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जुगाड़ में भला कैसी शर्म

Mon, 25 Feb 2013 10:50 AM IST
श्याम विमल
श्याम विमल Updated Mon, 25 Feb 2013 10:50 AM IST
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why feeling embarrassment in jugar

कल्पना करना लेखकों की आदत में शुमार है। यह आदत साहित्य के पाठकों में भी जगह बना लेती है। पढ़ते-पढ़ते पाठक किन्हीं खास साहित्यकारों (इस संज्ञा में लेखिकाओं को भी निहित मानिए) के इस हद तक प्रशंसक हो जाते हैं कि पुस्तक मेलों में जाकर इक्का-दुक्का किताब खरीदने का मन भी बना लेते हैं।

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एक दिन ये खुद भी लेखक बन जाते हैं। और फिर अपनी लोकप्रियता बरकरार रखने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार रहते हैं, चाहे वह हर मंच पर हरसंभव अपनी उपस्थिति जताना हो या देवताओं के पास पहुंचकर मनौती तथा आशीर्वाद मांगना हो।
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केवल लेखन क्यों, आजकल हर धंधे में यही प्रक्रिया अपनाई जा रही है, चाहे फिल्मों को प्रमोट करना हो, बिजनेस में अपना कोई भारी-भरकम ऑर्डर पास कराना हो, डिग्री हासिल करनी हो या नौकरी, शादी आदि करनी हो। इस तरह की प्रक्रिया अपनाकर लेखकगण भी प्रकाशक प्राप्ति और पाठक प्रियता की खातिर प्रैक्टिल होने में शरमाते नहीं हैं।
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धन या यश प्राप्ति के लिए मन्नतें मांगने का हक सबको है। देखते नहीं कि आज बॉलीवुड के सेलिब्रिटी अपनी सर्वतोन्मुखी सफलता हेतु सिर पर फूलों-चादरों के टोकरे धरे दरगाहों तक नंगे पांव जाते हुए फोटोग्राफित होते हुए चर्चा में बने रहते हैं। इन पंक्तियों का लेखक चाहता है कि उसकी बिरादरी के विविध विधायी लेखक भी उत्तर आधुनिक या प्रैक्टिकल हो जाएं। आखिर लोकार्पण या संगोष्ठियों के अलावा भी अपनी रेटिंग पॉइंट बढ़ाने के तरीके हैं।

तो इसके लिए वे अ-पुरस्कृत लेखक भी अपने सिर पर पांडुलिपियों का टोकरा उठाएं और पैदल यात्रा करते हुए तमाशा बनने से परहेज न करें और न ही लज्जा का अनुभव करें। धन और यश पाने के लिए किसी भी तरह का जुगाड़ करने में भला कैसी शर्म! लेखक आखिर शब्दों के तीरंदाज होते हैं। वे चाहे प्रकाशक का दिल छेदें, चाहे अरदास करें। तभी तो किताब छपेगी, और बिकेगी भी।


इसी तरह पेड़ पर कलावे-धागे बांधने और धूप-अगरबत्ती सुलगाने में कोई हर्ज नहीं है। जब ईष्ट देवों की कृपा से पुस्तक प्रकाशित हो जाए, तो वहां भी जाएं, जहां प्रायोजित लोकार्पणों की रस्में निभाई जाती हैं। वहां मौजूद यारबाशों की मदद से इस रस्म को भीड़तंत्र में कैसे बदला जाए, इस पर विद्वतजनों में विचार-विमर्श कराए जाएं, ताकि यार लोग रसरंजन द्वारा तृप्त होकर साल भर चर्चा का चरखा चलाते रहें।

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