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इराक की तबाही के जिम्मेदार

Fri, 04 Jul 2014 07:43 PM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Fri, 04 Jul 2014 07:43 PM IST
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Who is responsible for Iraq turmoil

इराक के बिगड़ते हालात विदेश नीति के मोर्चे पर नरेंद्र मोदी सरकार के लिए पहली बड़ी चुनौती बने हुए हैं। वहां फंसी 46 भारतीय नर्सों की रिहाई बेशक हो गई हो, फिर भी इराक का संकट अपने आप में काफी बड़ा है, और पूरे विश्व के लिए यह एक चुनौती बना हुआ है। सच तो यह है कि इराक के साथ भले ही हमारा व्यापारिक संबंध है, लेकिन वहां की राजनीतिक स्थितियों को प्रभावित करने की स्थिति में हम नहीं हैं। अकेले अमेरिका भी वहां के जटिल हालात को नहीं सुलझा सकता। इसलिए भारत को कोशिश करनी चाहिए कि अमेरिकी नेतृत्व में सऊदी अरब, ईरान, रूस आदि मिलकर स्थिति को सामान्य बनाने की दिशा में हर संभव प्रयास करें। दरअसल इराक की वर्तमान हालात की वजहों के सूत्र अतीत में छिपे हुए हैं।

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सद्दाम हुसैन का सर्वसत्तावादी, दमनकारी और कई मौकों पर नृशंस शासन उतार-चढ़ाव से भरे इराकी इतिहास की महज एक झलक था। मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यता से लेकर आज तक के इसके हालात पर अगर नजर डाली जाए, तो कहा जा सकता है कि जहां इसने स्वर्णिम काल देखा, तो यह संघर्ष और हिंसा का भी गवाह बना।
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गौरतलब है कि क्रिस्टोफर कोलंबस के अमेरिका की खोज से तकरीबन 700 वर्ष पहले बगदाद को इस्लामिक दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और वाणिज्यिक केंद्र माना जाता था। सद्दाम ने जिस ईरान-इराक युद्ध को छेड़ा, उसमें दोनों देशों के लाखों सैनिक मारे गए, और जो व्यापक आर्थिक नुकसान हुआ, वह कल्पना से परे है। ईरान पर हमला करना और कुर्दों के खिलाफ रासायनिक हथियारों का उपयोग करना सद्दाम की बड़ी भूल थी। रणनीतिक वजहों से अमेरिका का उस वक्त खामोश रहना भी गलत था। कुवैत पर उसका हमला करना गलत था। मगर तब अमेरिका और पश्चिमी देशों के गठबंधन ने सही कदम उठाते हुए उसे पीछे हटने पर मजबूर किया। मगर 2003 में जॉर्ज बुश जूनियर के नेतृत्व में इराक पर हुए हमले को क्या सही ठहराया जा सकता है? सद्दाम ने कभी अल-कायदा को अपनी जमीन का उपयोग करने की इजाजत नहीं दी, और न ही वह उसके संपर्क में था। उस वक्त वह किसी भी तरह से अमेरिका के लिए खतरा नहीं था। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के तमाम विशेषज्ञ ढूंढते रह गए, मगर व्यापक जनसंहार का कोई हथियार उनके हाथ नहीं लगा, जैसा कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश दावा कर रहे थे। यह ऐसा संघर्ष था, जिसमें सद्दाम की हार तय थी। सैन्य बल के मामले में इराक की अमेरिका के साथ कोई बराबरी नहीं थी और सद्दाम का पकड़ा जाना बिल्कुल तय था।
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खैर, सद्दाम हुसैन अब नहीं है। मगर कुछ सवाल आज भी जिंदा है। क्या अमेरिका को अपने उद्देश्यों में कामयाबी मिल पाई, क्या इराक में शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक माहौल की स्थापना हो पाई है, क्या वहां ऐसी सरकार बन पाई, जिसका पूरे देश पर बराबर नियंत्रण हो, क्या वहां के नागरिक सुरक्षित हैं, क्या इराक में कानून-व्यवस्था सलामत है, क्या उस देश में पर्याप्त नागरिक सुविधाएं हैं, रिफाइनरीज और तेल के कुओं को छोड़कर बुनियादी संरचना के नाम पर वहां कुछ बचा है, क्या आज इराक अमेरिका और पश्चिम के प्रति मित्रवत हो पाया है?
           
अगर इन सभी सवालों का जवाब 'नहीं' में है, तो फिर अमेरिकी करदाताओं का पैसा पानी की तरह बहाकर अमेरिका को क्या हासिल हुआ? सच तो यह है कि इराक आज भी नर्क बना हुआ है। उन मांओं के बारे में सोचकर ही रूह कांप जाती है, जिनके दरवाजे को खटखटाते हुए आईएसआईएस के लड़ाके उनकी लड़कियों को जबरन उठा ले जाते हैं। जिस बुनियादी संरचना के विकास में सद्दाम को दो दशकों का समय लगा, वह 2003 में अमेरिकी बमबारी में मिनटों में तबाह हो गया। दजला नदी के किनारे बैठकर कॉफी की चुस्कियां और संगीत का मजा लेते हुए जिस बगदाद शहर की खूबसूरती निहारते ही बनती थी, आज वह एक भुतहा शहर बनकर रह गया है।

वियतनाम युद्ध के समय उस देश पर हमले के पैरोकार रहे अमेरिकी रक्षा मंत्री रॉबर्ट मैकनामरा को दो दशक बाद ही अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने अपनी किताब इन रेट्रोस्पेक्टः द ट्रेजेडी एंड लेसन्स ऑफ वियतनाम में लिखा, हम पूरी तरह गलत साबित हुए। उन्होंने इराक पर हमले का विरोध करते हुए कहा था कि यह नैतिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से गलत कदम है।

सवाल यह है कि क्या जॉर्ज बुश यह स्वीकारने का साहस दिखा पाएंगे कि इराक पर आक्रमण करना उनकी गलती थी, जिसका खामियाजा इराक आज तक भुगत रहा है। लीबिया और सीरिया की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है। नाटो की कार्यवाही के बाद कर्नल गद्दाफी के अंत के बावजूद आज वहां सरकार का नामोनिशान तक नहीं है, चारों ओर अराजकता फैली है। अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन का खात्मा किया। अलकायदा के दूसरे प्रमुख आतंकी भी ड्रोन हमले में मार दिए गए। यह भी सच है कि चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया चौकसी की बदौलत 11 सितंबर, 2001 के बाद से अब तक अमेरिका ऐसे किसी आतंकी हमले से बचा हुआ है। मगर यह भी उतना ही सच है कि अल कायदा आज भी पूरी दुनिया के लिए उतना ही खतरनाक बना हुआ है। यह आज भी इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया, सूडान और सोमालिया में सक्रिय है। आखिर अमेरिका ने इराक पर हमला आईएसआईए द्वारा एक नए खलीफा की स्थापना के लिए तो नहीं किया था।


समझने वाली बात है कि लोकतंत्र कोई कॉफी नहीं है, जो दूध में मिलाकर हिलाने से तैयार हो जाए। संस्थानों की स्थापना में, लोगों को लोकतंत्र के फायदों और नुकसान समझाने, लोकतांत्रिक परंपराओं और मूल्यों की स्थापना में दशकों लगते हैं। लोगों की जुबान पर जब लोकतंत्र का स्वाद लग जाता है, तो वह इसकी ज्यादा से ज्यादा मांग करने लगते हैं। सचाई तो यह है कि अगर अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों ने शुरुआत से ही अरब शासकों पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आरंभ किए जाने का दबाव डाला होता, तो आज पश्चिम एशिया की हालत कुछ और होती। दूसरी ओर, अमेरिका और पश्चिमी देशों को भी लोकतंत्र की स्थापना के लिए सत्ता परिवर्तन के नाम पर राष्ट्रों को बर्बाद कर देने की प्रवृत्ति से बचना होगा, जब तक कि उनके पास लोकतांत्रिक संस्थानों की स्थापना की कोई ठोस योजना और दृढ़ प्रतिबद्धता न हो।

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