{"_id":"64d97ca97d7243a202016eb3","slug":"when-ballia-became-independent-in-1942-swaraj-government-was-headed-by-chittu-pandey-2023-08-14","type":"story","status":"publish","title_hn":"झरोखे से: जब बलिया आजाद हो गया था, चित्तू पांडे की अगुआई में चली थी सुराजी सरकार","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
झरोखे से: जब बलिया आजाद हो गया था, चित्तू पांडे की अगुआई में चली थी सुराजी सरकार
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
10 अगस्त 1942
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
वर्ष 1942 की क्रांति भारतीय इतिहास का वह प्रस्थान बिंदु है, जहां से आजादी का झरोखा खुलने लगता है। बेशक उस दौर में अंग्रेजी सरकार के आंकड़ों के ही मुताबिक, करीब 80 हजार से ज्यादा लोग जेलों में ठूंसे गए और 10 हजार से ज्यादा लोग मारे गए। उसके बावजूद अंग्रेजी सरकारों को लगने लगा कि अब भारत काबू में नहीं रहेगा। भारत के आखिरी वायसराय माउंटबेटन के सूचना अधिकारी रहे एलेन केंपबेल जॉनसन की डायरियों से गुजरने पर पता चलता है कि 42 में भारत के जन-जन के जाग उठने से अंग्रेजी सरकार को आभास हो गया था कि अब उसके भारत में दिन गिने-चुने हैं। निश्चित तौर पर इसमें सबसे बड़ा योगदान बलिया, मिदनापुर और सतारा की आजादी का रहा, जहां से अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंका गया था। तब लोगों ने अपना शासन चुना था और अपने तरीके से सरकार चलाई थी।बलिया में चित्तू पांडे की अगुआई में हफ्ते भर तक सुराजी सरकार चलती रही। बेशक इसकी कीमत बलिया को बाद के दिनों में चुकानी पड़ी। लेकिन उसने इतिहास को पलटने के लिए अंग्रेजों को सोचने और भविष्य की ओर देश को देखने का संदेश भी दिया। ब्रिटेन की संसद के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स में पांच मार्च, 1947 को भारत को आजादी देने को लेकर बहस शुरू हुई। दो दिनों तक चली उस बहस में सभी सहमत हो चुके थे कि अब भारत को आजाद करना ही होगा, लेकिन भारत को तोड़ने के साथ।
भारतीय आजादी के इतिहास की जब भी चर्चा होती है, तब इसके लिए कांग्रेस के आंदोलन को प्रमुखता दी जाती है। लेकिन उन्हीं दिनों हुए आंदोलनों की महत्ता को उस अंदाज में स्वीकार नहीं किया जाता, जैसा होना चाहिए। ब्रिटिश सरकार को सशंकित करने और अंतत: भारत को आजाद करने के लिए कांग्रेस के स्वाधीनता आंदोलन के साथ ही बलिया से ब्रिटेन के पांव उखड़ना, पूर्वी सीमाओं पर आजाद हिंद फौज की दबिश के साथ-साथ सतारा और मिदनापुर में सुराजी शासन स्थापित होने ने बड़ी भूमिका निभाई।
आजादी के आंदोलन में बलिया की अहमियत का पता इससे लग सकता है कि 12 अक्तूबर, 1945 को बलिया पहुंचे पंडित नेहरू ने बलिया के योगदान को याद किया था। बलिया के बैरिया और रसड़ा में शहीदों की याद में आयोजित सभाओं में उन्होंने दो भाषण दिए थे। बैरिया के भाषण में नेहरू ने 17 अगस्त, 1942 को शहीद हुए लोगों को श्रद्धांजलि देने के बाद कहा था, ‘बलिया के बहादुर पुरुषो और महिलाओ! मैं आपके संघर्ष को सलाम करता हूं। आपको बधाई देता हूं कि आज आपकी बहादुरी के किस्से पूरे हिंदुस्तान में सुने जा रहे हैं। आपकी यही ख्याति मुझे आपकी ओर खींच लाई है। नौकरशाही और अंग्रेजी शासन द्वारा की गई जुल्म-जबर्दस्ती भी उन्हें डिगा नहीं सकी। हिंदुस्तान की जनता कभी भी बलिया के बहादुर लोगों, किसानों और युवाओं के बलिदान और संघर्षों को भुला नहीं सकेगी।'
1942 की क्रांति और उसके लिए बलिया ने जो कीमत चुकाई, उसकी गूंज लंदन में भी गूंजी। उन दिनों संयुक्त प्रांत के गवर्नर हैलेट ने अगस्त, 1942 के आखिर में भारत सचिव को लंदन में खबर भेजी कि बलिया पर फिर से कब्जा कर लिया गया है। बलिया की आजादी के महत्व को कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद ने भी स्वीकार किया था। तब उन्होंने कहा था, 'मैं बलिया की उस सरजमीं को चूम लेना चाहता हूं, जहां इतने बहादुर और शहीद पैदा हुए।'
ब्रिटेन ने जब बलिया पर कब्जा कर लिया, तो वहां अत्याचारों का तांडव शुरू हुआ और उसका सामना करने के लिए बलिया को तैयार करने में जिस शख्सियत की भूमिका अहम रही, वह शख्सियत थे फिरोज गांधी, जो 1944 में बलिया आए, महीनों तक तांगे से उन्होंने जिले का भ्रमण किया और वहां के वकीलों को ब्रिटिश सरकार द्वारा थोपे मुकदमों की पैरवी करने के लिए तैयार किया। 42 की क्रांति की बरसी पर उन्हें याद करना और उस घटना को 1947 की पृष्ठभूमि के प्रमुख अध्याय के तौर पर भी याद करना वक्त की जरूरत है। इस तथ्य को भी स्वीकार करना होगा कि बलिया की आजादी भारत की आजादी का प्रस्थान बिंदु रही।