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राजनीति: चुनावी मौसम में जरा देखिए बंगाल को, ममता को नकदी बांटने वाली योजनाओं पर भरोसा
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फाइल)
- फोटो :
ani
विस्तार
संदेशखाली मामले पर पूरे देश में शर्मसार बंगाल के चुनावी अखाड़े में आखिर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एकला चलो रे का ही रास्ता अपनाया। ममता की प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षाएं जब-तब पोस्टरों में दिखती रही हैं और उनके उत्तराधिकारी अभिषेक तो आज भी जनसभाओं में 71 साल की बुआ को पीएम पद के लिए योग्य उम्मीदवार बता रहे हैं। दीदी ने गठबंधन के लिए कांग्रेस की करुण पुकार को अनसुना करते हुए अपने 42 प्रत्याशियों की घोषणा करवा दी। चलिए, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से गठबंधन की बात को अप्राकृतिक मान लेते हैं, पर उनका उदय तो कांग्रेस से ही हुआ है।तृणमूल को लगता है कि वह अकेले ही पीएम मोदी का अश्वमेध का घोड़ा बांध लेगी। 2019 के चुनाव में कांग्रेस को 5.7 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि 2021 के चुनावों में उसे लगभग तीन प्रतिशत मत मिले। लोकसभा चुनाव में तृणमूल को 43.7 और भाजपा को 40.6 प्रतिशत वोट मिले थे। कांग्रेस का पिछला वोट प्रतिशत भले ही मामूली हो, पर राज्य में लंबी उड़ान भरती दिख रही भाजपा को रोकने की कोशिश या प्रयोग वे कर सकती थीं। वामपंथी दल, खासकर सीपीएम का भी अब तक कांग्रेस से कोई चुनावी तालमेल नहीं हो पाया है। वहां भी यही सवाल बाधा बना हुआ है कि वाम वोट तो कांग्रेस को मिल जाते हैं, पर 35 साल तक विपक्ष में रहकर कामरेडों का चाबुक खाने वाले कांग्रेसी अपने घाव नहीं भुला पाते।
हां, मुस्लिमों व दलितों में तेजी से जनाधार बढ़ा रहे इंडियन सेक्युलर फ्रंट और वाम दलों से तालमेल की बात चल रही है। ममता को सबसे ज्यादा भरोसा नकदी बांटने वाली सरकारी योजनाओं पर है। हालांकि संदेशखाली कांड के बाद महिलाओं ने मुखर होकर कहा कि अपनी इज्जत और स्वाभिमान के बदले उन्हें यह राशि नहीं चाहिए। बताया जाता है कि सागरदीघी विधानसभा सीट पर उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के जीतने के बाद क्षेत्र में लक्ष्मी भंडार सुविधा बंद कर दी गई थी और दोबारा यह सुविधा तब चालू हुई, जब वहां से जीते कांग्रेस प्रत्याशी बायरन विश्वास तृणमूल में लौटे। सीएए लागू होने के बाद और घायल होने से पहले ममता ने घुमा-फिराकर मंचों से ही ऐलान किया कि नागरिकता के लिए आवेदन करते ही वे अवैध नागरिक हो जाएंगे और राज्य सरकार की सारी सुविधाएं बंद हो जाएंगी।
इधर, भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद सत्ता में आने पर हर महिला को 3-3 हजार रुपये देने का वादा कर रहे हैं। ममता ने केंद्र की ओर से जनकल्याण की योजनाओं का धन रोक देने को चुनावी मुद्दा बनाया है। हालांकि भाजपा इन योजनाओं में भ्रष्टाचार के मामलों को उछाल रही है। प्रधानमंत्री ने अपनी आरामबाग रैली में साफ कहा कि लूटने वालों को लौटाना ही पड़ेगा। भाजपा पूछ रही है कि बंगाल सरकार अदालत क्यों नहीं जाती? हम देख चुके हैं कि केंद्र से पावना के मामले पर केरल हाल ही में सुप्रीम कोर्ट गया और उसे इस मसले का हल मिला।
ममता अपनी दूसरी ताकत बहुचर्चित धर्मनिरपेक्षता को मानती हैं। लेकिन बदले माहौल में यह ताकत कमजोरी के तौर पर देखी जा रही है। संदेशखाली मामले में ईडी टीम पर जानलेवा हमला करवाने वाले शेख शाहजहां को 55 दिन तक पकड़ा नहीं गया, उससे तुष्टीकरण की अवधारणा ही बलवती हुई। वैसे कुछ साल पहले ईद मिलन समारोह में सीएम ममता ने जब मंच से कह दिया कि दुधारू गाय की लात भी सही जाती है, तो इसमें छिपाने लायक कुछ रह नहीं जाता। इसके मुकाबले में राज्य की 70 फीसदी हिंदू आबादी के ध्रुवीकरण की भी संभावना बन सकती है।
इस बीच, चुनावों की घोषणा के साथ ही राज्य में रक्तपात शुरू हो चुका है। इस माहौल में एक दिन देश ने यह भी देखा कि घर में गिरकर घायल होने के बाद एक सीएम के माथे से बहता खून सूख जाता है और उनकी पार्टी अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर इसी तस्वीर को सर्कुलेट करती है। ध्यान रहे कि वह तस्वीर अस्पताल की थी और सीएम को घर से एंबुलेंस में नहीं, भतीजे अभिषेक अपनी गाड़ी में लाए। सीएम के घर में थोड़ी-सी रूई, एक बैंडेज और चार बूंद डेटाल का न होना बंगाल की कैसी तस्वीर पेश करता है? मेडिकल बुलेटिन में पीछे से धक्का मारने की थ्योरी भी कम दर्दनाक नहीं है! सहानुभूति लहर की उम्मीद करने वालों के प्रति हमें सहानुभूति रखनी चाहिए।