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धूप आने दो: ऋष्यमूक पर्वत पर क्यों रहते थे सुग्रीव, संस्कृति के पन्ने बताएंगे कहानी
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सार
बाली के डर से सुग्रीव अपने साथियों के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रहने लगे, क्योंकि बाली को मतंग मुनि ने शाप दिया था कि वह ऋष्यमूक पर्वत पर पैर रखेगा, तो उसकी मृत्यु हो जाएगी।
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विस्तार
किष्किंधा का राजा बाली और सुग्रीव भाई थे। एक बार दोनों में लड़ाई हो गई। बाली ने सुग्रीव को बहुत मारा। उसके बाद से सुग्रीव ने किष्किंधा नगरी छोड़ दी और बाली के डर से अपने साथियों के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रहने लगा, क्योंकि बाली को मतंग मुनि ने शाप दिया था कि वह ऋष्यमूक पर्वत पर पैर रखेगा, तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। इसलिए ऋष्यमूक पर्वत सुग्रीव के लिए सुरक्षित स्थान था। मतंग के शाप की कथा दुंदुभि दैत्य से जुड़ी है।दुंदुभि को ब्रह्मा से वरदान मिला कि वह किसी भी शस्त्र से मारा नहीं जाएगा। इस पर दुंदुभि अनाचारी और निर्भय हो गया। वह लड़ने को उतावला रहता था। एक दिन युद्ध की उत्कट इच्छा लिए वह पाताल लोक से निकलकर समुद्र तट पर आ गया और उसने सागर की लहरों को ललकारा, परंतु लहरें तट पर आती-जाती रहीं। उन्हें दुंदुभि से लड़ने में रुचि नहीं थी। इसके बाद दुंदुभि, हिमालय पर्वत पर पहुंचा। उसने अपने शक्तिशली हाथों से पर्वत के किनारे चटका दिए और हिमवान को युद्ध की चुनौती दी।
हिमवान ने दुंदुभि की चुनौती अस्वीकार करते हुए कहा, ‘यह क्षेत्र पावन और शांत होने के कारण युद्ध के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है।’ इस तरह हिमवान ने भी दुंदुभि को अपने पर्वतीय प्रदेश से लौट जाने को कहा। सागर और पर्वत के व्यवहार से निराश दुंदुभि घूमता-भटकता आखिर किष्किंधा नरेश बाली के द्वार पर पहुंच गया। दुंदुभि ने बाली के पराक्रम के बारे में सुन रखा था। उसे लगा कि बाली युद्ध के लिए उपयुक्त प्रतिद्वंद्वी सिद्ध होगा।
दुंदुभि को अचानक अपना शरीर दुर्बल लगने लगा
कहते हैं, बाली को उसके पिता इंद्रदेव ने एक स्वर्णिम माला प्रदान की थी। उसे भी वरदान था कि उस माला को पहनकर बाली जब भी किसी से युद्ध करेगा तो उसके शत्रु का आधा बल बाली के शरीर में समा जाएगा। दुंदुभि को बाली की माला के बारे में पता नहीं था। दुंदुभि ने वृक्षों को उजाड़ा, नगर की इमारतों को ध्वस्त किया और बड़ा उत्पात मचाया। जब यह समाचार बाली को मिला तो वह समझ गया कि दुंदुभि से युद्ध होना तय था। दिव्य माला पहनकर बाली जैसे ही दुंदुभि के सामने आकर खड़ा हुआ, दुंदुभि का आधा बल माला के प्रभाव से बाली के शरीर में समा गया। दुंदुभि को अचानक अपना शरीर दुर्बल लगने लगा। वह इस परिवर्तन से चकित भी था और परेशान भी, परंतु सोचने के लिए अब समय नहीं था। वह बाली से भिड़ गया।
दुंदुभि का शव ऋष्यमूक पर्वत पर जाकर गिरा
बाली और दुंदुभि में घमासान युद्ध हुआ, जो कई दिनों तक चलता रहा। दोनों ही अत्यंत बलवान और पराक्रमी थे। बाली के पास दिव्य माला थी, तो दुंदुभि के पास ब्रह्मा का वरदान था। फिर भी बाली की माला अधिक प्रभावी सिद्ध हुई और आखिरकार, बाली ने अपने अद्वितीय बल का प्रयोग करते हुए दोनों हाथों से दुंदुभि को ऊपर उठाया और उसे गोल घुमाकर जोर से धरती पर पटक दिया। दुंदुभि का विशालकाय शरीर धड़ाम से धरती पर गिरा और अगले ही क्षण उसके प्राण निकल गए। परंतु दुंदुभि को मार देने के बाद भी बाली का क्रोध शांत नहीं हुआ। उसने दैत्य का शव उठाया और उसे दूर उछाल दिया। दुंदुभि का शव ऋष्यमूक पर्वत पर जाकर गिरा। संयोग से वहीं मतंग मुनि का आश्रम था। दुंदुभि के रक्त की बूंदें मुनि के आश्रम में गिरीं, तो उनका ध्यान भंग हो गया। मतंग मुनि ने दैत्य का रक्तरंजित शव जब आश्रम के सामने पड़ा देखा, तो उन्होंने आवेश में शाप देते हुए कहा, ‘जिसने भी यह घृणित कार्य किया है, उसने यदि इस पर्वत पर पैर धरा, तो उसके सिर के टुकड़े हो जाएंगे और वह तत्काल मारा जाएगा!’
मतंग मुनि के दिए शाप के कारण ही बाली के लिए ऋष्यमूक पर्वत पर जाना संभव नहीं रहा। फिर जब सुग्रीव को मतंग के शाप का पता लगा, तो उसने ऋष्यमूक पर्वत को अपना आश्रय-स्थल बना लिया। बाद में मतंग मुनि की शिष्या शबरी देवी ने सीता की खोज में निकले श्रीराम-लक्ष्मण को ऋष्यमूक पर्वत का रास्ता बताया था!