दिल्ली शंघाई क्यों नहीं बन सकती?

सुरेंद्र कुमार Updated Mon, 26 Nov 2018 05:55 PM IST
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शंघाई का हवाई अड्डा
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टीवी स्टूडियो की बहसों में भाग लेने वाले लोग अक्सर सवाल उठाते हैं कि चीन भारत के साथ बराबरी का व्यवहार क्यों नहीं करता। इसके कुछ कारण स्पष्ट हैं-मौजूदा मंदी के बावजूद उसकी जीडीपी सौ खरब डॉलर को पार कर गई है, जबकि हमारी जीडीपी करीब 27 खरब डॉलर तक पहुंची है; उसका विदेशी मुद्रा भंडार करीब 30 खरब डॉलर का है, हम 450 अरब डॉलर के आसपास तक पहुंचे हैं; उसके 150 अरब डॉलर का सैन्य बजट भारत के 50 अरब डॉलर के रक्षा बजट को बौना साबित करता है। विवादों को अलग रख दें, तो चीन अपनी महत्वाकांक्षी बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव परियोजना के माध्यम से अपने दीर्घकालिक रणनीतिक उद्देश्यों का पीछा कर रहा है, जो बीस खरब डॉलर के अनुमानित बजट के अलावा 64 देशों के साथ उसके रिश्ते को प्रभावित करेगी, जबकि हम पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और छोटे से द्वीपीय देश मालदीव के साथ अपने रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
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इन बड़े संकेतकों के अलावा शंघाई की एक छोटी-सी यात्रा भी किसी भारतीय पर्यटक को बता सकती है कि दिल्ली उससे कितनी पीछे है; वहां वह यह सोचने से खुद को रोक नहीं सकता कि दिल्ली शंघाई क्यों नहीं बन सकती? विमान से उतरने के बाद जब कोई व्यक्ति इमिग्रेशन चेक के लिए हॉल में आता है, तब उसे एहसास होता है कि शंघाई का हवाई अड्डा नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से लगभग तीन गुना बड़ा है। हवाई अड्डे से शहर की तरफ जाने पर शंघाई की स्वच्छता और उसका इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रभावित करता है; न ही कहीं निर्माण स्थल पर बड़े-बड़े क्रेन दिखते हैं, न कहीं सड़क पर मोड़ और न ही खराब ट्रैफिक लाइट; चालीस मिनट की यात्रा इतनी निर्विघ्न होती है कि कंप्यूटर द्वारा नियंत्रित प्रतीत होती है।
 
जब कोई शंघाई में घूमता है, तब वह बेदाग साफ सड़कों, गलियों, पैदल मार्गों और अच्छी तरह से प्रबंधित, सुसज्जित व कलात्मक रूप से लगाए गए फूलों, कचरा पेटियों, भित्तिचित्रों और बिलबोर्डों की प्रशंसा करता है। थोड़ी-थोड़ी दूर पर रखे डस्टबिन/कचरे के डिब्बे इतने साफ दिखते हैं, मानो इन्हें इस्तेमाल करने के बजाय प्रदर्शन के लिए रखा गया हो! इस स्तर की स्वच्छता के लिए कोई मोटर चालित यंत्र नहीं दिखता, जैसा कि कई बड़े अमेरिकी शहरों में देखा जा सकता है। सारी जगहों को मनुष्यों के जरिये साफ रखा जाता है। सफाईकर्मी जमीन पर से कागज की छोटी-सी पर्ची भी उठाते हैं। हो सकता है कि इस स्वच्छता में शंघाई के नागरिकों की कचरों, खाली बोतलों व कूड़ों को कचरा पेटी में रखने की आदत का भी योगदान हो। इसके विपरीत भारत की राजधानी एक बड़े गंदे गांव की तरह दिखती है! हाल ही में यातायात के लिए खोले गए मेरठ एक्सप्रेस-वे ने निश्चित रूप से यात्रा का समय घटाया है और यह यात्रियों के लिए भी काफी आरामदेह है। हालांकि गुणवत्ता, रख-रखाव और सफाई के मामले में यह शंघाई हवाई अड्डे की सड़क से बीस साल पुराना दिखता है! शंघाई में सड़कों पर पैदल यात्रियों को प्रमुखता दी जाती है, दिल्ली के विपरीत वहां जेब्रा लाइन पर कारें आकर रुक जाती हैं।

पिछले पांच साल में दिल्ली में ढेर सारे शॉपिंग मॉल बने हैं। नोएडा सेक्टर-18 में आधे किलोमीटर के दायरे में चार मॉल हैं, जो लोकप्रिय अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के उत्पाद बेचते हैं और करोल बाग, लाजपत नगर तथा सरोजनी नगर जैसे बाजारों की तुलना में साफ हैं। लेकिन अगर कोई शंघाई में आईएफसी जैसे शॉपिंग मॉल को देखे, तो वह आकार, दुनिया के सर्वोत्तम ब्रांडों की उपलब्धता, कल्पनाशील प्रदर्शन और सफाई के मामले में एक अलग ही दुनिया है। शंघाई के पारंपरिक बाजारों में पुरानेपन और नवीनता का मिला-जुला रूप दिखता है।

पुराने शंघाई में लांग हुआ मंदिर, जेड बुद्ध मंदिर और जिंगान मंदिर जैसे बौद्ध मंदिरों के दर्शन करना किसी भी पर्यटक के लिए जरूरी है। ऐसे पारंपरिक स्थानों में अगर कोई सार्वजनिक शौचालयों का उपयोग करता है, तो उसे किसी तरह की दुर्गंध का एहसास तक नहीं होता। अगर चीन इन पारंपरिक स्थलों में सरल, मगर जरूरी सार्वजनिक सुविधाएं सुनिश्चित कर सकता है, तो हम ताज महल, लाल किला या कुतुब मीनार जैसे विश्व स्तरीय पर्यटन स्थलों पर ऐसा क्यों नहीं कर सकते?
 
शंघाई की तुलना में भारत के ऐतिहासिक स्मारकों में सुविधाएं अपर्याप्त हैं। मानकों का सही ढंग से पालन नहीं किया जाता। शंघाई के शौचालयों के आदी व्यक्ति के लिए सुलभ शौचालय या स्वच्छ भारत अभियान के तहत बने शौचालयों में जाना एक साहसिक काम होगा। अपनी पुरानी विरासत को आधुनिक तकनीक के जरिये संरक्षित करने और पर्यटकों को आधुनिक, स्वच्छ, जरूरी सार्वजनिक सुविधा उपलब्ध कराने का चीन का नजरिया पर्यटकों के लिए सुविधाजनक है। भारत के पर्यटन प्रचार को कुछ कल्पनाशील बनाने और चीन से सीखने की जरूरत है।

लंबाई, चौड़ाई, गहराई और इतिहास के मामले में दिल्ली की यमुना और शंघाई की हुआंगपु नदी के बीच कोई समानता नहीं है। पर यमुना के वाटरफ्रंट को विकसित करने, उससे कमाई करने और पर्यावरण अनुकूल विश्व स्तरीय पर्यटन केंद्र बनाने के मामले में दिल्ली शंघाई से सीख सकती है। दिल्ली में बाढ़ के कारण हजारों लोगों को यमुना तटों से बेदखल किया जाता है। गर्मियों में पानी इतना कम हो जाता है कि नदी का दायरा सिकुड़ जाता है, टनों कचरा, सीवर और प्रतिमाओं के विसर्जन से इसकी हालत खराब हो जाती है। तीन साल पहले श्रीश्री रविशंकर ने ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देशों की उपेक्षा कर यमुना तट पर विश्व सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन किया था, जिसके बाद आयोजकों पर सात करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया। केंद्र और राज्य सरकारों को हुआंगपु की तर्ज पर यमुना को साफ करने और उसके तट को पर्यावरण अनुकूल बनाकर आधुनिक बनाने के लिए संसाधनों को तैयार करना होगा। ऐसे ही बुंड ऑफ शंघाई (शंघाई का वाटरफ्रंट क्षेत्र) में की जाने वाली शानदार रोशनी से हम इंडिया गेट, कुतुब मीनार और राष्ट्रपति भवन को रोशन करने के बारे में सीख सकते हैं।
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