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खेतिहर महिलाओं को मान्यता कब

हेमा स्वामीनाथन Updated Wed, 13 Dec 2017 06:07 PM IST
हेमा स्वामीनाथन
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भारत में महिलाओं ने कृषि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज ग्रामीण परिदृश्य में जो बदलाव आया है, उसमें खेती में महिलाओं के योगदान को रेखांकित किया जा सकता है। इस विषय पर होने वाले किसी भी विमर्श में कृषि क्षेत्र में स्वरोजगार, बिना पारिश्रमिक हिस्सेदारी या फिर खेतिहर मजदूर के रूप में महिलाओं के अनुपात पर बात होती है। लेकिन महिलाओं की भूमिका में आए एक महत्वपूर्ण बदलाव को नजरंदाज कर दिया जाता है और वह है कृषि क्षेत्र में महिलाओं की प्रबंधन में बढ़ती हिस्सेदारी और निर्णय लेने वाली बढ़ती भूमिका। कृषि से जुड़े प्रबंधन में महिलाओं की बढ़ती भूमिका के पीछे सबसे बड़ा कारक है बेहतर जिंदगी की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से पुरुषों शहरों की ओर पलायन। लेकिन इन ग्रामीण घरों में अकेली रह गईं महिलाओं के साथ क्या होता है?
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खासतौर से ग्रामीण घरों में प्रवासन जीवनयापन का एक जरूरी हिस्सा है। भारत में स्थायी नहीं, बल्कि अल्पावधि का प्रवासन कामगारों की गतिशीलता के लिए जिम्मेदार है, और अध्ययन बताते हैं कि महिलाओं की तुलना में पुरुष अधिक पलायन करते हैं। पलायन करने वाले समुदाय के घरों में निश्चित रूप से श्रम संतुलन करना पड़ता होगा। यह कैसे होता है, यह घर के आकार और उसके ढांचे ( संयुक्त या एकल परिवार), सामाजिक कायदों और महिलाओं और पुरुषों की अपेक्षित जिम्मेदारियों के आधार पर होता है। पुरुषों और महिलाओं पर इसका प्रभाव भिन्न तरीके से होगा। 

मैंने इसे और गहराई से समझने के लिए मेरे सहयोगियों एस चंद्रशेखर, इंदिरा गांधी विकास अनुसंधान केंद्र और सोहम साहू, यूनिवर्सिटी ऑफ गोटिंगन के साथ मिलकर राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के जमीन तथा पशुधन से संबंधित आंकड़ों का विश्लेषण किया। हमने जनवरी-दिसंबर, 2013 के दौरान ग्रामीण भारत में सर्वेक्षण किया और दो प्रवासों में हम 35 हजार घरों में गए।

भारत में पहली बार एनएसएसओ सर्वे में अल्पावधि के पलायन की जानकारी एकत्र की और यह भी कि क्या किसी घर का सदस्य घर के खेती योग्य जमीन का संचालक तो नहीं है। यहां संचालक से आशय है ऐसा व्यक्ति जो घर की जमीन के संबंध में बड़े छोटे सारे निर्णय लेता हो।

हमारे आंकड़ों ने दिखाया कि 2013 में 15 से 65 वर्ष की 1.8 करोड़ महिलाएं तथा 8.5 करोड़ पुरुष मुख्य संचालक थे। यह दिलचस्प जानकारी सामने आई कि अल्पावधि का पलायन करने वाले घरों में महिलाओं के संचालक होने की संभावना अधिक है। इससे पता चलता है कि पुरुषों की अनुपस्थिति में (हालांकि हमें सर्वे से पता नहीं चलता कि पलायन करने वाले व्यक्ति का लिंग क्या है; ऐसी जानकारियां उपलब्ध हैं जो संकेत करती हैं कि पलायन अधिकांशतया पुरुष ही करते हैं), महिलाएं खेती संबंधी निर्णय लेती हैं। 

हमने आगे देखा कि शिक्षा के उच्च स्तर के साथ ही पुरुषों के कृषि क्षेत्र छोड़ने की संभावना बढ़ती है। संभवतः वे खेती से इतर रोजगार के और आकर्षक विकल्प देखने लगते हैं। हालांकि यदि उनके पास जमीन में वृद्धि होती है तो पुरुषों के संचालक होने की संभावना भी बढ़ती है और महिलाओं की भूमिका सीमित होती जाती है। 

भारत में नीति नियंता अब भी इस धारणा से प्रेरित हैं कि किसान का मतलब पुरुष है। अक्सर महिलाओं को उनके योगदान के बावजूद अब किसान के रूप में मान्यता नहीं दी जाती। यह नीति नियंताओं पर है कि वे ऐसा माहौल बनाएं जिसमें खेती से जुड़ी महिलाओं की पहुंच मशीनी और वित्तीय संसाधनों तक हो सके। 

लेखिका, आईआईएम बंगलुरू में सहायक प्राध्यापक हैं

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