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हमें बाढ़ पीड़ितों का दर्द महसूस करना होगा

Tue, 19 Aug 2014 06:38 PM IST
सुभाष चंद्र कुशवाहा
सुभाष चंद्र कुशवाहा Updated Tue, 19 Aug 2014 06:38 PM IST
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We have to feel the pain of flood victims

एक बार फिर तराई क्षेत्र के अविकसित जिलों में प्रमुख- श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर राप्ती तथा घाघरा नदी के उफान से तबाह होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। वहीं बाराबंकी, सिद्धार्थनगर, बस्ती, गोरखपुर, आजमगढ़ और गाजीपुर पर खतरे मंडरा रहे हैं। इन इलाकों की साल दर साल की यही कहानी है। हालांकि बाढ़ राहत के नाम पर यहां करोड़ों रुपये खर्च भी हुए हैं, लेकिन बांधों की मरम्मत के बजाय ये रकम अफसरों की जेबों में चली जाती है। विडंबना है कि आजादी के बाद से बाढ़ राहत के नाम पर जितना खर्च इन इलाकों में हुआ है, उतने में पूरे तराई क्षेत्र को विश्व के सबसे ज्यादा विकसित शंघाई शहर जैसा बनाया जा सकता था।

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बाढ़ की तबाही से ज्यादातर ग्रामीण गरीब आबादी प्रभावित होती है। बाढ़ अपने साथ सिर्फ पानी ही नहीं, तमाम तरह की आफतें भी लाती हैं। सांप-बिच्छू, हैजा और पेचिस गरीबों को अपने चंगुल में फांसते हैं। चारे की कमी से मवेशी मरते हैं। सड़क और रेल मार्ग अवरुद्ध होते हैं। तराई क्षेत्र और पूर्वांचल के अविकसित रहने का एक कारण यह भी है। दुखद है कि यहां के हालात को समझने के बाद भी हर बार समय पूर्व कार्ययोजनाएं क्रियान्वित नहीं की जातीं। बाढ़ राहत कार्ययोजना की लचर व्यवस्था के चलते न तो समय पर नावें पहुंच पाती हैं, न राहत सामग्री। इतना ही नहीं, नेपाल से आने वाली नदियों पर बैराज न के बराबर हैं और बरसात के दिनों में इन्हें नियंत्रित करने का कोई साधन हमने विकसित नहीं किया है। नतीजतन राप्ती, कोसी, गंडक और घाघरा की प्रचंडता हम रोक नहीं पा रहे।
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आजादी के पूर्व ब्रिटिश भारत में बाढ़ नियंत्रण हेतु कार्ययोजना बनाने के लिए 1898 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में महत्वपूर्ण सम्मेलन हुआ था। इसी प्रकार पटना में 1930 में बाढ़ आपदा को कम करने पर विचार किए गए थे। आजादी के बाद प्रधानमंत्री नेहरू की पहल पर 1955 में ‘निर्मली बाढ़ सम्मेलन’ (बिहार) में कुछ ठोस योजनाएं बनी थीं । लेकिन 1960 के बाद से इस समस्या पर कभी गंभीरता से विचार नहीं किया गया। नदियों को आपस में जोड़ने की बात भी चली, लेकिन वह भी ठंडे बस्ते में जा चुकी है। पानी से घिरे गांवों के लोगों को बरसात के दिनों में सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए न तो हमने वैकल्पिक स्थान विकसित किया है, न बाढ़ का पानी उतरते समय तटबंधों को खोलकर, उतरते पानी के लिए रास्ते बनाए हैं। यही कारण है कि बाढ़ का पानी उतर जाने के बावजूद, महीनों तक किसान अपनी जमीनों पर खेती नहीं कर पाता।
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हमारे नीति-नियंताओं को बाढ़ से विस्थापित होने वाले लोगों का अकल्पनीय दर्द महसूस करना होगा। तबाह होते लोग अपनी आंखों के सामने मवेशियों, परिजनों को डूबते, तड़पते देख, जिजीविषा की हिम्मत खो देते हैं। इसलिए जरूरी है कि उफनने वाली नदियों की प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर बैराज बनाने की प्रक्रिया तेज की जाए। बाढ़ आने की पूर्व सूचना देने वाला तंत्र हमें स्थापित करना होगा। नदियों के पानी को नहरों के माध्यम से अन्य सहायक नदियों में मोड़कर उनकी तीव्रता रोकनी होगी। बाढ़ से विस्थापित होने वालों के लिए स्थायी शरणस्थलों का निर्माण और पर्याप्त मात्रा में मोटरबोटों एवं प्रशिक्षित कर्मचारियों की तैनाती भी हमें करनी होगी। ऐसा करने पर ही हम बाढ़ पीड़ितों का दर्द कुछ कम कर सकेंगे।

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