बदलाव के लिए हम तैयार नहीं
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बजट नया संदेश लेकर नहीं आया। मन में कौतूहल भी नहीं जगा पाया। टीवी सस्ता कर दिया या सिगरेट महंगी कर दी, यह तो चलता ही रहता है। हां, रक्षा और बीमा के क्षेत्र में एफडीआई के चलते कुछ बदलाव हो सकता है। बाहर से पैसा आएगा। पर समूची आधारभूत संरचना में कोई बदलाव देखते ही देखते होने लगेगा, ऐसा नहीं लगता। बजट से महंगाई पर रोक लगेगी, ऐसा भी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में जो हालात हैं, उसे देखते हुए हमें बहुत हाय-तौबा नहीं मचानी चाहिए। हमारी मौद्रिक नीति पहले ही बहुत कठोर है। रिजर्व बैंक ने जितने जोड़-जतन करने थे, वे सब किए। महंगाई पर बजट का कोई असर नहीं हो पाता। इसकी चाबी कहीं और है। सरकार का खाद्यान्न भंडार 698 लाख टन है। इसका आधा भी बाजार में आ जाए, तो स्थिति संभल जाए। इस खाद्यान्न को बाजार में कौन आने देगा? फिर जमाखोरों का क्या होगा?
कहा जा रहा है कि निवेश बढ़ेगा, तो उत्पादन भी बढ़ेगा। निवेश रोजगार बढ़ाएगा। साफ है कि निजी क्षेत्र ही रोजगार पैदा करेगा। जरा चीन से यहां की तुलना कीजिए। वहां निवेश के लिए कोई संस्था आएगी या नहीं, इसका जवाब तीन हफ्ते में दे दिया जाता है। हमारे यहां नौ महीने तक भी जवाब नहीं मिलता। कोरियाई कंपनी पॉस्को को ओडिशा में आने के लिए नौ वर्ष इंतजार करना पड़ा। फिर भी उसके लिए दरवाजे नहीं खुले। दरअसल बजट के प्रावधान ही किसी निवेशक को उत्साहित नहीं करते। विश्वास, फायदा, सुरक्षा, कई पहलू हैं, जिन पर निवेशक सोचता है।
अक्सर पूछा जाता है कि बजट आम लोगों के लिए खुशहाली लाएगा या नहीं। पहले हम जान तो लें कि गरीबी रेखा के नीचे की आबादी अपनी मजबूरियों से उबर क्यों नहीं पा रही? हम सस्ता अनाज उस तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं। उसे हमेशा आंशिक रोजगार के दड़बे में बंद करके रखा है। कहा गया कि मनरेगा से स्थिति सुधरेगी। बात में पता चला कि इसके मद का 40 फीसदी धन कहां गया, पता ही नहीं चला। अच्छा है कि नई सरकार कह रही है कि इसे कसौटी पर परखा जाएगा। ऐसा ही हल्ला गंगा ऐक्शन प्लान, स्मार्ट सिटी को लेकर भी है। बजट से गंगा साफ नहीं होती। कितना रुपया गंगा के पानी में बह गया। इसके लिए स्थानीय निकायों के स्तर पर व्यापक प्रबंधन की जरूरत है।