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कैसी है आपकी यह सरकार हसीना जी
कुमार प्रशांत
Updated Wed, 06 Jul 2016 08:07 AM IST
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कुमार प्रशांत
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कितना अजीब है यह देखना-सुनना कि ढाका के आतंकी हमले के बाद बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना अपने देशवासियों से पूछ रही हैं कि कैसे मुसलमान हैं आप लोग, जो रमजान के पाक महीने में भी लोगों की हत्या करते हैं? गोया रमजान का महीना न होता, तो हत्या करना जायज हो सकता था; और यह भी कि अगर आप मुसलमान नहीं हैं, तो आपकी हत्या पर सवाल नहीं पूछा जाएगा। और यह भी कि सरकार का काम सवाल पूछना है, जवाब देना नहीं! यह कैसी सरकार है, जो सरकार की तरह न तो काम करती है, न बात करती है और न जिम्मेदारी कुबूल करती है?
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एक दिन की चुप्पी के बाद जब इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने इस हमले की जिम्मेदारी ले ली, तो प्रधानमंत्री कहती हैं कि यह कत्लेआम आईएस ने नहीं करवाया, ये तो बांग्लादेश के ही पिछवाड़े में पैदा हुए अपने ही आतंकवादी हैं। अगर यह सच है, तब तो यह और भी जरूरी है कि आपकी सरकार सरकार की तरह काम करती दिखाई दे और आतंकी नेटवर्क की पूरी जानकारी देश के सामने रखे। यह संभव है कि अंदरूनी आतंकी जाल से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए आईएस का नाम उछाला गया हो, लेकिन सरकार जब तक ठोस जानकारी सार्वजनिक नहीं करती, उसकी डूबती विश्वसनीयता रसातल में जाएगी। अभी तो ऐसा लग रहा है इस घटना के बहाने शेख हसीना विरोधियों को निपटाना चाहती हैं। यह कमजोर सरकार का क्षुद्र रवैया है।
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ढाका की घटना अचानक नहीं घटी, रोज-रोज उसका पूर्वाभ्यास किया जा रहा था। वहां से लगातार ऐसी खबरें आ रही थीं कि उदारवादी ब्लॉगरों की हत्याएं हो रही हैं, हिंदू पुजारियों की हत्याएं हुईं, वैसे लोगों की हत्याएं हुईं, जो उदारचेता बांग्लादेश को उभारने में लगे थे। इस्लाम के नाम पर कठमुल्लापन दिखाने वालों की आवाज भी और उनकी दूसरी शैतानियां भी लगातार बढ़ती रहीं। लेकिन इन सबसे हसीना सरकार ने आंखें मूंद रखी थीं। भारत के साथ संधि और विकास के संसाधनों की जितनी भी बातें की गईं, उसमें कहीं भी यह मुद्दा तो नहीं आया कि बढ़ती कठमुल्ला ताकतों को काबू में करने की कोई संयुक्त योजना बने। सारी दुनिया में आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई का ऐलान करने वालों को क्या अपने घर में पनप रही कट्टरता से भी उसी शिद्दत से निपटने की तैयारी नहीं दिखाई जानी चाहिए? और क्या आज ही ऐसी शुरुआत का वक्त नहीं है?
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खबरें हैं कि हत्यारे बांग्लादेश के समृद्ध वर्ग के अभिजात्य स्कूलों में पढ़े थे। अगर यह बात सच है, तो जाहिर है कि बांग्लादेश की जड़ों में जहर घुल रहा है। इसकी अनदेखी या फिर इसमें से अपना राजनीतिक हित निचोड़ने की कोई भी कोशिश हाराकिरी के बराबर होगी। जो व्यवस्था रेत में सिर गाड़े हुए बस अपना अस्तित्व बचाने में लगी होती है, आतंकवाद को पनपने देने की सबसे जरखेज जमीन तैयार करती है।
देश के किसी भी कोने में सांप्रदायिक जहर फैलाने की कोशिश हो, तो उसे सख्ती से दबाने से ही यह संदेश जाता है कि इसे सरकार किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगी। जब आप अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए हिंसक घटनाओं की अनदेखी करने का नाटक करते हैं, तो उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।
बांग्लादेश के साथ-साथ भारत को भी कट्टर ताकतों और आवाजों के प्रति सावधान और सख्त होना पड़ेगा, अन्यथा देश का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना गड़बड़ा जाएगा।