तो नहीं कहूंगा, पर मुश्किल जरूर है। इसकी वजह यह है कि ओबीसी आरक्षण का लाभ देने के लिए जिन बिंदुओं को आधार बनाया गया है, उनमें से बारह बिंदु गांवों से संबंधित हैं, जबकि पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग करने वालों में ज्यादातर शहरी लोग हैं। मसलन, इसमें सवाल यह है कि क्या आप हाथ से काम करने वाले मजदूर हैं, क्या आपके बच्चे बाल विवाह करते हैं, क्या आपके पास कोई संपत्ति नहीं है, आदि-आदि। ये सारी बातें अक्सर ग्रामीण लोगों में पाई जाती हैं। इसलिए यह आंदोलन बहुत लंबा नहीं चलने वाला, और यदि राजनीतिक दबाव में इन्हें आरक्षण दे भी दिया गया, तो कोर्ट में वह टिकने वाला नहीं है।


सवाल उठता है कि पटेल आरक्षण की मांग क्यों कर रहे हैं। असल में ग्रामीण क्षेत्रों की वर्षों से उपेक्षा हो रही है। इधर शहरीकरण पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। आबादी बढ़ने के साथ खेती योग्य जमीन का रकबा लगातार घट रहा है। खेती से लोगों का मोहभंग हो रहा है। ऐसे में लोग आजीविका के लिए नौकरी चाहते हैं, जिसकी ज्यादातर संभावना आज सरकारी क्षेत्र में ही है। पिछले वर्ष सूरत के हीरा उद्योग में लाखों लोगों की छंटनी हुई, जिनमें से ज्यादातर पटेल थे। निजी क्षेत्र के नियोजित सेक्टर में तो रोजगार की संभावना घट ही रही है, अनियोजित क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं हैं, लेकिन वहां न तो सामाजिक सुरक्षा की गारंटी है और न ही काम के घंटे नियत हैं। लोगों को असंगठित क्षेत्र में चौदह-चौदह घंटे काम करने पड़ते हैं। इसलिए सभी चाहते हैं कि आरक्षण की बैसाखी हासिल कर सरकारी नौकरी पा लें, जहां प्रतिभा व हुनर के बगैर भी काम चल जाता है। इसलिए मेरी समझ से एक बार फिर से आरक्षण नीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है, क्योंकि कोई भी देश प्रतिभा के बल पर ही तरक्की कर सकता है।

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