फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Who cares for Rehana

जुल्मतों के दौर में ख्वाहिशों की कद्र भला कौन करे

Sun, 02 Nov 2014 07:50 PM IST
प्रभात
प्रभात Updated Sun, 02 Nov 2014 07:50 PM IST
विज्ञापन
Who cares for Rehana

तो रेहाना को सूली पर चढ़ा दिया गया। मालूम नहीं कि अंगदान करने की उसकी आखिरी ख्वाहिश पूरी भी हो पाई या नहीं? ईरान की आधिकारिक न्यूज एजेंसी ‘इरना’ ने रेहाना जब्बारी को फांसी दिए जाने की खबर भर दी। उसे दफन किए जाने के मौके की कुछ वीडियो क्लिप्स सोशल साइट्स पर जरूर मौजूद हैं, जिनमें कलेजा हिला देने वाले रुदन और फूलों की तस्वीर के सिवाय बहुत कुछ स्पष्ट नहीं है।

विज्ञापन


दफन के वक्त बड़ी तादाद में सुरक्षा बलों की मौजूदगी इंतजामिया की मंशा और उसके डर को उजागर करने के लिए काफी है। ऐसे में रेहाना की ख्वाहिश को कोई तवज्जो दिए जाने के आसार तो बिल्कुल नहीं लगते।
विज्ञापन


तेहरान की रेहाना जब्बारी पर आरोप था कि 2007 में उसने खुफिया महकमे के एक पूर्व अफसर मुर्तजा अब्दोलाली की हत्या कर दी थी। जांच एजेंसी और अदालत, दोनों ने ही रेहाना की इस दलील को मानने से इन्कार कर दिया कि मुर्तजा ने बेहुरमती की कोशिश की और खुद को बचाने के लिए रेहाना ने उसे चाकू मार दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन


पिछले सात वर्षों में रेहाना की फांसी की सजा खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव, एमनेस्टी इंटरनेशनल की अपील और स्वयंसेवी संस्थाओं की तमाम मुहिम बेकार गईं। किसास (यानी खून के बदले खून) पर अमल करते हुए खामोशी से उसे फांसी दे दी गई।

इन सरगर्मियों के बीच कई जिज्ञासाएं भी हैं, जिनके जवाब कहीं नहीं मिल पाते। मुर्तजा के कत्ल की जांच करने वाले अफसरों ने रेहाना के घर से खून से सना स्कार्फ और चाकू बरामद होने का साक्ष्य दिया। यह भी बताया कि रेहाना ने वह चाकू दो रोज पहले खरीदा था। तीन दिन पहले उसने अपनी एक दोस्त को संदेश भी भेजा था, मुझे लगता है कि आज रात मैं उसका कत्ल कर दूंगी।

ये सारे तर्क मुर्तजा के कत्ल की सोची-समझी साजिश की ओर इशारा करते हैं। मगर न तो जांच एजेंसी को और न ही अदालत को यह जानना-बताना जरूरी लगा कि रेहाना ने मुर्तजा का कत्ल आखिर क्यों किया होगा? इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि जिस अपराध के लिए रेहाना को फांसी दी गई, उसका मंसूबा क्या था, नहीं मालूम।

2008 में अदालत में सुनवाई के दौरान खींची गई रेहाना की एक तस्वीर पिछले कुछ दिनों में मीडिया में तमाम जगह इस्तेमाल हुई है। तस्वीर में उसका शांत चेहरा, आंखों में झलकता आत्मविश्वास, मां को भेजे गए उसके आखिरी संदेश से बहुत मेल खाता है। इस संदेश में उसने कहा था, अदालत में मुझे जघन्य-क्रूर हत्यारी साबित करने की उनकी कोशिशों के बावजूद मैं रोई नहीं, मैंने रहम की भीख नहीं मांगी, क्योंकि मुझे कानून पर भरोसा था।


यह संदेश इन्सानी उसूलों और देश के कानून से भरोसा खो चुके शख्स का है। इसके बावजूद रेहाना की ख्वाहिश थी कि मरने के बाद उसकी आंखें, दिल, जिगर और वे सारे अंग, जो किसी और को जिंदगी दे सकते हैं, दान दे दिए जाएं। उसका यह तर्क कि ‘मैं नहीं चाहती कि मेरी देह मिट्टी में दबकर खत्म हो जाए’ रवायतों से बगावत से मुकाबले जिंदगी में ज्यादा यकीन जाहिर करता है। उसकी यह ख्वाहिश भी पूरी नहीं होने देने की वजह शायद यह डर रहा हो कि वे उसे पूरी तरह नहीं मार पाए।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed