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गुफा से बाहर निकले कौन?

Sat, 18 May 2013 09:35 PM IST
कमर वहीद नकवी
कमर वहीद नकवी Updated Sat, 18 May 2013 09:35 PM IST
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who came out of cave

कोई इकतीस साल पहले की बात है, महाराष्ट्र के जलगांव की मुस्लिम पंचायत ने फतवा दिया कि मुस्लिम औरतें सिनेमा नहीं देख सकतीं। तर्क दिया गया कि सिनेमा में अश्लील बातें होती हैं, इसलिए महिलाओं को इसे नहीं देखना चाहिए। तब वहां की छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की एक कार्यकर्ता रजिया पटेल ने इसके खिलाफ संघर्ष शुरू किया और आखिर में वह जीती भी।

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उन दिनों मैं मुम्बई में था और पत्रकारिता में बिलकुल नया-नया था। इसी जलगांव की स्टोरी पर काम करते हुए मैं मुम्बई के एक बड़े मौलाना से मिलने पहुंचा। जाहिर है कि उनकी निगाह में पंचायत ने 'सही कदम' उठाया था। मैंने पूछा, 'मौलाना सिनेमा में अश्लीलता सिर्फ औरतों के लिए ही क्यों नुकसानदेह है, मर्दों के लिए क्यों नहीं?' मौलाना ने बड़ी ईमानदारी या कहें बड़ी बेचारगी से जवाब दिया कि मर्दों को रोक पाना मुमकिन ही नहीं है।
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औरतें तो घर में रहती हैं, उन पर यह बंदिश आसानी से लागू की जा सकती है। तब से अब तक दुनिया बहुत बदल चुकी है। यह अलग बात है कि मुस्लिम मौलानाओं की दुनिया लगभग जस की तस है और महिलाओं के प्रति उनके दृष्टिकोण में कुछ भी बदलाव नहीं दिखता। लेकिन मुझे तो लगता है कि पिछले इकतीस बरसों में भारत में महिलाएं हर क्षेत्र में तेजी से आगे तो बढ़ीं, इसके बावजूद एक सांस्कारिक जड़ता से वे बाहर नहीं आ पा रही हैं।
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राजनीति, करियर और पढ़ाई-लिखाई में शीर्ष पर पहुंचने के बावजूद लड़कों और लड़कियों के लिए शील और चाल-चलन के अलग-अलग मापदंडों के सदियों पहले जड़े गये खांचों से वे बिलकुल भी बाहर नहीं निकल सकी हैं और गाहे-बगाहे अन्तस के गहरे कुओं में बैठी घूंघटवालियां अपने संस्कारों के चाबुक खुद अपनी पीठ पर चला कर अब भी जयकारे करती नजर आती हैं।

अभी गाजियाबाद की ही घटना लें। पुलिस ने किसी लड़की को किसी लड़के के साथ कार में शराब पीते पकड़ा। थाने में कुछ गरमा-गरमी भी हुई और पुलिस ने लड़की को थप्पड़ जड़ दिए। अब इस घटना पर दो महिलाओं के जो बयान आए, वह देखिए। किरन बेदी के ख्याल में 'किसी लड़की का लड़कों के साथ सार्वजनिक जगह पर शराब पीना ठीक नहीं।'

यह अलग बात है कि जब इस बयान पर विवाद शुरू हुआ तो उन्होंने कहा कि उनकी बात को सही तरीके से नहीं पेश किया गया और उनका मानना है कि 'किसी का भी सार्वजनिक जगह पर शराब पीना उचित नहीं है।' हो सकता है कि पहले किरन जी की जबान फिसल गई हो या लोगों ने उनकी बात गलत सुन या समझ ली हो। होने को तो बहुत कुछ हो सकता है, लेकिन असल में हुआ यही कि पहले उनके मुंह से वही बात निकली, जो संस्कारों की घुट्टी के रूप में कहीं गहरे बैठी थी।

यानी 'लड़की का' ऐसा करना ठीक नहीं! लड़का करे तो करे, हालांकि वह भी ठीक नहीं, लेकिन लड़की को तो न बाबा न, कतई ऐसा नहीं करना चाहिए! इसी घटना पर दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह का कहना था कि बच्चे अगर कुछ गलत करते हैं तो मां-बाप भी उन्हें डांटते-चपतियाते हैं तो पुलिस ने भी बच्चा समझ कर ही लड़की को थप्पड़ लगा दिया।

चलिए, हम मान लेते हैं कि बरखा जी ने नासमझी में इसे पुलिस ज्यादती के बजाय 'पितातुल्य समझावन-बुझावन' मान लिया, लेकिन जरा दृश्य बदल कर देखिए। अगर शराब पीने वालों में केवल लड़के ही लड़के होते और पुलिस ने ऐसा किया होता, तो तब भी क्या यह 'मां-बाप वाली' भावना कहीं से टपकती?

16 दिसम्बर के दिल्ली बलात्कार कांड पर भोपाल में एक महिला कृषि विज्ञानी ने सवाल उठाया था कि वह लड़की 10 बजे रात में अपने ब्वायफ्रेंड के साथ क्या कर रही थी? शीला दीक्षित, ममता बनर्जी समेत ऐसे हजारों उदाहरण हैं जहां खुद बड़ी जुझारू और बड़ी जागरूक मानी जाने वाली महिलाओं की तरफ से इसी तरह के 'लड़की के लिए आचारसंहिता' टाइप बयान आते रहे हैं।


आखिर स्वतंत्र नारी का प्रतिमान बनी घूम रहीं ऐसी महिलाएं भी महिलाओं के लिए मर्यादा की वही लक्ष्मण रेखा जाने-अनजाने क्यों खींचती हैं, जो उन्हें नौकरी, करियर, घूमने-फिरने की दिखावटी आजादी तो देती है, लेकिन साथ में महिला होने का एक पिंजरा भी उनके चारों ओर बनाए रखती है। अपने मूल चरित्र में सामन्ती और पुरातनवादी हमारे समाज में पुरुष तो जब बदलेंगे और सुधरेंगे, तब की तब है, लेकिन पहले महिलाओं को इस मानसिक सांस्कृतिक जकड़ से अपने आपको मुक्त करना होगा।

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