फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Water conservation will provide a way to fight forest fire

दावानल: जंगल की आग का भयावह राग, जल संरक्षण से निकलेगी बचाव की राह

anil prakash joshi अनिल प्रकाश जोशी
Updated Sat, 27 Apr 2024 07:22 AM IST
विज्ञापन
सार
ग्लोबल वार्मिंग के चलते वनों की आग एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। पृथ्वी पर अब मात्र 31 फीसदी वन बचे हैं। दुनिया में प्रति व्यक्ति o.61 हेक्टेयर वन क्षेत्र बचे हैं, जबकि अपने देश में यह 0.08 हेक्टेयर है। यह स्वस्थ उपलब्धता नहीं कही जा सकती।
 
loader
Water conservation will provide a way to fight forest fire
जंगल की आग बुझाते वन विभाग के कर्मचारी।

विस्तार

उत्तराखंड में जंगल की आग एक बार फिर बड़ा रूप ले चुकी है, जबकि इस बार तो पहले से ही पता था कि जंगल की आग विकराल रूप लेगी। अभी अप्रैल खत्म भी नहीं हुआ और अब तक करीब 256 हेक्टेयर जंगल में आग लग चुकी है। जंगल में आग लगने की 245 घटनाएं हो चुकी हैं। जाहिर है, आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ेगी। वनों में आग लगने का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन पहले छिटपुट घटनाएं होती थीं, जिन पर तुरंत नियंत्रण पा लिया जाता था, क्योंकि तब न इतनी प्रचंड गर्मी पड़ती थी और न ही ऐसी ज्वलनशील पादप प्रजातियां थीं। तब वन और जन का रिश्ता अटूट था। पूरे गांव के लोग इस दवानल पर भारी पड़ते थे।



वनाग्नि सिर्फ उत्तराखंड के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश और दुनिया के लिए चिंता का विषय है। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे आग को भड़काने में पूरी भूमिका निभाते हैं, क्योंकि दुनिया का औसत तापमान अगर बढ़ चुका है, तो आग तो पूरी दुनिया के जंगलों में लगेगी ही। कनाडा, कैलिफोर्निया, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया इसके ताजा उदाहरण हैं। इन देशों में शीतोष्ण जलवायु है, फिर भी ग्लोबल वार्मिंग के कारण दावानल की घटनाएं होती रहती हैं। मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के एक शोध से पता चला है कि आग 2001 से ज्यादा ही कहर ढा रही है। वर्ष 2001 में 30 लाख हेक्टेयर वनों को आग से नुकसान हुआ, तो 2021 में 90 लाख हेक्टेयर वन राख हुए। कनाडा में 2022 में 60 लाख हेक्टेयर वन राख हो गए। रूसी वनों के हालात भी ऐसे ही थे, जहां 2020 की तुलना में 2021 में 31 फीसदी ज्यादा वन जले।


सच तो यह है कि जैसे-जैसे पृथ्वी का तापमान बढ़ेगा, वनाग्नि की घटनाएं तेजी से बढ़ेंगी, क्योंकि 150 वर्षों के अध्ययन से पता चला कि प्रचंड गर्मी की स्थिति आज पांच गुना बढ़ गई है। दुनिया भर में वनाग्नि के बड़े असर होंगे। अंतर बस इतना है कि बेहतर प्रबंधन के कारण विकसित देश ऐसी आपदा से जल्दी निपट लेते हैं, जबकि विकासशील या पिछड़े देशों को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है।

ग्लोबल वार्मिंग के चलते वनों की आग एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। पृथ्वी पर अब मात्र 31 फीसदी वन बचे हैं। दुनिया में प्रति व्यक्ति o.61 हेक्टेयर वन क्षेत्र बचे हैं, जबकि अपने देश में यह 0.08 हेक्टेयर है। यह स्वस्थ उपलब्धता नहीं कही जा सकती।

अपने देश की चिंता ज्यादा बड़ी है, क्योंकि हमारे यहां उष्णकटिबंधीय परिस्थितियां हैं। शीतकाल में पर्याप्त वर्षा न होने से मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं होती। इसी वजह से झाड़ ज्यादा होने तथा पत्ते नहीं हटाए जाने से उनमें तुरंत आग पकड़ लेती है, जो जल्दी रुकने का नाम नहीं लेती। जब शुरू में आग लगती है, तो उसमें एयर गैप आ जाता है, जिसे भरने के लिए हवाएं चलती हैं, जिसके चलते आग तेजी से फैलती है। अन्य कारणों में, शीतकालीन वर्षा का अभाव, पतझड़ लंबा होना तथा गर्मी का लगातार बढ़ना तो है ही।

पिछले कुछ वर्षों से हम लगातार वनों की आग को झेल रहे हैं, लेकिन कोई प्रभावी कदम नहीं उठा पाए हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है पर्याप्त संसाधनों की कमी। खास तौर से वन विभाग में एक-एक फॉरेस्ट गार्ड के नियंत्रण में करीब डेढ़ सौ से 200 हेक्टेयर वन आते हैं, जो वनों की देखभाल करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

वनाग्नि की घटनाएं तेजी से बढ़ने का एक और कारण है कि 1988 से पहले वन गांव वालों की भागीदारी से पनपते थे, लेकिन आज वह कड़ी टूट चुकी है। आज की वन नीति में गांव की भागीदारी चाहे जितनी भी हो, वह प्रभावी नहीं दिखती। इसके अलावा वनों और गांव के बीच दूरी बढ़ गई है। पहले गांव के गांव वनों की आग बुझाने के लिए जुट जाते थे। लेकिन अब परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। वन विभाग के पास न तो पर्याप्त मैनपावर है और न ही सटीक रणनीति। जंगलों में आग लगने से सिर्फ वनों का नुकसान नहीं होता, बल्कि वन्य जीव भी मारे जाते हैं। खास तौर से छोटे पशु-पक्षी, जिनके जीवन का आधार ही वन है। यही नहीं, पारिस्थितिकी दृष्टिकोण से इस आग से मिट्टी फटने लग जाती है और फिर बारिश में सारी उपजाऊ मिट्टी बहकर चली जाती है। वनाग्नि से पानी के स्रोत भी सूख जाते हैं।

गंभीर बात यह भी है कि अभी तक हमने इस बात पर नीतिगत विचार नहीं किया है कि हम किस तरह से सामूहिक भागीदारी से वनों को बचा सकते हैं। यह पूरे समाज के लिए एक बड़ा संदेश होना चाहिए कि जलते वन को दूर से देखने का अब समय नहीं है, क्योंकि वनों का योगदान पानी, हवा या अन्य संसाधनों को उपलब्ध कराने में भी है। इसलिए इसे मात्र विभागों का दायित्व न समझ कर और गांव वालों के ही भरोसे इसका बोझ डालकर छुट्टी नहीं पा लेनी चाहिए, बल्कि सबको मिलकर वनों की रक्षा करनी चाहिए। अगर इन घटते वनों को आग ने लील लिया, तो तापक्रम तो बढ़ेगा ही, कार्बन डाइऑक्साइड भी प्राण संकट में डाल देगी। इसके अलावा, पानी और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर भी विपरीत असर पड़ेगा। इसलिए अब हमारे पास एक ही विकल्प बचा है कि हम वनों को बचाएं।

इसके लिए वन पंचायत को मजबूत कर उनकी भागीदारी बढ़ानी होगी। कम से कम वन पंचायतों को उनके चारों तरफ 100 हेक्टेयर भूमि के वनों की जिम्मेदारी सौंपी जाए और उनसे अपेक्षा की जाए कि वे वनों को अग्नि से बचाएं और बदले में उन्हें वन का अपने लिए उपयोग करने की सुविधा दी जाए। वन पंचायतों की भागीदारी के बिना वन विभाग के पास कोई जादुई छड़ी नहीं है कि वह आग पर नियंत्रण पा ले। वनों को आग से बचाने के लिए वन क्षेत्र में जल संरक्षण के कार्य भी होने चाहिए, ताकि एक तरह की नमी बनी रहे और किन्हीं वजहों से अगर आग लग भी जाए, तो वह ज्यादा फैले नहीं। इसके अलावा पतझड़ में जो पत्ते गिरते हैं, उन्हें हटाने एवं उनके उपयोग करने के उपाय करने होंगे। इससे जहां रोजगार उत्पन्न होगा, वहीं वनाग्नि पर भी अंकुश लगेगा। मुख्य बात यही है कि वन पंचायत और वन विभाग की सार्थक भागीदारी के लिए पहल होनी चाहिए। अगर हमने ऐसा नहीं किया, तो आग सिर्फ वनों को ही नहीं, बल्कि हमारे संसाधनों और प्राणों को भी लील लेगी।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed