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पर्यावरण : डाटा सेंटरों पर खतरा क्यों मंडरा रहा है, डिजिटल दुनिया को जलवायु परिवर्तन से चुनौती

Fri, 25 Jul 2025 07:20 AM IST
Seema Javed सीमा जावेद
Updated Fri, 25 Jul 2025 07:20 AM IST
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सार
मोबाइल, मेडिकल इमरजेंसी, बैंकिंग और संचार तक, हमारी डिजिटल दुनिया जिन डाटा सेंटरों पर टिकी है-वे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के निशाने पर आ सकते हैं।
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Why data centers are under threat, climate change challenges the digital world
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : Freepic

विस्तार

आज हम और आप एक डिजिटल युग में जी रहे हैं, जिसमें हर काम के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकी निरंतर कनेक्टिविटी और पहुंच के लिए अपरिहार्य हो चुकी है। यह ऐसी दुनिया है, जहां डाटा सेंटर, इंटरनेट व डिजिटल सेवाएं हमारे दैनिक जीवन के लगभग हर पहलू का हिस्सा हैं। अत्यधिक गर्मी न केवल मानव जीवन के लिए खतरा है, बल्कि यह दुनिया भर के डाटा केंद्रों के लिए भी चुनौती है। अचानक आई बाढ़ केवल इन्सानी जिंदगी को ही नहीं, बल्कि डिजिटल ढांचे को भी नुकसान पहुंचा सकती है।



धीरे-धीरे तकनीक, विशेष रूप से इंटरनेट और मोबाइल, गूगल पर जिंदगी के हर पहलू की निर्भरता और भी बढ़ने लगी है। बैंकिंग से लेकर, संचार, प्रसार, क्लाउड स्टोरेज, मेडिकल इमरजेंसी से लेकर मोबाइल नेटवर्क और लॉजिस्टिक्स तक, हमारी पूरी डिजिटल दुनिया जिन डाटा सेंटरों पर टिकी है-वे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के निशाने पर कभी भी आ सकते हैं। जुलाई 2022 के अंत में जब ब्रिटेन में रिकॉर्ड तापमान दर्ज किया गया, तो कूलिंग सिस्टम में खराबी के कारण लंदन स्थित गूगल क्लाउड के डाटा सेंटर एक दिन के लिए ऑफलाइन हो गए। इसका असर सेंटर के आसपास के लोगों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि अमेरिका व प्रशांत क्षेत्र में भी सेवाएं ठप रहीं। डाटा सेंटर आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था का साइलेंट इंजन है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के चलते जैसे-जैसे दुनिया के अनेक हिस्सों में-अमेरिका, नेपाल, चीन, भारत, पाकिस्तान में-बाढ़, अत्यधिक गर्मी और सूखे से जंगलों में आग लगने की घटनाएं, जो शहरों तक फैल रही हैं, जैसे हाल ही में यूनान में देखा गया, घटित हो रही हैं।


ऐसे में इन मौसमी घटनाओं की वजह से इन डाटा सेंटरों के परिचालन में कभी भी रुकावट आ सकती है। ऐसे में जिस डिजिटल दुनिया पर खड़े हैं, वह हमारे पैरों के नीचे से खिसकती दिख रही है। क्रॉस डिपेंडेंसी इनीशिएटिव, जो जलवायु परिवर्तन के चलते तेजी से बढ़ते भौतिक जोखिमों का विश्लेषण करती है, ने अपनी नई रिपोर्ट-‘2025 ग्लोबल डाटा सेंटर फिजिकल क्लाइमेट रिस्क एंड अडॉप्टेशन रिपोर्ट’ में यह खुलासा किया है कि कैसे जलवायु परिवर्तन के चलते गर्म हो रही दुनिया में लगभग 9,000 डाटा सेंटरों के लिए खतरा मंडरा रहा है। इस रिपोर्ट के लिए भारत में 228 डाटा सेंटरों का विश्लेषण किया गया। शीर्ष 100 वैश्विक डाटा सेंटरों में भारत के पांच डाटा सेंटर हैं: उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना। भारत के उत्तर प्रदेश स्थित 21 डाटा सेंटर सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। डाटा सेंटर हब के वैश्विक विश्लेषण में यह दूसरे स्थान पर है। अनुमान है कि सदी के अंत तक जलवायु परिवर्तन के खतरों से डाटा सेंटर के बुनियादी ढांचे को होने वाले नुकसान का जोखिम दोगुने से भी ज्यादा (111%) हो जाएगा।

वर्ष 2025 में दुनिया के हर दस में से एक और 2050 तक हर आठ में से एक डाटा सेंटर खतरे का सामना करेगा। वहीं 2050 तक न्यूजर्सी, हैंबर्ग, शंघाई, टोक्यो, हांगकांग, मॉस्को, बैंकॉक, सिंगापुर जैसे बड़े डाटा हब में से 20 से 64 फीसदी डाटा सेंटर गंभीर जोखिम में होंगे। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर ढांचागत सुधारों पर तत्काल निवेश नहीं हुआ, तो डाटा सेंटर ऑपरेटरों को बीमा प्रीमियम में भारी बढ़ोतरी, लगातार परिचालन में रुकावट और अरबों डॉलर के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।   

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